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व्यंग्य राग (6) रेवड़ियां बंट रही हैं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

रेवड़ियां बंट रही हैं. सामान्यत: जिसके पास रेवड़ियां होती हैं वह उन्हें बांटता नहीं फिरता. अंधा हो तो बात दूसरी है – अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपने को दे. राजनीतिक दल रेवड़ियाँ बंटवाने में जुटे हुए हैं. सरकार खुशी खुशी रेवड़ियां बांट रही है. रेवड़ियां पाने के लिए लोग झोली फैलाए झूमा-झटकी कर रहे हैं. रैलियाँ हो रही हैं ,भाषण दिए जा रहे हैं – हम को भी दो, हमको भी दो रेवड़ियां. चारों और शोर मचा है. शोर मचाइए, रेवड़ियां पाइए.

भारत सरकार को अरसा गुज़र गया आरक्षण की रेवड़ियाँ बाँटते. भरे पेट, झोला लटकाए, दल के दल, एक के बाद एक, रेवड़ियों की उम्मीद लिए कतार में लगे है. रेवड़ियां अगर पिछड़े वर्ग को मिलती हैं तो हम भी पिछड़े वर्ग के ही हैं. हमें पिछड़ा घोषित करो और रेवड़ियां दो. पहले गूजरों ने कहा हमें आरक्षण चाहिए, जाट कह रहे हैं हमें आरक्षण चाहिए. हमें कचहरी नहीं करनी. हम जानते हैं सरकार चाहे तो हमें आरक्षण मिल सकता है. सरकार सरकार होती है, हम जबतक हमारी मांग पूरी नहीं होती सरकार का दरवाज़ा खटखटाते रहेंगे. हम धरना देंगे. भूख हड़ताल करेंगे. सत्याग्रह के नाम पर दुराग्रह करेंगे. रैलियाँ निकालेंगे. सरकार को घेरेंगे, दिल्ली बंद. कब तक रेवड़ियां नहीं दोगे ? लेकर रहेंगे. पटेल भी अब लाइन में लग गए. हम शासक वर्ग के हैं तो क्या हुआ. मुफ्त में बाँटी जाएं तो रेवड़ियां कौन छोड़ेगा ? हमें भी आरक्षण दो, हम ही क्यों रह जाएं वंचित ? रेवड़ियां, रेवड़ियां हमें भी दो. सुना है अब बहुत जल्द ही सारे के सारे ‘अनारक्षित’ एक होकर सड़क पर आने वाले हैं. क्यों कोई अनारक्षित रहे? बांटना है तो सबको बांटो. देना है तो सबको दो. जिन्हें नहीं मिला है, उन्हें भी दो. सरकार का काम है जनता की रक्षा. सरकार का आरक्षण सबको मिलना चाहिए. सरकार ध्यान दे. हम अनारक्षित भी संख्या में कम नहीं हैं. आरक्षितों से तो ज्यादह ही हैं. एक होकर हम बहुमत में आ सकते हैं. बस, हम आ ही रहे हैं.

रेवड़ियां- तेरे कई रूप हैं. एक रूप आरक्षण का है तो रेवड़ियों का एक रूप ‘पैकेज’ भी है. ये पैकेज बाड़ से पीड़ित, या सूखे के मारे, लोगों को बांटने वाले खाने के पैकेट नहीं हैं. ऐसे लोग तो इंतज़ार कर सकते हैं. मर भी गए तो कौन बड़ी राष्ट्रीय हानि होने वाली है. ये पैकेट ‘पिछड़े’ राज्यों को दिए जाने वाले ‘पैकेज’ हैं जिन्हें सरकार अधिकतर चुनाव के आसपास देती है. ये पैकेज करोंड़ों के पैकेज होते हैं. लबे-चुनाव जब बिहार के लिए पॅकेज की घोषणा हुई तो हर राज्य पिछड़ों की कतार में लग गया. बंगाल से आवाज़ उठी आंध्र से आवाज उठी. उडीसा से उठी. पॅकेज से कोई महरूम क्यों रह जाए. सभी को चाहिए ‘स्पेशल-स्टेटस’. तभी तो पॅकेज मिल पाएगा. एन-केन-प्रकारेण सबको ही पॅकेज चाहिए. रेवड़ियां बट रही हैं. दौड़ो, दौड़ो, जल्दी दौड़ो.

सेवानिवृत्त सेना के जवानों और अधिकारियों ने ‘वन-रैंक-वन-पेनशन’ की रेवड़ियां लूट लीं. वे पूरी तरह अभी संतुष्ट भी नहीं हुए थे कि अर्ध सैनिक बल भी हरकत में आ गए. अन्य सरकारी सेवा निवृत्त कर्मचारी भी फिर पीछे क्यों रह जाएं ! बहरहाल दबी ज़बान ,मांगें उठने लगी हैं. हमें भी दो, हमें भी दो. किसी को नहीं पता ये रेवड़ियां आती कहां से हैं? कौन परोसता है ? लेकिन रेवड़ियां निरंतर बांटी जा रही हैं. देश लूट रहा है देश लुट रहा है.

-सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १,सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग – surendraverma389.blogspot.in

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