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ब्लेकमेलर हैं निजताखोर - डॉ. दीपक आचार्य

ब्लेकमेलर हैं

निजताखोर

- डॉ. दीपक आचार्य

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निजता हर इंसान का वैयक्तिक स्वातंतर््य है और इसकी रक्षा करना उन सभी लोगों का फर्ज है जो कि उसके संपर्कित हैं, साथ रहते हैं, सहकर्मी, सहधर्मी हैं या जिनसे काम पड़ता रहता है।

पर आजकल निजता के मामले में सब कुछ बुरी तरह गड़बड़ा गया है। इंसान की निजता पर चारों तरफ से गिद्ध दृष्टि रहने लगी है। हर कोई उतावला है दूसरे की निजता भंग करने के लिए। इसके लिए आजकल बहुत सारे उपकरण आ गए हैं जो निजता की हत्या के लिए एके-47 या इसी तरह के दूसरे अस्त्र-शस्त्रों से कम नहीं हैं।

ऎसा नहीं है कि ये उपकरण अभिजात्यों और सम्पन्न लोगों के पास ही हों, आजकल मामूली से मामूली इंसान के पास भी मोबाइल जैसे उपकरण आ गए हैं जो कि निजता भंग करने के लिए काफी हैं।  बहुत से ऎसे हैं जिनके पास मोबाइल तो हैं ही, इनके अलावा भी ढेरों इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ऎसे आ गए हैं जो कि दूसरे की निजता पर डाका डालने का ही काम करते हैं।

औरों की निजता भंग करने के मामले में हम लोग आजकल हाथ धोकर पीछे पड़े हुए हैं। लगता है कि जैसे सारे के सारे लोग जासूसी का पार्ट टाईम बिजनेस कर रहे हों और इसमें जबर्दस्त वैश्विक प्रतिस्पर्धा हो रही हो।  और सभी को लग रहा हो कि जैसे वे ही इसका खिताब जीतने वाले हैं, दूसरा कोई मुकाबले में जीत ही नहीं सकता।

हर कोई एक दूसरे की आवाज, फोटो और हरकतों को मोबाइल में कैद करना चाहता हो। सारे के सारे शातिर जासूस इसी फेर में लगे रहते हैं कि कब किसको फँसाकर ब्लेकमेल किया जाए, नीचे दिखाया जाए और हर संभव चतुराई व मौके पर पूरा-पूरा फायदा उठाया जाए।

न वाणी माधुर्य रहा, न कोई आत्मीयता। हर तरफ काफी इंसान हैं दूसरे पर अपना प्रभुत्व जमाने को उद्यत हैं और इसलिए चाहते हैं कि औरों की कमजोरियों को भुना कर अपने खोटे सिक्के और चवन्नियां चला दें।

आजकल तो किसी से बात करो, हर बात लोग रिकार्ड करने लगे हैं, मौका देख कर फोटो खिंचने लगे हैं। यहाँ तक तो ठीक है क्योंकि आदमी एक ऎसा विचित्र जीव है जो सृष्टि में न कभी तृृप्त हो पाया है, न शांत, सन्तुष्ट और संतोषी।

यह अकेला जीव ऎसा है जो हर क्षण किसी न किसी उधेड़बुन में लगा-भिड़ा रहता है इसलिए जमाने के सारे शौक पालने का आदी हो गया है। लेकिन दूरदर्शिता का प्रयोग करते हुए ब्लेकमेलर और जासूस की तरह काम करने वाले लोगों को क्या कहा जाए।

मानवीय मूल्यों में इस प्रवृत्ति ने जितनी गिरावट ला दी है वह इस सदी का सबसे बड़ा कलंक ही कहा जा सकता है। जब तक कोई हमारे अनुकूल बना रहे तब तक अपना आत्मीय, और जैसे ही कोई अपने काम आने की स्थिति में नहीं दिखे या सत्य का अहसास कर अपने से दूरी बना ले, वह इंसान खराब अनुभव होने लगता है।

यही कारण है कि आजकल लोग भावी परिस्थितियों में अपने आपको सुरक्षित बनाने और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए ब्लेकमेलरों और जासूसों की तरह व्यवहार करने लगे हैं। लगता है कि जैसे इंसान पर चारों तरफ उन लोगों के पहरे लगे हुए हैं जिन्हें इंसान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। 

हर तरफ हम निजता भंग के शिकार हैंं। खुलकर बात नहीं कर सकते, मुस्कराहट नहीं बिखेर सकते, मस्त होकर घूम-फिर नहीं सकते, अपने घर-परिवार और आत्मीयजनों के साथ मुक्त वार्तालाप या उनके साथ भ्रमण नहीं कर सकते।

जिधर देखो कोई न कोई जासूस देखने को मिलेगा ही, चाहे वह सहज और शौकिया हो या फिर शातिर। आजकल सब तरफ शातिरों के डेरे सजने लगे हैं जहाँ पूरी बेशर्मी के साथ उन लोगों की पैनी निगाहें टिकी रहती हैं कुछ न कुछ नया, रोचक, नॉनवेज मसालेदार और नकारात्मक तलाशने के लिए।

पता नहीं आदमी को क्या होता जा रहा है, इतना पागलपन बीती सदियों में कभी नहीं रहा होगा जितना आज के आदमी में है।  ध्वनि, चित्रों और विचारों के इन कबाड़ियों के कबाड़ में हर उस इंसान की वाणी और चलचित्रात्मक सामग्री ठूंस-ठूंस कर भरी हुई है जिनसे काम पड़ता है या भविष्य में उसे दबाकर ब्लेकमेल कर कुछ पाने या सामने वाले का नुकसान करने वाला कोई न कोई बारूद भरा होता है।

बहुत सारे लोगों की जिन्दगी ही अब यही हो गई है। गिद्धों की तरह निगाह रखते हैं, कुत्तों की तरह हर सामग्री को कहीं दबा-छुपा कर रखते हैं और लोमड़ों-सूअरों की तरह थूथन से वार करते हुए अपने अस्तित्व और अहमियत से रूबरू कराते रहते हैं।

इंसानों की एक विचित्र  प्रजाति ऎसी ही होती जा रही है। पता नहीं मिलावट किस स्तर पर हुई है कि जो यह अलग ही संकर फसल उग आयी है। किसी को दोष देने से क्या होगा, जो हो गया सो हो गया। अब मरे नहीं सुधरने वाले ये।

वह हर इंसान ब्लेकमेलर है जो हमारी निजता को खण्डित करने की कोशिश करता है। क्यों न इन सारे शातिर जासूसों और ब्लेकमेलरों को पाकिस्तान भेज दिया जाए। गर्व करें अपने देश की इन प्रतिभाओं पर। इसके सिवा इनके सम्मान में कुछ नहीं कहा जा सकता।

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