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लघु रचनाएँ / संजय दुबे

संजय दुबे इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)

...फिर वह महिला कौन थी ?

करीब चार वर्ष पहले की बात है। नवंबर महीने की एक रात के दो से ज्यादा बज चुके थे। घना अंधेरा था। सड़क सुनसान थी। मैं अपने साथी के साथ अमर उजाला अखबार के दफ्तर से घर लौट रहा था। ठंड की शुरुआत हो चुकी थी। सिविल लाइंस से मेडिकल चौराहा पार करते हुए हम लोग सीएमपी कालेज के सामने से गुजरते हुए देहाती रसगुल्ले वाले तिराहे से मधवापुर की ओर बाइक से बढ़ रहे थे। तभी न जाने क्या सूझी, हम दोनों लोग सब्जी मंडी के पहले अपनी बाइक रोक दिए। चूंकि हमारा रोज का उधर से आना जाना था, इसलिए हम दोनों लोग अक्सर वहां खड़े होकर कुछ देर बातें किया करते थे। उस रात भी वैसा ही किए।

तभी हम जहां खड़े हुए थे उसके ठीक सामने करीब दस मीटर से भी कम दूरी पर सफेद साड़ी पहने लहराते बाल वाली एक महिला दिखी। ऐसा लग रहा था कि वह कुछ बोल रही थी। रात-विरात आते-जाते ऐसे लोग अचानक दिख जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। बेचैन कर देने वाली बात तो उसके बाद हुई। बीच सड़क पर दिख रही वह महिला मुश्किल से बीस-पचीस सेकेंड के बाद ही वहीं से गायब हो गई। मैं पहले ही बता चुका हूं कि ठंड की उस रात में घना अंधेरा था। तो भी इतना तो साफ था कि दस मीटर या इससे भी अधिक दूर पर कोई खड़ा हो तो साफ-साफ दिख जाए। बहरहाल मेरे साथी तुरंत ही बोल पड़े ' यह चुड़ैल है '। यह सुनकर मैं चौंक गया। फिर हम दोनों कुछ देर वहीं खड़े रहे।

दस पंद्रह मिनट के अंदर वह महिला चार बार दिखी और गायब हुई। अगर वह इधर-उधर कहीं बढ़ती तो मैं समझता कि वह कोई गरीब, बेसहारा, विधवा होगी, जो यूं ही रात में घूम रही है, पर ऐसा नहीं था। वह उसी जगह दिखती और गायब हो जाती। मैं सपना नहीं देख रहा था। पूरे होशहवास में था। ऐसे में जैसा कि आम तौर पर होता है, हमें डर जाना चाहिए। पर वैसा हुआ नहीं। उस अंधियारी रात को हम दोनों उस जगह पर जाकर खड़े हो गए, जहां वह महिला खड़ी थी। तकरीबन डेढ़ घंटे वहीं रुककर हम बातें करते रहे, लेकिन फिर वह नहीं दिखी। हमारी ऐसी कोई मंशा नहीं है कि चुड़ैलों, भूत-प्रेतों का महिमामंडन करूं या फिर उनके प्रत्यक्ष होने का समर्थन करूं, लेकिन जो कुछ हुआ वह सीधे-सीधे खारिज कर देने वाली बात नहीं है।

मैं फिर बता रहा हूं कि उस रात को मैं और मेरे साथी पूरे होशहवास में थे। उसके बाद से हम दोनों लोग रात में सैकड़ों बार आए-गए होंगे, लेकिन वह कथित चुड़ैल फिर नहीं दिखी। यह बात हमने अपनी पत्नी और कुछेक साथियों को छोड़कर कभी किसी से नहीं बताई। आज चार बरस बाद किसी मुद्दे पर हमारे एक अन्य साथी के साथ उस रात की बात चली तो मैंने उन्हें यह हकीकत का किस्सा सुनाया। आप इसे कपोलकल्पना कहकर इस पर अविश्वास जता सकते हैं, या फिर हमें सनकी घोषित कर उपहास कर सकते हैं, लेकिन सच मानिए वह सामान्य महिला नहीं थी और उसे गायब होते और फिर सामने आ जाते हमने वास्तव में देखा था। अब अगर वह चुड़ैल नहीं थी तो वह कौन थी।

इस रहस्य से कौन हटाएगा पर्दा ?

