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कहानी संग्रह - अपने ही घर में / क़दीम की कृपा : अमरलाल हिंगोराणी

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

क़दीम की कृपा

अमरलाल हिंगोराणी

अम्मा बिलकुल साधारण, पुराने ज़माने की। बेटे का तकरार नथनी पर था। माँ ने नाक से नथिनी उतारी तो कहने लगा : ‘मत उतारो, यह सुहाग की निशानी है।’ पर सुहाग हमेशा भाग्य में न था। माँ का कहना, ‘सुहाग के बाद लावण्य किस काम का? जब सर से साया उठ गया तो मणिमुक्ता किस काम का?’

बेटा शादी करने की हामी नहीं भरता। मन में आकुलता थी कि अम्मा पुराने ख़यालों की और लड़की बिलकुल नए ख़्यालों की नव पीढ़ी की। पाउडर और लिपिस्टिक की कमी न थी। लिपिस्टिक भी ऐसी लगाए जैसे ‘पान की पीक’। नाखून लाल, कपड़े रंग-बिरंगे और ख़याल परिंदों के पर कतरते हुए।

परन्तु लाल, लड़की की उड़ान के साथ मुक़ाबला न कर पाया। शादी की तो सब शादी पर आए, पर अम्मा घर बैठी रही। कहे जब दुल्हन लेकर आओगे तो दरवाज़़े पर मिलूंगी। पुराने रीति-रिवाज़, दूल्हे और दुल्हन को दरवाज़़े पर मिली ढक्कन और दीया हाथ में लिये। ढक्कन रखा दुल्हन के सिर पर और ढक्कन पर दिया रख दिया। दुल्हन हैरान हो गई। दिल में कहे ये रस्मों के नाम पर कैसा स्वांग है। लाल की मां ने कहाः ‘ढक्कन बनकर घर की कमी-कसर को ढकना और दीया बनकर अंधेरे में उजाला करना।’

लाल की मां ने उन्हें संपूर्ण आज़ादी दे दी। ऐसा नहीं था कि उसकी कोई लाचारी थी, कोई बंधन था। बस वह ख़ुद ख़ुश होती थी। उन्हें आपस में रंगरलियां मनाते देख वह गद्गद हुआ करती।

लड़की की आज़ादी की कोई सीमा न थी, सर्प से लंबे बाल जो लहरों की तरह लहलहाते, ‘बॉब कट’ करवा लिये। लाल को रंज तो हुआ, पर दर्द को भीतर ही भीतर खामोशी से पी लिया...अब लड़की को फिर से फ्राक पहनने की चाह हुई। लाल ने कहा.‘शादी-शुदा स्त्री फ्राक कैसे पहन सकती है? शर्म जैसी कोई बात है भी या नहीं। बेहयाई की भी कोई हद होती है। सब हदें पार कर बैठी हो। लोग क्या कहेंगे?’

पर वह अपनी ज़िद पर अड़ी रही। लाल ने कहा :‘देखो अम्मा कितनी भी दरियादिली दिखाए! जब तुमने बाल कटवाए तो खुद भी कहने लगी कि मैडम बन गई है।’

मेरे दिल को चोट लगी। जिन बालों को उंगलियों पर लपेट कर खेला करता था, वे कट गए। जैसे बदन का एक अंश कट गया। पर अम्मा मुस्कराती रही। कहती रही : ‘नई लहर है!’

‘अम्मा ने न विरोध किया, न ऐतराज़।’ लाल कहता रहा।

‘अब तुम जब फ्राक पहनोगी तो उसे रंज होगा।’

लाल की पत्नी गोमी ने कहा : ‘अम्मी का ख़याल न करो। वह जाने और मैं जानूं। आपको तो ऐतराज़ नहीं?’

लाल को विश्वास था कि अम्मा कभी भी यह मक्खी निगलना क़बूल नहीं करेगी। उसे भी यह बात पसंद न थी। पर उसकी दिल रखने के लिये कहने लगा ‘मुझे कैसा ऐतराज़?’

हफ़्ते भर के भीतर गोमी ने फ्राक पहना। लाल की मां आनंद विभोर हुई; खुशी से फूली नहीं समाई। कहती रही : ‘हू बहू वास्तविक मैडम लग रही है।’ देख-देखकर ख़ुश होती रही। लाल हैरान हो गया।

कहा : ‘अम्मा, बाबा के समय कैसे ख़याल थे और अब क्या हो गया है?’

लाल की मां की आँखों से पति की याद में आँसू लुढ़क आए। कहने लगीः ‘बेटा, मैं तुम्हें क्यों रोकूं? मैंने बहुत दुख देखे। रात होती थी तो पूरे घर का काम उतार कर, फिर सास के पांव दबाया करती थी जब तक उसे नींद न आ जाए.वहाँ वे खुद राह तकते-तकते सो जाते। शादी हुई, रात साथ गुज़ारी। सुबह कहे कि पति से पर्दा करो (घूंघट) लाड़काणे का अन्धा रिवाज़! लोगों से बचते-बचाते मौका पाते, दुपट्टे से आँखें उठाकर देखती। उनके लिये तरसती रहती। दिन में मजाल है कि औरों के सामने उफ़ भी करें। रात के लिये रोती, तड़पती रहती। एक दिन खुद पर काबू न रख पाई.दिन की तन्हाई में उनसे बात की। इतने में सास आ गई।

‘शादी किये कितने दिन हुए हैं?’ व्यंग्यात्मक रूप से कहने लगी : ‘पहले से ही दोस्ती थी क्या?’ वह दिन और फिर उम्र भर अम्मी के सामने बात नहीं की। तुझे याद है, कभी अपने पिता के साथ मुझे एक खाट पर बैठे देखा?’

लाल ने गर्दन से ‘ना’ का इशारा दिया। लाल की मां कहने लगी : ‘जब वे बीमार हुए, तब एक दो बार बग़ल में बैठने के लिये कहा। मैं अभागन, लाज की मारी, कैसे लोक-लाज का उल्लंघन करती? शर्म को ओढ़कर बैठी रही। ये तो पता न था कि वह उनकी आख़िरी आरज़ू थी जो इस अभागन ने पूरी न की।’

यह कहकर वह सुबकती, सिसकती आँखों से आबशार बहाती रही।

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