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कहानी संग्रह - अपने ही घर में / स्टील की थाली : हरि हिमथाणी

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

स्टील की थाली

हरि हिमथाणी

फत्तू की अम्मा को अपने बेटे की शादी की बहुत फ़िक्र थी, चलते-फिरते, उठते-बैठते हर समय गुरु की आराधना करती रहती, घर का काम करते, अपने आपमें मस्त होकर शादी ब्याह के गीत गाती, जैसे अभी फत्तू घोड़ी पर चढ़ रहा हो। अभी धूप के साए में उघड़ी हुई चोली को सीते हुए यही सोच रही थी कि लोगों के अपाहिज बेटे भी शादी कर पाते हैं, उसका फत्तू, सिर्फ़ टांग में थोड़ा दोष होने की वजह से कुँवारा बैठा है। कोई रिश्ता ही नहीं जमता। रिश्ते जोड़ने वाली माई को भी काफ़ी लालच दे रखी है, पर उसने भी कोई सकारात्मक प्रयास नहीं किया है। न जाने कब उसके भाग्य के द्वार खुलेंगे।

अचानक उसे मिरचू की याद आई। वह उसी मकान के निचले माले पर उसी की तरह किराएदार था। आवाज़ देने पर ‘जी अम्मा, जी अम्मा’ करते हुए आ जाता। माँएं बेटे पैदा करें तो बेशक ऐेसे ! चोली एक तरफ़ रखते हुए, चबूतरे पर खड़े होकर उसने आवाज़ दी - ‘मिरचू बेटे बैठे हो?’

‘हाँ, अम्मा, कहो !’ उसने ज़ोर से जवाब देते हुए कहा।

‘हाँ अम्मा, अभी आया’ कहते हुए क्षणभर में मिरचू ऊपर चढ़कर आया, तो झमुल ने उलाहना देते हुए कहा - ‘वाह बेटे, काम तो सिर्फ़ तुझ जैसे बेटे करें।’

‘फिर क्या हुआ अम्मा ?’ मिरचू के चेहरे पर हैरानी साफ़ झलक रही थी।

‘पूछते हो कि क्या हुआ ? तुमने अपने इस दोस्त से पूछा ? ...हाँ, क्या नाम बताया था हीरानन्दाणी।’

‘अरे हाँ अम्मा, तुम्हें बताना भूल गया।’

‘बेटे, ये भी कोई भुलाने जैसी बात थी जो भूल गए ?

‘भुलाने जैसी तो नहीं थी, पर उसकी ओर से जवाब ही ऐसा मिला ...।’

‘आखिर क्या कहा ?’ जब तक मिरचू कुछ कहे, तब तक झमुल की दिल तेज़ धड़कती रही।

‘कहा, दोष वाला न हो, कोई सीधा सादा लड़का हो बिना विकार के।’

‘हूँ ! बिना विकार का हो ! खुद की बहन कौन-सी दोष रहित है जो वह यह माँग कर रहा है। फत्तू को पहले देख तो लेता। बस फैसला सुना दिया। सिर्फ़ चलने में मामूली लंगड़ाता है, वो भी ढक जाने पर दिखाई नहीं पड़ता। दीवारों और दरख़्तों पर बंदरों की तरह छलांग लगाकर चढ़ जाता है, ये सभी खूबियाँ भी तो उसे सुनाते।’

‘अम्मा, मैंने सुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, ये तो क़िस्मत का खेल है। अगर फत्तू का मुकद्दर वहीं होगा तो खुद-ब-खुद सुई धागे को खींचेगी। बात तो छेड़ी हुई है। झमुल ने बड़बड़ाते हुए कहा - ‘बुरा हो सुई का और धागे का।’

दूसरे पल ठंडी सांस लेते हुए कहा - ‘फिर भी बेटे, इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना। क्या पता तेरा कहा सच हो जाए। फत्तू तेरे लिये कोई गैर नहीं, उसे अपना भाई समझना।’

‘हाँ, अम्मा ! तुम फ़िक्र मत करो। वह नहीं तो और कोई सही। तुम दीवार और दरख़्तों की बात करती हो, फत्तू तुम्हें घोड़ी पर छलांग लगाकर दिखाएगा।’

‘क्यों नहीं, क्यों नहीं बेटा ! तेरे मुँह में घी शक्कर !’

