बुधवार, 4 मई 2016

धर्मेंद्र निर्मल की कविताएँ

1.भागीरथी

हम
विषम हिमाद्रि में
भागीरथी बहाते हैं
वे
लगाकर डुबकी
भगीरथ हो जाते हैं।

2.शराब

आश्चर्य होता है
दुख भी
नहीं रहे लोग पीने वाले
आजकल
शराब
पी रही है
जी रही है।

3.समाजवाद

समाजवाद के चोले में
पूँजीवादी कागभगोड़ा
वैयक्तिक समाज है
जहाँ
भूख के कारण
भूखों का
भूखों पर राज है।

4.टुटपूँजिए

सभी चाहने लगे है
बड़े नोट
दम
नाक में कर रखा है
टेप चिपके चिल्हरों ने।

5.माँग

माँग मत
माँग का अधिकार तू
माँग कम नहीं हो जाएगी तेरी
न ही माँग सूनी होगी
तलवार उठा
कर
चीर छाती माँग की
माँग पर अधिकार तू।

6.छुटभैए

दिन -ब-दिन बढ़ते
हल्के लोग
भारी पड़ रहे हैं
हम पर
जबकि जरूरत है हमें
औरों पर भारी पड़ने वाले
हल्के लोगों की।

7.जिंदगी

सुलगती सिगरेट है जिंदगी
हो जायेगी राख
मारो न मारो
कष।

8.माँ

चाहता हूँ माँ
माँएँ
अपने बच्चों की खातिर
बहन बेटी बहू सास नहीं
सिर्फ माँ बनी रहे।

9.आस्तीन

यह जानते हुए भी
कि सबसे अलग हूँ मैं
सूट वालों की भीड़ में
बंडी ही पहनता हूँ
क्योंकि
कोई कमीज ऐसी नहीं
जिसमें आस्तीन न हो
और आजकल
हर आस्तीन पर
साँपों की निगाहें हैं।

10.माहौल

खोटे रहे उछल
फटे रहे चल
दराजें रही मचल
आदमी
हो गया सवार
पैसों पर
संसार
व्यापार ! व्यापार !! व्यापार !!

 

Dharmendra Nirmal 9406096346

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