सोमवार, 23 मई 2016

लौट आए हैं सिंहस्थ से अब कुछ करने की बारी है - डॉ. दीपक आचार्य

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अब सिंहस्थ उतार पर है।

बहुत दिनों से हम सभी धार्मिक ज्वार में नहाये हुए रहे।

पूरा का पूरा देश सिंहस्थ में उमड़ आया और विदेशी भी।

सांसारिकों से लेकर वैरागियों और अद्र्ध वैरागियों, आंशिक वैरागियों और सब तरह के लोगों के लिए सिंहस्थ यादगार रहा ही है।

सैल्फि लेने वालों और सोशल मीडिया पर अक्सर छाए रहने वाले भक्तों का भी जमघट इन दिनों दिखाई दे रहा है।

धन्य हैं, सौभाग्यशाली हैं वे लोग जो सिंहस्थ में क्षिप्रा मैया में डुबकी लगाकर पावन हो आए हैं, देव दर्शन और संत-महात्माओं के सत्संग, सान्निध्य और कृपा वृष्टि से लाभान्वित हो चुके हैं।

अपनी-अपनी जमातें, अपने-अपने लोग, अपने-अपने डेरे अब लौटने की तैयारी में हैं।

वे सभी लोग पूज्य हैं जिन्होंने कुंभ का आनंद पाया। इन सभी के श्रीचरणों में नमन करने को जी चाहता है।

हर बार यही आशा जगती है कि कुंभ के बाद कुछ परिवर्तन आएगा। जगत और जीवन में बदलाव का दौर शुरू होगा।

हमारे अब तक के संचित पापों को हम पवित्र डुबकी लगाकर विदा दे आए हैं। अब हम परम पवित्र हैं, इसलिए सच्चे भक्त कहे जा सकते हैं।

जो अब तक हुआ वह हम सब कुंभ में छोड़ आए हैं। हमें पुरानी बातों के लिए अब न प्रायश्चित करने की जरूरत है, न कोई पश्चाताप। जो अच्छा हो पाया वह भगवान को समर्पित  और सारी बुराइयां और पाप-पाप डुबकी मार लेने से ही खत्म होने का अहसास पा लिया।

सिंहस्थ के माहौल से जो लौट आए हैं वह संसार के कुंभ में कुछ सेवा और परोपकार का अंशदान डालें।

क्षिप्रा में डुबकी लगाते वक्त संकल्प तो सभी ने यही लिया था कि अब दिव्य जीवन की दिशा में डग बढ़ाएंगे। इस संकल्प को याद करें और समाज के लिए कुछ करने का माद्दा अपने भीतर पैदा करें।

ऎसे काम करें कि इनकी सुगंध के कतरे देश-देशान्तर तक फैलते रहें और मानवता का मिनी कुंभ अपने इलाकों में भरने लगे जिसका पुण्य लाभ पाने दुनिया अपनी ओर खिंची चली आए।

मजा तो तब है कि जब बदलाव हमारे जीवन में भी आए और परिवेश में भी। हमारे स्वभाव भी परमार्थ से भरे हों और जो हमारे संपर्क में आए उसे यह अहसास हो कि कुंभ से लौट आने के बाद कुछ तो बदला हुआ जरूर नज़र आने लगा है।

यदि बदलाव दिखे और अनुभवित हो तो समझें कि कुंभ स्नान सार्थक हुआ। अन्यथा हालात पहले जैसे ही रहें तो मान लें कि अपना पुराना घड़ा क्षिप्रा जाकर भी खाली नहीं हो पाया है।

यही सब चलता रहा तो यह घड़ा फूट कर ही खाली होगा और हम लोग छोटी-छोटी कुल्हड़ियों में किंचित मात्र अवशेषों के साथ हरिद्वार या दूसरे किन्हीं तीर्थों में जाकर ही विलीन होंगे।

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