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बकाया काम ही देते हैं तनाव और दुःख - डॉ. दीपक आचार्य

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इंसान के संसार के समस्त दुःखों और तनावों का मूल कारण जानने की कोशिश सदियों से होती रही है। ‘मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना’ के कारण हर कोई इसका अलग-अलग कारण बताता है। 

आमतौर पर देखा जाता है कि हम सभी लोग काल पर भरोसा कर लिया करते हैं जबकि ऎसा नहीं होना चाहिए। जो काम आज हमारे लिए या हमारे पास आता है उसे आज और उसी समय कर दिया जाए तो वह ईश्वरीय प्रवाह का अंग माना जाता है।

लेकिन हम लोग आज को कभी महत्व नहीं देते। और इस कारण हमारा हर कल बिगड़ा रहता है। जिसका पिछला कल बिगड़ा हुआ है उसका आने वाला कल कभी ठीक नहीं रह सकता। 

जो इस बात को जानते और समझते हैं वे काल की गति और प्रभाव को जानते हैं इसलिए जिस समय जो काम अपने पास आता है उसे उसी समय कर डालते हैं जबकि अधिकतर आबादी हर काम के लिए आज की बजाय कल पर ज्यादा भरोसा करती है और उनका वह कल कभी नहीं आता जब वे किसी काम को पूरा कर डालें।

पूरी दुनिया में हर तरफ न्यूनाधिक रूप से लोग आलसी, प्रमादी हैं। काम के मामले में जो लोग कल-परसों पर टालते हैं वे स्वार्थ, भोग-विलास और मुुफत का माल उड़ाने और मौज-शौक करने में कभी कल की बात नहीं करतेे। और यही उनके जीवन का वह स्वभाव है जो उन्हें पशुओं की श्रेणी में रखने को विवश करता है।

आज का कोई सा काम यदि किसी भी कारण से बकाया रह जाए तब यह तय मान कर चलना चाहिए कि हमने अपने जीवन से आनंद का एक कतरा खो दिया। क्योंकि जब तक वह काम आकार नहीं लेगा तब तक हमारे दिमाग में रहकर गर्मी पैदा करेेगा और दिल को हल्का नहीं होने देगा।

बहुत से लोगों के बाल असमय सफेद हो जाते हैं, उड़ जाते हैं और आकाश सफाचट नज़र आने लगता है या आंशिक खल्वाट दिखने लगता है।  कुछ अपवादों और शारीरिक कारणों को छोड़ कर यही सबसे बड़ा कारण है। दिमागी गर्मी की वजह से सर हमेशा गर्म रहता है और यही गर्मी हमारे कैश सौन्दर्य का भक्षण कर जाती है। हमारी नब्बे फीसदी बीमारियों का यही कारण है।

जो लोग कामों को टालते चले जाते हैं उनके दिमाग में भूसे की तरह विचारों का बहुत बड़ा जखीरा जमा हो जाता है और इस कारण से नए विचार आने या ईश्वरीय संकेत पाने के सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं। फिर जिनका दिमाग अनसुलझी गुत्थियों और नहीं हो पाए कामों से जुड़े हुए विचारों से भरा हो जाता है उनके दूसरे अवयवों पर भी दिमाग का नियंत्रण खत्म हो जाता है। 

इसलिए यह जरूरी है कि जो विचार जिस समय हमारे सामने आए, उसी समय उसका समाधान करें, खुद न कर सकें तो तत्क्षण वह काम या विचार किसी पात्र सहयोगी या मातहत को सौंप दें और खुद उससे मुक्त हो जाएं। 

नदी की निर्मलता, पावनता और स्वच्छता तभी संभव है कि जब उसमें शैवालों का जंजाल न फैला हो, पानी में कीचड़ न हो, तभी उसकी सम्पूर्ण पारदर्शिता दिखती भी सुन्दर है और सुकून भी देती है। इसलिए हमेशा दिमाग को खाली रखें तभी दिमाग ठण्डा रह सकता है।

फिर आजकल ग्लोबल वार्मिंग का खतरा पूरी दुनिया में पसरता जा रहा है। दिमाग भी गर्म और परिवेश भी गर्म। ऎसे में इंसान में अनावश्यक उन्माद पैदा हो जाना, खुराफाती हरकतों का प्रभाव  आ जाना स्वाभाविक है। और आजकल सभी जगह यही हो रहा है। इंसान के न भीतर शांति है, न उसके आस-पास।

हालात ये हो गए हैं कि इंसान को अब खुराफात, अशांति और उन्माद का प्रतीक माना जाने लगा है।  जहां इंसान जमा होते हैं वहीं शांति, सुरक्षा और सतर्कता के लिए अतिरिक्त बल लगाने की जरूरत पड़ती है।

जो लोग यह सोचते हैं कि आज का काल कल कर लेंगे, वे सारे के सारे भ्रम में जी रहे हैं। एक तो काम टालते हुए लोगों की बददुआएं लेते हैं, दूसरे अगर कोई काम शेष रह गया और रात में ही आकस्मिक रूप से  विकेट उड़ जाए तो उनके पुनर्जन्म और मोक्ष तक में बाधाएं आ सकती हैं क्योंकि जिन कामों को हम टालते हैं वे मरने के बाद भी हमारे अहं शरीर के साथ रहते हैं और इस वजह से भूत-प्रेत बनने की नौबत भी आ सकती है।

इसलिए आज का काम आज करें, अभी करें, कल पर टालें नहीं। न अपने मुँह से यह कहें कि ये अमुक काम कल कर लेंगे। क्योंकि जो विचार या काम अधूरे रह जाते हैं उनसे मौत के बाद भी मुक्ति नहीं पायी जा सकती है।  हमारे आस-पास और परिवेश में ऎसे भूत-प्रेतों की संख्या हजारों-लाखों में है जो हर काम को कल पर टालते थे, और इस चक्कर में सैकड़ों विचारों और कामों का चिंतन करते-करते ही मृत्यु को प्राप्त हो गए।

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