मिरचू चला गया। वह मन ही मन में उसके गुणगान को दोहराती रही। कुछ वक़्त के बाद कमरे की दक्षिणी खिड़की से हवा की तरंगों पर तैरती एक आवाज़ आई - ‘पुराने कपड़ों पर ले लो नये बर्तन।’

झमुल यकायक खाट से उठ खड़ी हुई, यह कहते हुए कमरे की ओर भागी - ‘हाँ छोरे हाँ, अभी आई, चले न जाना।’

बिना सलाखों के खिड़की में से सर बाहर निकालकर ज़ोर से उसे पुकारा - ‘छोरे, ओ बर्तन वाले छोरे।’

लड़का यहाँ-वहाँ सर हिलाहिलाकर देखने लगा। तो झमुल ने फिर ऊँची आवाज़ में कहा - ‘यहाँ देख छोरे, आँखें हैं या पत्थर ?’

इस बार लड़के ने उसे देख लिया - ‘हाँ अम्मा, देख लिया, आता हूँ।’

लड़का सीढ़ी चढ़कर ऊपर आया और बर्तनों का टोकरा सर पर से उतारकर फर्श पर रखा ही था कि झमुल की नज़र एक चमकती हुई स्टील की थाली पर पड़ी। हाथ में उठाकर देखी, काफ़ी वज़नदार थी।

‘छोरे, ये है तो असली स्टील की ही न ?’

‘अम्मा असली स्टील की, असली तो असली है, वर्ना इतनी वज़नदार होती क्या? असली और नकली की यही तो पहचान है।’

फत्तू की अम्मा थाली को अच्छी तरह ठोक ठोक थोक कर जाँचती रही कि लड़के ने फिर कहा - ‘भले ही बाज़ार में परख करवा कर तसल्ली कर लेना, दो दिन के बाद भी मैं जिम्मेदार और तुम आज़ाद !’

थाली को बार-बार हाथ में तोला, वाक़ई वजन था, मन से यह बात मान ली कि असली है, पर फिर भी लड़के को धमकाते कहा - ‘अगर नकली निकली तो गली में से आना-जाना बंद करवा दूँगी। हाँ, बताओ कितने कपड़े लोगे ?’

‘अभी कपड़े लाई नहीं हो, पहले ही पूछती हो कितने लूँगा ?’ लड़का भी कोई हरफनमौला था। ‘ले आओ कुछ चार साड़ियाँ, स्वेटर और टेरेलिन के सूट, कमीजें।’

‘तुझे तो सारा घर ही बुहार कर देती हूँ। छोरे का मुँह है कि बंद ही नहीं होता।’

‘अम्मा घर को बुहार करके देने से तुम रहीं। मेरा मतलब है कि थाली की क़ीमत जितने कपड़े ले आओ। बाज़ार से जाकर लोगी तो पचहत्तर रुपये से कम न मिलेगी।’

‘पचहत्तर रुपये ! पागल हो, धतूरा तो नहीं खाकर आए हो। इस थाली के इतने पैसे?’

‘हाँ अम्मा, इतने पैसे। दस बीस कम ही बताए होंगे। घर में अगर तराजू हो तो तोल कर देख लो। आधा किलो से ऊपर वज़न होगा, कम न होगा। ऐसी स्टील तो डेढ़ सौ रुपये किलो में मिलती है। मैं कोई तुम्हारी आँखों में धूल थोड़े ही झोकूँगा, सही-सही बात कहूँगा।’

‘धूल डालो अपनी माँ की आँखों में, जिसने जनम दिया है। छोरे की ज़बान तो देखो कैसे चल रही है।’

‘अम्मा ज़बान चलेगी सच्चाई पर, कपट करूँ तो डरूँ भी।’

‘अच्छा-अच्छा तुम्हें एक अच्छी-सी साड़ी ला देती हूँ। बड़े बेटे की शादी में समधिन ने दी थी। तुम भी क्या याद करोगे।’ कहते हुए थाली लेकर वह कमरे के भीतर चली गई, कुछ पल बाद लौटकर लड़के को साड़ी देते हुए कहा - ‘ये ले छोरे, भाग्यवान है। एक बार ही पहनी है, बिलकुल नई है।’

लड़के ने साड़ी को खोलकर देखते हुए कहा - ‘यह साड़ी है या मच्छरदानी। इतने सारे सुराख ? नहीं माई नहीं, मुझे यह नहीं चाहिए।’

