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नाकाबिल होते हैं जो बोल नहीं पाते - डॉ. दीपक आचार्य

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इंसान के लिए बोलना उसका वह आभूषण है जिससे उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की थाह पायी जा सकती है। प्रथम दृष्टया चेहरा ही इंसान के बारे में बहुत कुछ बता देता है और उसके बाद नम्बर आता है वाणी का। किसी भी इंसान को उसकी अभिव्यक्ति से अच्छी तरह जाना जा सकता है।

अभिव्यक्ति कई कारकों से प्रभावित होती है। कुछ लोग बकवास करने के आदी होते हैं इसलिए दिन-रात में जब भी सामने कोई दिख जाता है बतरस वर्षा शुरू कर दिया करते हैं।  कुछ के बारे में यह धारणा बनी होती है कि वे धीर-गंभीर होने की वजह से आदतन कम बोलते हैं। कुछ लोग अपने आपको महान, शालीन और गंभीर बताए रखने के मकसद से हमेशा मुस्कानहीन गांभीर्य ओढ़े बैठे रहते हैं और कालान्तर में मूर्तिवत जड़ एवं संवेदनहीन होते चले जाते हैं।

आदमी के बारे में यह मर्यादा है कि उसे उतना ही बोलना चाहिए जितना जरूरी हो। जहां जरूरी हो वहां जरूर बोलें, जहां न हो, वहां चुप रहे। उतनी ही तेज आवाज होनी चाहिए जितनी कि उस तक पहुंच सके जो कि सुनने वाले हैं। न अधिक बोलना न कम। 

इनके साथ ही इंसानों की एक और श्रेणी है जिसके मुँह से आवाज तक नहीं निकल पाती। पान-गुटखा और च्यूंईगम खाकर निरन्तर जुगाली करते रहने वाले लोगों को छोड़ भी दिया जाए तो बहुत से कर्मवीर ऎसे हैं जिनके मुँह से आवाज तक नहीं निकलती।

विभिन्न प्रकार की बैठकों से लेकर सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों में जितनी तेज आवाज चाहिए उतना लोग बोल नहीं पाते। तरह-तरह के घातक गुटकों, पान-सुपारी, तम्बाकू, च्यूंइगम, अभक्ष्य भक्षण एवं अपेय पीने की आदत ने हमारी वाणी का ओज छीन लिया है।

अब हर किसी को माईक चाहिए। और तो और बाबाओं को प्रवचन-सत्संग के लिए माईक चाहिए, पुजारियों को भगवान की स्तुति के लिए माईक चाहिए। और पूरे संसार को एक तरफ छोड़ भगवान की पूजा, भजन और धर्म चर्चा के साथ ही विभिन्न प्रकार के अनुष्ठानों के धंधे में लिप्त पण्डितों को भी माईक चाहिए, इसके बगैर उनसे पूजा होती ही नहीं। वरना एक-दो दशक से पहले वाले पण्डित चाहे कितने ही वयोवृद्ध क्यों न हो जाते, उनकी वाणी का दिव्य ओज दूर-दूर तक गूंजता रहता था।

अब इन पण्डितों का वाणी ओज समाप्त हो गया है। तम्बाकू, पान-गुटखों आदि ने वाणी का ओज-तेज और प्रभाव छीन लिया है तभी तो छोटे-छोटे अनुष्ठानों, नवचण्डी, लघुरूद्र तक के लिए माईक का सहारा लेने को विवश होना पड़ रहा है।

माईक का दूसरा फायदा यह भी है कि भीड़ में सभी को बोलने की तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं पड़ती, दो-चार की आवाज ही पूरे अनुष्ठान की भरपाई कर डालती है।

कहा गया है कि जिह्वा पर देवी सरस्वती का निवास होता है  इसलिए जिसकी जीभ शुद्ध और पवित्र है उसकी वाणी का ओज अपने आप झरने और प्रभाव दिखाने लगता है। एक बार भी बीड़ी-सिगरेट, गुटखा, तम्बाकू, देशी-विदेशी दारू, अण्डे-माँस और वर्जित खान-पान हो अथवा वज्र्य तत्वों और कारकों पर मुँह लग जाए तो सरस्वती उस जिह्वा को त्याग देती है और उसके बाद वह जीभ केवल  स्वाद देने तक सीमित रहती है, वाणी का ओज खत्म हो जाता है।

यही कारण है कि बहुत सारे लोग ढंग से अभिव्यक्ति भी नहीं कर पाते, उनके शब्द समझ ही नहीं आते, बोलते भी ऎसे हैं कि लोग सुन भी न सकें। कई बार बड़े-बड़े लोग समूहों में होते हैं तब उनकी आवाज नहीं निकलती। उनकी विद्या  अविद्या में और सारा का सारा ज्ञान अज्ञान में परिवर्तित हो जाता है।

कई बार विभिन्न प्रकार की बैठकों में भी देखा जाता है कि चालीस-पचास के समूह में भी जब कोई बोलता है तब उसकी आवाज आस-पास तक भी नहीं पहुँच पाती, दूसरे कोने में बैठे इंसान को सुनाई दे, यह तो संभव ही नहीं। यहाँ तक कि ये लोग जब अपना परिचय देने खड़े होते हैं तब भी अपना नाम और संक्षिप्त विवरण औरों को सुना पाने की स्थिति में नहीं होते, जैसे कि किसी ने इन्हें गुलाम बनाकर होंठों को सी दिया हो।

ऎसे बहुत सारे लोग सब जगह देखने को मिल जाते हैं। सारी सुख-सुविधाओं और संसाधनों को मस्ती से इस्तेमाल करते हैं, वेतन-भत्ते और एक्सट्रा के मामले में पूरी तरह सावधान रहते हैं, खान-पान में कहीं पीछे नहीं हैं, फिर बोल क्यों नहीं पाते, यह अपने आप में मनोवैज्ञानिकों, शरीर रचना शास्ति्रयों, भौंपों-भल्लों, तांत्रिक-मांत्रिकों से लेकर उन सभी लोगों के लिए शोध का यह बड़ा विषय है।

यह संभव है कि कुछ लोग साइलेंट वर्कर होते हैं इसलिए अपनी प्रशस्ति के प्रति बेपरवाह रहते हैं लेकिन परिचय देने तक में दो शब्द मुँह से नहीं निकलना, आवश्यकता से कई गुना अधिक धीरे से बोलना और स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं कर पाना आखिर किस बात का लक्षण है।

वाणी इंसान के व्यक्तित्व की परिचायक है। जिस इंसान में वाणी का माधुर्य नहीं है, कर्कश आवाज निकलती रहती है, सुस्पष्ट उच्चारण नहीं है, तब यह माना जाना चाहिए कि उस इंसान में कोई न कोई कमी है अथवा मानसिक-शारीरिक दोष या फिर अपराधबोध जनित आत्महीनता।

वाणी की ओजहीनता किसी न किसी प्रकार के दैहिक, दैविक या भौतिक दोष को भी इंगित करती है।  भगवान से प्रार्थना करें कि अगली बार इन्हें जिस किसी योनि में पैदा करें,  इन लोगों के सीले हुए मुँह की पहले सर्जरी जरूर कर ले।

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