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तेरी सोच-मेरी सोच / व्यंग्य / प्रमोद यादव

समझ नहीं आता..शुरू कहाँ से करूँ ? पहले के लेखक-उपन्यासकार तो बेखौफ अपनी रचना की शुरुआत “शौचादि से निवृत्त होकर“ जैसे वाक्यों से कर लेते थे..तब न उन्हें लिखते हुए बुरा लगता था..न ही पाठक को पढ़ते हुए..और लगे भी क्यों ? भई..ये तो एक प्राक्रतिक क्रिया है जिससे हर एक को रोज दो-दो हाथ होना ही पड़ता है..कुछ लोग सुबह-शाम मिलाकर चार-चार हाथ भी हो लेते हैं..वैसे इस पर अभी तक तो “हम दो हमारे दो” की तरह कोई “लिमिट” तय नहीं पर कल को कौन जानता है ? हो सकता है सरकार किसी दिन कोई “लिमिट” तय कर दे.. दिन में दो बार..या अधिकतम तीन बार.. लिमिट से अधिक पर जुर्माना..

ऐसा कुछ हुआ तो सारे शौचालयों को हाईटेक कर उसे आधार लिंक से जोड़ कुछ ऐसा करेंगे कि जनता-जनार्दन की हवा ही बंद हो जाए..शौच तो बाद की क्रिया है.. तब बिजली-टेलीफोन बिल की तरह इसका भी हर महीने अलग से बिल आयेगा..ऐसे में गरीब परिवारों की मुसीबत ज्यादा बढ़ेगी..ऐसी स्थिति में उन्हें हफ्ते में एकाध दिन “उपवास” जैसी प्रक्रिया अपनानी होगी ..मतलब कि उदरस्थ मटेरियल को एक दिन पेट में ही फ्रिज करके रखना होगा..मुश्किल काम तो है..खासकर महिलाओं के लिए जो एक भी बात पेट में ज्यादा देर नहीं रख सकती तो मटेरियल भला कैसे रखेंगी ? पर पैसे बचाने कुछ तो करना ही होगा..या फिर काले धन की तरह इसे कहीं गुप्त स्थान पर जमा करना होगा..जहां शासन-प्रशासन की नजर न पड़े.. इस देश में कुछ भी हो सकता है..क्योंकि कोई सरकार जब कुछ करने की ठान ले तो करके ही दम लेती है..भले ही करते-करते दम निकल जाए या उसकी किरकिरी हो जाए..चाहे जनता-जनार्दन मिशन का मजाक उडाये..या फिर लाख गरियाये ..

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अब देखिये..स्वच्छ भारत मिशन के तहत क्या कुछ नहीं हुआ .. सबसे पहले तो “झाड़ू” पर ही बवाल हुआ कि दूसरी पार्टी का चुराया.. लाख सफाई दे कि उनकी अपनी झाड़ू है पर पब्लिक है..सब जानती है..फिर फोटो सेशन पर बवाल कि सफाई कम कर रहे.. फोटो ज्यादा खिंचा रहे..कई बार तो ऐसा भी हुआ कि किसी बड़ी हस्ती के चीफ गेस्ट होने पर इस अभियान के लिए पहले ट्रक भर कचरा मंगवाया..उसे फैलाया फिर उसे ही मिलजुल कर झाड़ू मारते,फोटो-विडियो खिंचाते उसी ट्रक में डाल अभियान को सफल (और आम जनता को बुद्धू) बनाया... पूरे देश-स्तर पर यह मुस्तैदी दिखी..क्या शहर और क्या कस्बा..क्या गाँव और क्या मोहल्ला..महीने-दो महीने तो सारे वी.आई.पी. झाड़ू लिए फोटो ही खिंचाते रहे..फिर इन्हें ख्याल आया कि कब तक यूँ सड़क ही बुहारते रहेंगे..तब बैठकर “वेन्यू” तय किये कि कहाँ-कहाँ सफाई होनी चाहिए.. - गली-मुहल्ला...नदी-नाला..स्कूल-कालेज..बाग़-बगीचा..दफ्तर-कारखाना..आदि..आदि...सफाई के बहाने पुराने-पुराने गोपनीय दस्तावेज से भी धूल झाडे गए.. इधर से उधर किये गए..तभी तो एकाएक कभी “नेताजी” सुर्ख़ियों में आये तो कभी “पंडितजी”..