‘छोरे ज़्यादा लालच न कर। ठहरो दो तीन कपड़े और भी लाकर देती हूँ।’ इस बार टेरेलिन की पैंट और कमीज़ ले आई।

‘अब तो खुश हुए, अच्छी तरह से जाँच कर लो, कहीं से भी फटी नहीं हैं।’

फत्तू की अम्मा को लगा कि लड़का खुश हो जाएगा, पर उसने मुँह सिकोड़ते हुए कहा - ‘तुम्हें कद्र नहीं है माई, कहाँ मेरी थाली और कहाँ ये कपड़े ? तुम मुझे थाली लौटा दो तो मैं यहाँ से खिसकूँ।’

‘पगले खिसकोगे कहाँ ? ठहरो एक कपड़ा और ला देती हूँ ?’

थाली का वजन और चमक फत्तू के अम्मा के दिल को भा गए। कमरे में जाकर वह एक कपड़ा और ले आई।

‘ये ले छोरे, न जाने कौन-सा मंत्र पढ़कर आए हो। इसके बाद अगर कुछ कहा तो सोंटा लेकर पीछे पड़ जाऊँगी।’

‘अम्मा, है तो अभी भी कम, पर अब रहने दे। समझूँगा माँ जैसी की दिल रख ली। आगे कभी आऊँ तो पापड़-पानी तो दोगी।’

‘बात करने का ढंग नख़रेदार है। ऐसा क्यों नहीं कहते कि प्यास लगी है।’

पानी पीकर, सर पर टोकरा रखकर लड़का चलता बना। कुछ देर बाद वह फिर लौट आया और बेहद निराशा भरे स्वर में बुलाने लगा - ‘माई ओ माई !’

रोने जैसे स्वर को सुनकर फत्तू की अम्मा घबरा गई, न जाने फिर क्या हुआ? इतने में लड़का सीढ़ी चढ़कर ऊपर आया। उसके चेहरे से मायूसी, बेचौनी झलक रही थी। फत्तू की अम्मा ने तेज़ नागवार आवाज़ में कहा - ‘क्या है रे छोरे, यूँ रोनी सूरत लेकर क्यों आया है ?’

‘माई तुमने मुझे यह पैंट दी है ! एक टांग छोटी तो एक टांग बड़ी। ऐसी पैंट कौन लेगा। बाबा ने कहा बदलवा लाओ नहीं तो भुर्ता बना दूँगा। मेरी अक़्ल को कोसते हुए दो-तीन चांटे भी कस कर लगाए। इसलिये मेरी माँ, मुझपर रहम खाकर मुझे यह पैंट बदलकर दो या इसके बदले में और कोई कपड़ा दे। अब तो तुम मर्ज़ी की मालिक हो, नहीं तो मुझे मेरी थाली वापस कर दो।’

रहम खाने की बजाय फत्तू की अम्मा उस पर क्रोधित हुई - ‘लड़के दिमाग तो नहीं खराब हुआ है, आधे घंटे के बाद आए हो थाली वापस माँगने। भागो यहाँ से नहीं तो सर फोड़ दूँगी।’

‘अम्मा भले फोड़ दो, पर यह थाली लिये बग़ैर मैं यहाँ से हर्गिज़ न हिलूँगा। तुम अपने कपड़े वापस ले लो, मैं तुम्हें ठग तो नहीं रहा हूँ न ?’

‘ठग नहीं रहे हो ?’ फत्तू की अम्मा का सर घूम गया। ‘ये ठगना नहीं तो क्या है? कह तो रही हूँ, जाओ यहाँ से ! लड़का है या सर का दर्द !’

लड़के ने फिर भी जैसे रुआँसी आवाज़ में कहा - ‘अम्मा, तुम्हारा बच्चा हूँ, मुझपर दया करो, यह पैंट बदल दो या थाली लौटा दो। बाबा की मार बहुत भारी है, पीटकर मुझे बेहाल कर देगा।’

‘भले ही कर दे, मुझे उससे क्या ? उस वक़्त क्यों नहीं देखकर ली, अब नखरे कर रहे हो।’

‘मुझे क्या पता कि तेरे बेटे की एक टांग छोटी है, नहीं तो देखकर लेता ! यह तो सरासर धोखा है।’

‘ऐ छोरे, मेरे बेटे के अवगुन गिना रहे हो ? दूर हो जाओ यहाँ से नहीं तो दूँगी धक्का ! पलटी खाते हुए नीचे जा गिरोगे।

‘धक्का मारोगी, जैसे तुम्हारा राज्य है ?’

