गुरुवार, 5 मई 2016

सांप-सीढ़ी / कहानी / शालिनी मुखरैया

रमेश जब घर में घुसा, तो घर का माहौल स्तब्ध था । बच्चे अपनी अपनी पढ़ाई में व्यस्त एवं उसकी पत्नी '' शांति '' (नाम की शांति पर वैसे '' अशांति ' ') अपने कोपभवन में थी । एक न एक दिन तो यह होना ही था । मेज पर पड़ा लिफाफा सारी कहानी बयान कर गया। वह समझ गया कि जरूर मां और बाबूजी के आने की सूचना आ गई है। पत्र का मजमून भी वही था । रिटायरमेंट के बाद मां-बाबूजी अपने बेटे बहू के पास रहने के लिए आ रहे थे । आखिर जाते भी तो कहा जाते । गाव का मकान उसकी पढ़ाई, नौकरी लगवाने और बहन की शादी का खर्च उठाने के चक्कर में बिक गया । पूरी जिंदगी पिताजी के अभावों में काट कर बच्चों की जिंदगी बनाने में लगा दी । वह अपने मां पिताजी का दर्द समझता था मगर उसकी पत्नी अपने ससुराल वालों से नाता नहीं रखना चाहती थी । बहुत ही, मुँहफट, कर्कश एवं झगड़ालू किस्म की औरत थी । उसके कर्कश व्यवहार की वजह से वह धीरे-धीरे सब रिश्तेदारों के कट गया था । सिर्फ बच्चों की वजह से वह इस रिश्ते को निभा रहा था। मां-बाबूजी का आना जो उसके एकछत्र राज्य में हनन था। वह चाहती थी कि शहर के किसी अच्छे वृद्धाश्रम में मां बाबूजी को भेज दिया जाय, खर्चा तो वह उठा ही लेंगे । मगर साथ रखने को वह राजी न थी । इस मुद्दे पर न जाने कितनी बार घर में बहस हो चुकी थी।

'' क्या तुम पागल हो गई हो? मैं उनका अकेला लड़का हूँ, आखिर वे जाएंगे तो कहा जाएंगे '' रमेश क्रोध में चिल्लाया, अगर वो सदा के लिए यहां रहे तो मैं घर छोड़ कर चली जाऊँगी ' शांति ने '' अशांति '' से पैर पटकते हुए कहा।

बच्चे बेचारे अपने कमरे में सहम कर बैठ जाते । और अंत में नाटक का पटाक्षेप इस प्रकार हो कि घर में न तो चूल्हा जलता । पतिपत्नी दोनों गुस्से का घूँट पी कर और बच्चे बेचारे रूखी ब्रेड खाकर सो जाते।

मां बाबूजी कल सुबह ही आ रहे थे । रमेश ने दफ्तर से छुट्‌टी ले ली थी और मां बाबूजी को लेने स्टेशन पहुँच गया । ट्रेन समय पर आ गई । रमेश ने मां बाबूजी के चरण छुए। रमेश के मां बाबूजी अपने बेटे की वैवाहिक परिस्थिति से अच्छी तरह परिचित थे । मगर वह अपने बेटे का कहा भी टाल नहीं सकते थे।

घर पहुँच कर मां बाबूजी का सामान गेस्ट रूम में लगा दिया गया। बच्चे दादा-दादी के आने से बेहद प्रसन्न थे, मगर अपनी मां के आगे सहमे से रहते थे।

बाबूजी की अनुभवी आंखों ने ताड़ लिया कि घर में तनाव का कारण वही हैं। अपनी बहू से उन्हें विशेष प्रेम की उम्मीद थी भी नहीं । उनके बेटे में कोई कमी नहीं थी। उन्होंने सोचा था कि अपने

बेटे और नाती-नातिन के प्यार के सहारे अपना शेष जीवन व्यतीत कर लेंगे।

मगर कोई व्यक्ति अपमान का घूँट पीकर आखिर कब तक जी सकता है। और वह भी बाबूजी जैसा स्वाभिमानी व्यक्ति जिसने सदा ही आदर्शपूर्ण जीवन व्यतीत किया हो । मन ही मन बाबूजी ने कुछ निर्णय ले लिया और बोले, ' रमेश बेटा'

'' जी पिताजी '' एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह रमेश का स्वर था। ' हम कुछ दिनों के लिए तुम्हारी मौसीजी के यहां जाना चाहेंगे, तुम हमें कल सुबह की बस में बैठा देना। '' रमेश. बाबूजी के मन में क्या चल रहा था उससे अनजान था। ' दफ्तर के लिए निकलते समय हमें छोड़ देना। '' '' जी, पिताजी ।

सुबह जब मां-बाबूजी कार में बैठे तो उनकी सूनी आंखों में आंसू थे मगर साथ में उनमें एक दृढ़ निश्चय भी था । उन्होंने भरे हुए गले से बच्चों से विदा ली । उनकी शांति बहू (अशांति) उन्हें विदा करने भी नहीं आई 1

रास्ते में जब रमेश बस स्टैंड की तरफ गाड़ी मोड़ने लगा तो बाबूजी ने धीरे से कहा, '' बेटा, गाड़ी उस वृद्धाश्रम की तरफ मोड़ लो जहां बहू हमें भेजना चाहती है।

'बाबूजी, मेरे होते हुए आप उस वृद्धाश्रम में कैसे रह सकते हैं?? रमेश बोला '' धिक्कार है मुझ पर जो मैं आप दोनों का बोझ न उठा सकूँ' ' रमेश की आंखों में आंसू थे ।

'मगर बेटा मैं तेरा घर बरबाद होते हुए नहीं देख सकता । इसलिए तेरी मां और मैनें फैसला लिया है कि हम वृद्धाश्रम चले जाए जिससे घर की सुख-शान्ति बनी रहे ' बाबूजी रूँधे हुए स्वर में बोले । रमेश ने मां की तरफ इस आशय से देखा कि वह बाबूजी को रोके, मगर मां अपने पति के साथ थी ।

रमेश को ऐसा प्रतीत हुआ कि उस पर घड़ा पानी पड़ गया हो । मगर बाबूजी की जिद के आगे उसकी एक न चली आखिर बहुत ही दुखी मन से मां बाबूजी ने कहा ' 'बेटा, बच्चों को मिलाते रहना। '' रमेश को ऐसा महसूस हुआ कि उसके प्राण उसके शरीर से निकल गए हो । वापस मुड़ते हुए सिर्फ उसका शरीर ही घर जा रहा था, उसकी आत्मा वहीं पर रह गई थी ।

आज उसे अपने बचपन का वह दृश्य याद आ रहा था, जब वह और बाबूजी सांप-सीढ़ी का खेल खेला करते थे । अगर उसकी गोटी पीछे रह जाती तो वह रूठ जाता था और उसे मनाने के लिए बाबूजी अपनी गोटी सांप से कटवा कर जानबूझ कर हार जाते थे और वह खुश हो जाता था । आज भी उसे यही महसूस हो रहा था कि उसकी खुशी के लिए बाबूजी आज फिर उस खेल को हार बैठे थे और उस जिता दिया था । मगर यह उसकी जिंदगी की जीत न हो कर उसकी सबसे बड़ी हार थी.... .... ।

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  1. उत्तर
    1. आपके उत्साहवर्धन के लिये धन्यवाद

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    2. आपके उत्साहवर्धन के लिये धन्यवाद

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