सॉरी..कहीं विषयांतर न हो जाऊं..ट्रेक पर आता हूँ..तो बात स्वच्छ भारत मिशन की चल रही थी..इसके अंतर्गत इन दिनों खुले में शौच पर पाबंदी लगाने शहर में पांच दिवसीय जागरूकता अभियान चल रहा है..पांच दिनों से अखबारों के सारे समाचार “शौचमय” है..बुरी आदत है मेरी कि शौच के समय ही अखबार पढता हूँ..समाचार पढ़ते-पढ़ते शौच करने का एक अलग ही आनंद है..पता ही नहीं चलता की क्या हुआ..कब हुआ..कैसे हुआ..किसी दिन अख़बार न आये तो मुश्किल में पड़ जाता हूँ.. हाँ..तो बता रहा था कि पिछले पांच दिनों से अखबार लिए बैठता हूँ..पर होता कुछ नहीं...और हो भी तो कैसे ? कोई ढंग का समाचार हो तो हो..अब शौच के समय ही कोई शौच पर पाबंदी का समाचार पढ़े तो भला शौच कैसे हो ?

पांच दिनों के अखबार का “शौच-सम्बन्धी” समाचारों की हेडिंग सुनिए - पहले दिन- “नहीं करना खुले में शौच,होगी पैनी नजर” दूसरे दिन- “शौच स्थलों पर डरे सहमें पहुंचे निगम के इंजीनियर” तीसरे दिन- “खुले में शौच करने वालों की होगी निगरानी” चौथे दिन- “तड़के पहुंचे शौच स्थल,500 को चेताया” पांचवे दिन- “टीम पहुंची तब शौच कर जा चुके थे लोग”..आखिरी समाचार तो साम,दाम दण्ड,भेद लिए था- ”शौचालय नहीं तो राशन नहीं,शासकीय कर्मचारी होंगे बर्खास्त” इन समाचारों को विस्तार से बताने की आवश्यकता नहीं समझता..ये पांच-सात हेडलाईन्स ही इस अभियान की सफलता (असफलता) की पूरी दास्ताँ कह रहा..साफ़ दिख रहा कि कहीं प्रशासन मिन्नत कर रहा तो कहीं चेतावनी दे रहा..कहीं अधिकारी सहमें हैं तो कहीं आम आदमी.. कहीं आदेश की धज्जी उड़ाते लोग समय पूर्व ही “डाउनलोड” कर निकल गए.. तो कहीं कुछ रंगे हाथ लोटों के साथ पकडे गए..कुल मिलाकर “तू डाल-डाल तो हम पात-पात” की स्थिति है..वैसे गरीब आदमियों की फितरत का सरकार को अच्छी तरह इल्म है..उसे मालूम है कि अभियान की समाप्ति के बाद सारे ओ.डी.स्पॉट फिर से ज्यों के त्यों “हरे-भरे” (बल्कि पीले-पीले) दिखाई देंगे..

उपरोक्त समाचारों में बीच एक समाचार बड़ा ही रोचक और थोडा हटकर था..इसलिए इसका जिक्र जरा हटके ही कर करा हूँ..हेडिंग था- “खुले में शौच...अमीर कुत्तों का क्या ?“सब हेडिंग था -“आम लोगों पर सख्ती,कुत्तों पर नरमी” संवाददाता ने समाचार में केवल अमीर कुत्तो का ही जिक्र किया..गरीब कुत्तों को गरीब आदमी की तरह बिसार दिया..भई..आखिर खुले में शौच गरीब कुत्ते भी तो करते हैं..पर अमीर कुत्तों का जिक्र शायद इसलिए किया कि ये अमीरों के घर फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं..पॉश कालोनियों में रहते हैं..और इनके मालिक बड़े-बड़े अधिकारी,समाजसेवी,उद्योगपति,ठेकेदार,डाक्टर,इंजीनियर होते हैं..और यही सब लोग मिशन के हिमायती भी होते हैं और अभियान के तहत लोगों को जागरुक करते हैं....ये सब सुनियोजित ढंग से कुत्तों को टहलाने के बहाने निकलते हैं और किसी के भी घर या मैदान के सामने शौच करा गन्दगी फैलाते हैं..इस पर लोग आपत्ति करते हैं..कुत्तों के मालिकों से रोज वाद-विवाद की स्थिति भी निर्मित होती है.लोगों का कहना है कि पालतू कुत्तों के खुले में शौच पर भी रोक लगनी चाहिए...शासन-प्रशासन को कड़े कदम उठाने चाहिए..ताकि खुले में शौच पर पाबन्दी हर स्तर पर सार्थक हो .

