व्यंग्य राग (१) हंगामा है बरपा / डा.सुरेन्द्र वर्मा

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

image

हंगामा है क्यों बरपा – इसका कोई जवाब नहीं है. हंगामा जो है वह बस बरपाने के लिए ही होता है. हंगामा बरपा है तो केवल धैर्य बनाए रखना है. कुछ नुकसान बेशक हो जाएगा, होना ही है. लेकिन जैसे बाड़ का पानी थम जाता है वैसे ही हंगामा भी थम ही जाएगा. चिता न करें. यही सुचिन्त्य चितन है. जो भी सरकार में नहीं रहा उसने हंगामा बरपा है. कोई नई बात नहीं है. आज की राजनीति हंगामे और हुड़दंग की राजनीति है. विरोध का अब एकमात्र यही तरीका है. ज़माना कहाँ से कहाँ पहुँच गया है. पड़े लिखे लोगों की तरह आज कोई भी सांसद कायर नहीं बनाना चाहता कि ख्वाह-म-ख्वाह बहस-मुवाहिसा करता फिरे. बहस से कुछ होने जाने वाला नहीं है. बल्कि जनता में इससे नेता की छबि खराब ही होती है. उसकी सक्रियता पर प्रश्न चिह्न लगता है. इसके विपरीत हंगामा करते हुए जब उसे टीवी पर प्रस्तुत किया जाता है, जनता को यकीन हो जाता है, वह चुप बैठने वालों में नहीं हैं. वाह, क्या हंगामा बरपा है ! ज़रा देखें तो सही.

राजनीति के वे उदास दिन थे. अपने को पड़े-लिखे सुसंस्कृत समझने वाले लोग तब समाज का नेतृत्व करते थे, निर्वाचन द्वारा चुने जाते थे, और सांसद / विधायक बनते थे. धीरे धीरे जनता को समझ में आगया कि इन्हें केवल वाद-विवाद भर करना आता है. वे लोगों के हित में कोई काम नहीं कर सकते. जो महाबली इन्हें संसद तक पहुंचाते वे ठगे से रह जाते. सो उन्हीं लोगों ने धीरे धीरे नेतृत्व संभाल लिया. ये सक्रिय लोग हैं. इनके साथ बाहु-बल है, पशु-बल है, धन-बल है. आज की राजनीति के लिए और क्या चाहिए ! कभी दिमाग का काम पडा तो उसके लिए बुद्धिजीवियों को आराम से, और सस्ते में, खरीदा ही जा सकता है !

भारत एक रईस देश है. यहाँ पैसे की कमी नहीं है. अरबों करोड़ों के तो यहाँ घोटाले हो जाते हैं. इनसे क्या कभी आर्थिक कठिनाई आई ? मुकद्दमें चलते रहते हैं, नए नए घोटाले प्रकाश में आते रहते हैं. देश चलता रहता है. ऐसे में अगर संसद न चल पाने से करोड़-दो करोड़ का थोड़ा सा नुकसान भी हो जाए तो क्या फर्क पड़ता है ? जनता का पैसा, जनता का पैसा है –चिल्लाने से काम नहीं चलता. बेशक काम पैसे से ही होता है और पैसा कैसा भी हो –सफ़ेद या काला –जनता का ही होता है. पैसे की तो यह नियति ही है. कमाइए या दान में लीजिए. बर्बादी कीजिए या आबादी कीजिए. एक ही बात है. हंगामा होने दीजिए. मत पूछिए हंगामा है क्यों बरपा !

हंगामा और हुडदंग, प्रदर्शन और नारेबाज़ी, ये कभी नहीं देखते कि कहाँ, कब और किसके लिए संपन्न हो रहे हैं. बाज़ार में तो होते ही हैं, विधानसभाओं और संसद में भी इन्होंने अपनी जगह सुरक्षित कर ली है. किसने ही पीठासीन इसके शिकार हुए है. होते रहेंगे. संसद के अध्यक्ष की कुरसी है तो क्या? आखिर कुरसी ही तो है. वह क्यों सुनने लगी ! हम तो ठीक उसके सामने खड़े होकर लगाएंगे नारे, करेंगे हुड़दंग, कोई क्या कर लेगा ? अजी, निलंबन तो होते ही रहते हैं, और निलंबित बहाल भी होते रहते हैं. चलता है. हुड़दंग तो जारी रहेगा. निलंबन तो उसे और भी हवा देगा. हंगामे को हवा देना है तो शौक से दीजिए, देते रहिए – परनाला तो यहीं बहेगा. हंगामा करना तो हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है, करते रहेंगे. विपक्षी हैं. अभी क्या हुआ है ? बोफोर्स जितना फ़ोर्स तक तो अभी इस्तेमाल हुआ नहीं है ! न बहस न सवाल - हमारा मकसद है सिर्फ बवाल. माना इस हुड़दंग को देखकर दर्शक दंग हैं, पर उन्हें तंग करने के लिए तो यह है ही. हंगामा बरपा ही इसीलिए है न.

--

 

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "व्यंग्य राग (१) हंगामा है बरपा / डा.सुरेन्द्र वर्मा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.