‘ठहर मुरदार, तुम ऐसे नहीं मानोगे, ले आऊँ सोंटा।’

लड़के ने देखा कि सीधी ऊँगली से घी नहीं निकल रहा, बातें भी निरर्थक हुईं। तो कहने लगा - ‘भले ले आओ सोंटा, चीर फाड़ डालो। मैं खून बहाता पुलिस चौकी शिकायत ले जाऊँगा। चिल्ला-चिल्लाकर पूरे मोहल्ले को इकट्ठा करूँगा। मैं अपना हक़ माँग रहा हूँ।’

अम्मा जहाँ खड़ी थी वहीं स्तब्ध खड़ी रही। बस वापसी जवाब देते हुए कहा- ‘तुम ऐसे नहीं मानोगे, मिरचू को बुलाती हूँ।’

ऐसा कहकर उसने ज़ोर से मिरचू को आवाज़ दी। आवाज़ भी ऐसे जैसे वह लूट ली गई हो। मिरचू भी, जैसे जल्द में चप्पल न मिली हो, ऐसे ही दौड़कर ऊपर आया। सीड़ी पर डंडा रखा हुआ था, वो भी साथ ले आया। सोचा शायद घर में कोई बदमाश उठाईगीर घुस आया है। पर जब उसने सामने हक़ीक़ी मंजर देखा तो वह शाँत हो गया। उल्टे अम्मा से कहने लगा - ‘यह बिचारा हक़ ही तो माँग रहा है, इसे डंडा लगाऊँ भी तो किस बात पर ? ऐसे ही जख़्मी कर दूँ ?’

उससे पहले फत्तू की अम्मा ने कहा - ‘अरे मिरचू, इस लड़के की चिकनी-चुपड़ी बातों में मत आना। लगाओ डंडा, भगा दो यहाँ से। कब से मेरा खून पी रहा है।’

पर मिरचू का ऐसा जवाब सुनकर अम्मा अवाक् रह गई। उल्टा मिरचू पर बरस पड़ी - ‘तुम्हें इसलिये बुलाया था कि आकर इसकी तरफ़दारी करो। दो टक्के के छोकरे के सामने मुझे नीचा दिखाया, शाबास है ! बेशक माताएँ तुम जैसे बेटे पैदा करें। मेरे बचाव के लिये क्या खूब डंडा लेकर आए हो।’

मिरचू अब वहाँ एक पल नहीं रुका, यूँ कहते हुए चला गया - ‘नहीं अम्मा, मुझसे ये न होगा, तुम जानो तुम्हारा काम जाने !’

झमुल चकित रह गई। उसे वापस जाता देख, पीठ पर आँखे टिकाए देखती रही जब तक वह सीड़ी से नीचे न उतर गया। फुसफुसाते हुए - ‘मिरचू देख ली तेरी मर्दानगी। लड़को को जो डांटा-धमकाया वो तो एक तरफ़, उसे आसमान पर चढ़ाकर जा रहे हो। वाह क्या खूब निभाया है, तुझे माँ ने जाने कैसे पैदा किया ?’

लड़के ने कहा - ‘माई, वह तुम्हें सच कह कर गया तो उसे कोसती हो !’

‘मुर्दार चुप कर, नहीं तो पिटोगे !’

‘माई तुम क्या कर लोगी ? बहुत चुप रहा अब मैं चिल्ला-चिल्लाकर सारे मोहल्ले को इकट्ठा करूँगा। फिर देखूँ तुम कैसे थाली वापस नहीं करती ?’

‘कलमुँहे, मैं पहले ही गुस्से में हूँ, मुझे ज़्यादा गुस्सा मत दिलाओ।’ कहते हुए वह कमरे में भीतर गई। खूँटी पर टंगा हुआ पति का पाजामा और कमीज उतार लाई और उसके मुँह की ओर फेंकते हुए कहा - ‘जन्म जले, अगले जन्म में तेरा कोई कर्ज़ा ले आई थी।’

लड़का यूँ कहता हुआ चला गया - ‘भरपाई तो अब भी नहीं हुई है, पर डूबते को तिनके का सहारा ही भला !’