बात तो बिलकुल ठीक है और गंभीर भी..अब देखना है कि क्या शासन-प्रशासन इनके लिए(कुत्तों के लिए) कोई स्पेशल शौचालयों का निर्माण करवाता है या फिर कुत्तों को कमोड में बैठने की ट्रेनिंग देने अधिकारियों का कोई दल गठित करता है ताकि पालक अपने कुत्तों को घर पर ही “निबटा” कर स्वच्छ भारत मिशन को सफल बना सके..

सोचता हूँ अगर इनके लिए शौचालयों का निर्माण किया गया तो वो कैसा होगा और वहां का दृश्य कैसा होगा ?..जाहिर है..शौचालयों को कोई स्पेशल रंग दिया जाएगा ताकि लोग दूर से जान ले कि कुत्तों का है..जैसे पीली बस देखते ही लोग जान जाते हैं-स्कूली बच्चों का है..अब वहां की एक झलकी देखिये..काफी संख्या में संभ्रांत लोग तरह-तरह के कुत्तों की जंजीर थामे खड़े हैं..कभी वो कुत्तों को खींच रहे तो कभी कुत्ते उन्हें..तो कुछ थक हारकर पसीने से तरबतर उन्हीं की तरह ही हांफते बैठे हैं..कुछ महिलायें भी फुल मेकअप में गोदी में कूं-कूं करते कुत्तों को लिए बारी का इन्तजार कर रही..तो कुछ प्रेशर बनाने कुत्तों को बिस्कुट खिला रही.. कुछ बड़े बच्चे अपने से भी ज्यादा बड़े कद्दावर कुत्ता लिए संडास की तरफ बार-बार ताक रहे और कुत्ते से ज्यादा वो खुद हांफ रहे.. चारो ओर छोटी-बड़ी जीभ लपलपाते कुत्ते.. हा..हा..हा..करते हांफते कुत्ते..सफ़ेद,भूरे,काले,चितकबरे कुत्ते..पूरा शौचालय अजीब सी बदबू से अटा-पटा..आदमी और कुत्ता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे जैसा साथ-साथ..सटा-सटा..ऐसे माहौल में कुत्ता-मालिकों के आपसी संवाद भी कुछ इस अंदाज में होंगे-

‘ अरे शर्माजी..कैसा है आपका कुत्ता..अब तो ठीक से कर लेता है न ?”

‘ हाँ..भई..पर कभी—कभी घंटो लगा देता है..कल तो इसके चक्कर में एक महत्वपूर्ण मीटिंग में डेढ़ घंटे देर से पहुंचा तो कलेक्टर साहब से गाली सुननी पड़ी ..आप बताओ..आपके कुत्ते का क्या हालचाल है ?’

‘ बस यार..ठीक ही है..एल्शेसियन है..इतनी ऊँची आवाज में भौंकता है कि डर के मारे कई पामेरियन टाईप के छोटे-छोटे कुत्ते जहां और जैसे होते हैं,वहीँ एक झटके में “निबट” जाते हैं.. पीड़ित कुत्ते-मालिक मुझे घूरते हैं जैसे ये सब रायता मैंने फैलाया ..कई महिलायें तो लड़ने-झगड़ने पर आमादा हो जाती हैं..’

फ़िलहाल इस कल्पना को यहीं विराम देता हूँ..और यथार्थ के धरातल पर आता हूँ..वैसे उपरोक्त विषय पर मेरी सोच ये है कि सरकार जितनी सख्ती सफाई अभियान में बरत रही ..उतनी अगर “शराब बंदी” पर बरते तो शायद देश का ज्यादा कल्याण हो.. जय-हिन्द.

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प्रमोद यादव

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