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अंगारे से कहीं ज्यादा विस्फोटक : मंटो - वीणा भाटिया

11 मई / सआदत हसन मंटो के जन्मदिवस पर विशेष

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उर्दू अदब में सआदत हसन मंटो ने यथार्थवादी लेखन की जो शुरुआत की, वह दरअसल एक नई परंपरा की शुरुआत थी। जैसे अफ़साने उन्होंने लिखे, वैसे न तो उनके पहले लिखे गए थे और न ही बाद में लिखे गए। इस दृष्टि से वे एक सर्वथा मौलिक लेखक थे। आज भी उनकी कहानियां जितनी पढ़ी जाती हैं, उससे पता चलता है कि उनकी लोकप्रियता कितनी व्यापक है। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, उनके साहित्य के पाठकों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है। सआदत हसन मंटो ने अपने अफ़सानों में जिस सामाजिक यथार्थ का चित्रण किया है, वैसा पहले कभी नहीं किया गया था। यथार्थ की जिन परतों को उन्होंने बारीकी से उघाड़ा, जिन वर्जित क्षेत्रों में जाने का दुस्साहस किया, उसके लिए उन्हें बड़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी।

मंटो ने जब अफ़साने लिखने शुरू किए, उस समय तक प्रगतिशील लेखन में मील का पत्थर कहा जाने वाला बहुचर्चित कहानी-संग्रह ‘अंगारे’ का प्रकाशन हो चुका था, लेकिन उनका लेखन ‘अंगारे’ से कहीं ज़्यादा विस्फोटक था। इसने ज़हरबुझी सच्चाइयों को इस क़दर पेश करना शुरू किया कि उस वक़्त बहुतों से वह हज़म नहीं हो पाया। उनकी कहानियों को अश्लील घोषित कर मुकदमे तक चलाये गए। साथ ही, उस दौर में इस्मत चुग़ताई जैसी लेखिका पर भी अश्लीलता के आरोप में मुकदमा चला, जिन्होंने स्त्री समलैंगिकता पर ‘लिहाफ़’ जैसी कहानी लिखी थी। दोहरे मानदंडों पर चलने वाले नैतिकता के ठेकेदारों को यह सब बहुत बुरा लगा। उन्होंने मंटो को फ़हशनिग़ार घोषित कर दिया। कहा जाने लगा कि वह सेक्स को भुनाने वाला दो कौड़ी का लेखक है। पर नैतिकता के तथाकथित ठेकेदारों को मंटो के अफ़सानों में सेक्स और अश्लीलता तो नज़र आई, पर समाज के हाशिये पर जीने वाले उन लोगों के विडंबनापूर्ण जीवन की त्रासदी नज़र नहीं आई जिनका प्रवेश तब तक उर्दू अदब में नहीं हो पाया था। मंटो ने साहित्य में उन लोगों के जीवन की कड़वी सच्चाइयों को सामने लाया जो समाज के सबसे निचले पायदान पर थे। इस क्रम में उनके साहित्य में वेश्यायें, उनके दलाल और सड़कों पर फटोहाल ज़िंदगी बिताने वाले आवारागर्द लोग मुख्य भूमिकाओं में दिखाई पड़ते हैं, तो इसमें ग़लत क्या था ?

मंटो ने देश के विभाजन पर जैसे अफ़साने लिखे, वैसे हिंदी-उर्दू में कम ही लिखे गए हैं। ‘ठंडा गोश्त’, ‘काली शलवार’, ‘बू’, ‘खोल दो’, ‘टोबाटेक सिंह’ जैसी कहानियां किसी भी भाषा के साहित्य में दुर्लभ कहानियों की श्रेणी आएंगी। ‘ठंडा गोश्त’, ‘काली शलवार’ जैसी कहानियों पर अश्लीलता के आरोप में मुकदमे चले, पर बाद में मुकदमों की सुनवाई कर रहे जज ने भी कहा कि इनमें अश्लीलता नहीं है, कहीं से भी मंटो की कोई कहानी कामोत्तेजना भड़काने वाली नहीं है।

विभाजन की त्रासदी पर हिंदी-उर्दू सहित अन्य भाषाओं के लेखकों ने विपुल लेखन किया है, पर मंटो अपनी कहानियों में जिस प्रकार विभाजन की पीड़ा और त्रासदी को उभारते हैं, वह जटिल और संश्लिष्ट यथार्थ के अनेक पहलुओं और परतों को सामने लाता है। मंटो एक ऐसे लेखक हैं जिनका जन जीवन से गहरा सरोकार है। वे उपेक्षित-उत्पीड़ित जनता के लेखक हैं। समाज में जो सबसे निचले स्तर पर है, उसके जीवन-यथार्थ को पूरे सरोकार के साथ वे साहित्य में लाते हैं। इसलिए अगर वेश्यायें उनके अफ़सानों में आती हैं तो इसमें आश्चर्य क्या ! मंटो किसी स्त्री के वेश्या बनने की विंडबनापूर्ण मजबूरी पर ही सवाल खड़ा करते हैं और इसके साथ ही समाज व्यवस्था को भी कठघरे में ले आते हैं। उनके लेखन की यह खास तासीर है।

मंटो पर विचार करते हुए एक खास बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि वे प्राकृतिक यथार्थवाद यानी नेचुरलिज़्म और फ्रायडवाद के प्रभाव में भी थे। यही वजह है कि कहीं-कहीं उन्होंने ज़्यादा ही सेक्स-चित्रण किया है, जिससे उनके आलोचकों को उन पर अश्लील लेखन का आरोप लगाने का मौका मिल जाता है। उदाहरण के लिए ‘धुआं’ कहानी को लें। इसमें किशोरावस्था में होने वाली सेक्स संबंधी सहज संवेदना और उससे संबंधित गतिविधियों का चित्रण किया गया है। यद्यपि कहानी का शिल्प विधान अनूठा है, फ़नकारी ज़ोरदार है, पर कहानी मनोविज्ञान पर ही केंद्रित होकर रह जाती है। पर ऐसी कहानियां बहुत ही कम, नहीं के बराबर हैं। मंटो की अधिकांश कहानियां यथार्थपरक, सोद्देश्य और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। उनके साहित्य में जो सच है, वह आज भी प्रासंगिक बना हुआ है। आज जब समाज में साहित्य हाशिये पर चला जा रहा है, मंटो के साहित्य के पाठकों की संख्या लगातार बढ़ती चली जा रही है। यही तथ्य इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि मंटो कालजयी रचनाकार हैं।

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