‘अभागे, लानत हो तुम पर, कहते हो तिनके का सहारा ही भला।’

पर झमुल उस लड़के से ज़्यादा मिरचू पर छिड़ी हुई थी - ‘ये बेटे बने हैं ? अरे अगर पराए अपने होते तो अपनों के लिये कौन पीड़ा भोगता?’

इस कोलाहल में वह चावल चुनने भूल गई। फिर जब पेरूमल दुकान से लौटा तो उसे प्यार से कहने लगी - ‘देखो आज मैंने चावल पकाने ही नहीं रखे, रोटी तो दिल से खाओगे न ?’

आते ही पत्नी यूँ माधुर्य से मोह ले, ऐसा इक्तिफाक़न होता था। पेरूमल स्वभाव से हँसी मज़ाक का दीवाना था। इस बड़ी उम्र में भी उसमें यह जज़्बा कायम था। उसके ऐसे मौजी मिज़ाज के कारण ही धंधे में भी काफ़ी बढ़ोतरी आई थी। उसकी चादरों की दुकान थी। अगर जान-पहचान की किसी औरत के साथ अनजान औरत उसकी दुकान पर आई तो फिर पलटकर कभी किसी और दुकान में नहीं जाती थी, इस विश्वास के साथ कि सरल स्वभाव वाला यह काका उसे कतई न ठगेगा। फिर क्यों न उसे बहन-बहन कहकर उसका बटुआ ही खाली करवा दे। उधार भी बेखटके देता जैसे वह उन्हें सालों से जानता हो। जो ग़ैरों से इस तरह मसखरी करता था, फिर झुमल तो उसकी पत्नी थी। आज पत्नी के मुँह से मीठे शब्द सुनकर पेरूमल ने कहा - ‘दिल से ! ... क्या वैसे तुम्हारे हाथ का पका हुआ दिल से नहीं खाता क्या ? ये क्यों पूछा ?’

‘खाते तो हो, पर पूछ लिया तो क्या गुनाह किया मैंने ?’

‘नहीं, नहीं, तुम गुनाह क्यों करोगी, डर मुझे लगता है कि कहीं मुझसे गुनाह न हो जाए।’

‘अब छोड़ो भी... तुम हाथ-मुँह धो लो, तब तक मैं पापड़-पानी ले आती हूँ।’

‘तांबे की थाली भी लेती आना।’

जाते-जाते झमुल रुक गई - ‘थाली भी ! अभी उस दिन तो कहा, बुढ़ापे में पिया नहीं जाता, फिर आज कौन-सा जुनून सवार है?’

पेरूमल ने ठहाका मारते हुए कहा - ‘कोई कसम थोड़े ही ली थी। कभी-कभी तो मौज लेनी चाहिए न ? पर अगर तुम्हारी मरज़ी नहीं है तो मैं हाथ ऊपर उठा लेता हूँ।’

‘मैं क्यों कहूँ कि हाथ ऊपर उठाओ, पीलो ! दिल को मत तरसाओ। ऐसा पाप न मैं अपने सर पर आज उठाऊँ, न कल।’

‘हो तो तुम परम सयानी।’

पेरूमल हाथ-मुँह धोकर खाट पर बैठा ही था कि झुमल ने कहा - ‘अरे हाँ ! आपसे वह बात करना तो भूल ही गई। पुराने कपड़ों पर स्टील की थाली ली है। लेकर आती हूँ। आप भी जांचकर बताएँ कि कहीं ठगी तो नहीं गई हूँ।’ वह झट से कमरे में जाकर थाली ले आई।’

उसका दिल रखते हुए पेरूमल ने कहा - ‘बहुत अच्छी, ऐसी जैसे तुम हो।’

‘मेरी समानता थाली से करते हो।’

‘थाली से नहीं, थाली की अच्छाई से। सही कहा गया है कि औरत की अक़्ल उसकी दाईं ऐड़ी में होती है।’

झमुल मुस्कराई - ‘तो खातिरी के साथ कह रहे हो।’

‘हाँ बाबा, खातिरी के साथ और तुम क्या ऐसी-वैसी चीज़ पसंद करोगी ?’ पेरूमल ने मज़ाक में कहा - ‘तुम्हें तो दूर से आता देखकर दुकानदार वहीं से हाथ जोड़कर कहेगा - माई जो चीज़ तुम लेने आ रही हो वह मेरे पास नहीं है।’

झमुल ने हँसते हुए कहा - ‘आज किसका मुँह देखा है ?’

