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याचना छोड़ें कर्म से खुश करें - डॉ. दीपक आचार्य

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कर्म से खुश करें

- डॉ. दीपक आचार्य

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सच्चा इंसान वही है जो अपने अच्छे कर्म से औरों को खुश करें। यहाँ तक कि भगवान से भी कोई काम हो, प्रार्थना जरूर करें पर साथ में उन अच्छे कर्मों को भी अपनाएं जो भगवान को पसंद हैं।

हम लोग इंसान से भी बहुत कुछ चाहते हैं और जहाँ थक-हार जाते हैं या आशंका, भ्रमों, अन्यमनस्क अवस्थाओं से घिर जाते हैं, आत्मविश्वास खो बैठते हैं वहाँ ईश्वर को याद करना आरंभ कर देते हैं।

हम अपने कामों को लेकर दो प्रकार के रास्ते अपनाते हैं। एक रास्ता परिश्रम और संकल्पों से भरा है जहाँ हम यदि सच्चे मन से अच्छे काम करते हैं तब हमें किसी की सिफारिश या उल्टे-सीधे धंधों और  दूसरी तरह के रास्तों और गलियों को तलाशने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

हमारे कर्म की सुगंध के कतरे अपने आप जगत में व्याप्त होकर हमारे कामों को आसान बना डालते हैं। सिफारिश के लिए स्तुतिगान तभी करना पड़ता है कि जब हमारे भीतर कोई कमजोरी हो। हर कमजोर आदमी बैसाखियों को तलाशता है और इन्हीं के सहारे जिन्दगी गुजार देने को लक्ष्य मानकर चलता है।  और हर बैसाखी उस इंसान के लिए बनी होती है जो किसी न किसी मायने में कमजोर है। बैसाखियों का रंग-रूप और आकार-प्रकार कुछ भी हो सकता है। यह जड़ भी हो सकती है, और जीवंत भी।

मनुष्य को हम किसी भी तरह का लोभ-लालच देकर, सेवा-चाकरी और उसकी मनपसन्द हरकतों में सहभागी या औजार बनकर खुश कर सकते हैं मगर भगवान के लिए ऎसा नहीं है।  भगवान परम दयालु और कृपा बरसाने वाला है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम उसके साथ भी वही व्यवहार करने का दुस्साहस करें जो इंसानों के साथ करते हैं। 

मानव जीवन की अधिकांश समस्याओं, संत्रासों और दुःखों का यह भी एक कारण है। हम लोग ईश्वर के दरबार में जाकर प्रार्थनाएं करते हैं, उन्हें रिझाने के लिए मंत्रों, श्लोकों और स्तुतियों का गान करते हैं, परिक्रमा करते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं और अपने कामों को पूरा करने-कराने के लिए दिल से याचना करते हैं।

यहाँ तक तो ठीक है। लेकिन हम प्रलोभन बुद्धि से भरे रहकर भगवान को यह कहें कि हमारा काम हो जाएगा तो यह यह करेंगे, वह करेंगे, खुश कर देंगे, चढ़ावा चढ़ा देंगे, प्रसाद करेंगे आदि-आदि। यह अपने आप में शुचिता भरा तरीका नहीं है।

इंसान के इस ब्लेकमेलिंग वाले नीचतापूर्ण स्वभाव से भगवान हमेशा नाराज रहता है। यह अलग बात है कि वह हमारी भूलों को माफ कर हमारी कामनाओं को पूरी कर देता है। वह इसलिए कि वह परमपिता है और इसलिए जीवात्मा मात्र और जगत का पिता है जिसे चाहे-अनचाहे भी अपनी संतति के लिए करना ही करना है चाहे संतति कैसे भी मनोभावों वाली क्यों न हो।

हमारे काम हो जाएं तो खुशी-खुशी सारी बाधाएं छोड़ कर मस्ती पा लें। और कोई से काम न हो पाएं तो भगवान या उपासना पद्धति को कोसना शुरू कर देंगे।  काम होने की शर्त पर भगवान के लिए कुछ करने की यह नीयत इंसान के लिए दुर्भाग्यजनक है।

जो लोग काम की बाधा लेकर उसके बाद बाधा छोड़ते हैं उनसे अच्छे वे लोग हैं जो पहले ही भगवान को प्रसन्न करने के सारे जतन पूरी प्रसन्नता और श्रद्धा के साथ कर डालते हैं और उसके बाद भगवान से प्रार्थना करते हैं।

इनकी समस्त मनोकामनाएं बिना कहे ही अपने आप पूरी होती रहती हैं। ईश्वर को प्रसन्न करने के दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता सस्ता, सरल और सहज यही है कि प्राणी मात्र और जगत के प्रति संवेदनशीलता के भाव रखें तथा सेवा-परोपकार में समय लगाएं।  यह सेवा ही भक्ति का वह स्वरूप है जिससे जगत का पालन करने वाले भगवान विष्णु बहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।

दूसरा रास्ता साधना और भक्ति मार्ग का है। चाहे जो मार्ग अपनाएं।  पर इतना ध्यान रखें कि भगवान को प्रसन्न करने के लिए बाधाओं, मनौतियों और मिन्नतों से बढ़कर है प्रार्थना और वे अच्छे कर्म, तो भगवान को पसन्द हैं, भगवान के काम माने जाते हैं।

पहले भगवान को अपने कर्म, सेवा और व्यवहार से खुश करें, फिर प्रार्थना करें या न करें, वह हमारे जीवन की सभी आवश्यकताओं की बिना मांगे पूर्ति करता है और हर पल हमारा ध्यान रखता है।

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