‘तुम्हारा, और किसका देखूँगा !’

‘हक़ीक़त में मुझे चिंता हो रही थी कि छोरा मुझे ठग तो नहीं गया। बहुत ही नाटकीय था। छोटा था पर ज़हर का पुलिंदा था, होश हवास ही खता कर दिये। जाने कहाँ से मंतर पढ़ आया था जैसे खुमारी चढ़ी हुई थी।’

पेरूमल ने ज़ोरदार ठहाका लगाया - ‘तुम्हें तो भरम है। सौदा क्या कोई अनमोल रत्नों का किया है जो वह तुम्हें लूट गया। एक दो पुराने कपड़े अगर ज़्यादा भी दिये तो कौन-सी आफ़त आ गई। यह गनीमत समझो कि तुम्हें मनपसंद चीज़ मिली है।’

‘सच में आपकी बातों ने तो मेरी हर चिंता दूर कर दी है।’

‘एक घूँट पी लो तो बाकी की भी मिट जाएगी।’

खाना खाने के पश्चात् पेरूमल कमरे में अपने रात के कपड़े बदलने गया तो देखा खूँटी खाली थी, ज़ोर से आवाज़ देते हुए पूछा - ‘भाग्यवान, तुमने यहाँ से कपड़े उतारे क्या ?’

‘पुराने तो थे, और भी उन्हें पहनते क्या ? मैंने वह जोड़ा बरतन वाले को दे दिया।’

‘यह तो भला काम किया, पर जेब में सौ का नोट पड़ा था, वह निकाला या नहीं ?’

‘सौ का नोट ! ये क्या कह रहे हो ?’ झमुल के होश उड़ गए, उसके चेहरे के रंग बदलने लगे जैसे वह अभी गिर पड़ेगी, आँखों के आगे अँधेरा छा गया।

‘सौ का नोट था क्या जेब में ? कमरे में आते ही वहीं चौखट पर बैठ गई, ‘सौ का नोट !’ ... दिल बेचैन हो गया, करुणावस्था में रोने लगी - ‘सौ का नोट ... हे राम ! यह मैं क्या सुन रही हूँ ? सौ का नोट...।’

वह कुछ इस तरह रोने लगी जैसे मातम मनाते हुए रूदाद की रस्म अदा होती है।

‘अरे कौन-सी बला पर मेरा पाँव पड़ा, जो छोरे को आपके कपड़े दे दिये। मैं तो लुट गई, रे लुट गई ! बुरा को कमबख़्त मिरचू का जिसने मेरे होश खता कर दिये। अब मैं क्या करूँ, कैसे मिलेगा सौ का नोट ?’

पेरूमल ने देखा, सौ का नोट जो गया वो तो गया, पर अगर इस भाग्यवान को अभी नहीं संभाला तो नोट के पीछे यह भी चल देगी। वहीं से आवाज़ में बदलाव लाते हुए कहा - ‘तुम से तो मज़ाक करना भी गुनाह है।’

उसे दोनों हाथों का सहारा देकर चौखट से उठाते हुए कहा - ‘मैंने मज़ाक क्या किया, तुम तो मातम मनाने बैठ गई। सच कहा है सयानों ने औरत जात से कभी भी मज़ाक नहीं करना चाहिए। अगर उसका गलत अर्थ निकाला गया तो मज़ाक गले का फंदा बन जाता है।’

‘तो आपने सच ही मज़ाक किया था ?’

‘और तुम सच समझ बैठी, यही न पगली... ?’ पेरूमल ने उसे सीने से लगा लिया।

‘गजब किया है, मसखरी भी ऐसी की जाती है कि भले किसी के प्राण निकल जाए। मेरे सीने पर हाथ रखकर देखो, अंदर जैसे इन्जन चल रही है। तोबह, तोबह!’ झमुल ने चौन की सांस ली।

पेरूमल ने उसे राहत बख़्शने के लिये ज़ोरदार ठहाका लगाते हुए कहा - ‘अगर ऐसा मज़ाक न करता तो तुम मुझे यूँ दिल पर हाथ रखने देती !’

‘अब छोड़ो भी..., चलो दूर हटो।’ झमुल ने उसे बड़े ही नाज़ के साथ हल्का धक्का क्या दिया, दूसरे पल खुद भी उसके साथ आगे सरक गई थी।

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