दुनिया रहस्यों से भरी है। जो न सोचा गया, न कहा गया, न देखा गया, न ही बताया गया, न कभी हुआ, वह सब हो जाता है। समुद्र की तलहटी से लेकर आकाश की ऊंचाइयों तक, सेकेंड के लाखवें हिस्से से लेकर अनन्त काल तक, अपारदर्शी हवाओं के भी पार जाकर मनुष्य ने जीवन के इन रहस्यों को जानने का यत्न किया, लेकिन वह इसमें जितना समाता है, उतना ही उलझता जाता है। आखिर दुनिया क्या है, दुनिया का निर्माण क्यों हुआ। ये पेड़-पौधे, ये पशु-पक्षी, ये गांव-नगर, ये नदी-तालाब-सागर, ये पहाड़-पर्वत, ये घाटी-कंदराएं, ये बादल-घटाएं, ये दिन-रात, ये आकाश-तारे, सूर्य-चंद्रमा और ये महिला-पुरुष आखिर क्यों हुए, क्यों बने, किसने बनाए। अगर देवी-देवता या अलौकिक शक्ति है तो क्यों है। इन्हें किसने बनाया और जिसने बनाया तो उसे किसने बनाया। उसकी जरूरत क्यों पड़ी। जिसे हम प्रकृति कहते हैं, वह प्रकृति क्यों है।

जरा सोचिए, विचार करिए, दिमाग पर जोर डालिए। क्या कोई ऐसा है जो इस पर से परदा हटा सके। कल्पना कीजिए कि अगर यह दुनिया न होती, भगवान या किसी अलौकिक शक्ति का अस्तित्व न होता, समय या दृश्य का भी अस्तित्व न होता, चर-अचर, जीव-निर्जीव कुछ भी न होता तो क्या होता। यह ब्रह्मांड भी न होता। कहते हैं कि उस स्थिति को शून्य समझा जाएगा। पर यह शून्य भी क्यों रहे। इसकी भी क्या जरूरत है। यह शून्य भी न रहे तब क्या होता। जो होता उसकी भी जरूरत न होती, तब क्या होता। यह सोच बड़ी विचित्र है। हमारे दार्शनिकों और ब्रह्मांड विज्ञानियों के सामने यह बड़ी चुनौती है।

धरती नाप लेने, सागर की अतल गहराइयों को छान मारने और अंबर की ऊंचाइयों को छू लेने को अपनी उपलब्धियां बताने वाले मानव ने अब मंगल ग्रह पर भी कदम रख दिया है। उसका लक्ष्य तो अभी और ऊंचा है। वह दिन भी जल्द आएगा, जब मनुष्य चंद्रमा और मंगल की भूमि पर दशहरा, ईद, क्रिसमस और बैशाखी मनाएगा। विज्ञान अध्यात्म को चुनौती दे रहा है। अध्यात्म विज्ञान को भौतिक ज्ञान तक ही सीमित मानता है। आध्यात्मिकविदों का मत है कि विज्ञान प्रकृति का विनाश कर स्वयं प्रभुतासंपन्न होना चाहता है। मानव ने परमाणु की खोज की अच्छे कार्यों के लिए तो मानव ने आगे बढ़कर परमाणु बम भी बना डाला, जो मनुष्य के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन बैठा है। मनुष्य ने सुख-साधन के तमाम विलासी उपकरण बना लिए तो वे भी मनुष्य का आलसी प्राणी बना दिए। साइकिल से लेकर सुपरसोनिक विमानों का आविष्कार करके मानव ने दुनिया को वैश्विक गांव बना दिया तो दुर्घटनाओं में जान गंवाने का सिलसिला भी शुरू हो गया। चिकित्सा विज्ञान ने मानव कोशिकाओं से लेकर जीव की संपूर्ण संरचना के लिए जिम्मेदार जींस तक का पता लगाकर मनचाहा जीव पैदा करने की लालसा पूरी कर ली तो रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग ने मानव जाति की हड्डियों को गला दिया। आज मनुष्य स्वाइन फ्लू से लेकर एड्स तक गंभीर बीमारियों से पीड़ित है। दुनिया की रंगीनियत को देखने-समझने के लिए मोटे फ्रेम के चश्में का प्रयोग करना मनुष्य के लिए मजबूरी बनता जा रहा है। वजह साफ है कि बेसुरी जीवन शैली से मनुष्य की आंखें समय से पहले जवाब देने लगी हैं।

बहरहाल 2020 तक दुनिया में आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहे भारतवर्ष के लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस रहस्यमय संसार के अस्तित्व की वजह क्या है। सवा अरब से अधिक की जनसंख्या वाले इस राष्ट्र में क्या कोई ऐसा है जो इस पर से परदा हटा सके।

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जोर से बोलें जय भ्रष्टदेव जी

भ्रष्ट होना एक महान कार्य है। भ्रष्ट होने के अपने फायदे हैं। भ्रष्ट व्यक्ति लोगों के सामने डंके की चोट पर हर काम के लिए रिश्वत लेता है। उसे बड़ी चतुराई से न्याय की दुंदुभी बजाने वालों से बचा लेता है। रिश्वत न देने वालों को अपने कार्य कराने के लिए विवश करता है। रिश्वत के पैसे के बल पर वह ऊपर के अफसरों का प्रिय बन जाता है। उसके पैसे से वह आलीशान घर बनवा लेता है। अच्छी गाड़ियों में चलता है। उसके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। सूट-बूट तो वह जब चाहे और जितनी संख्या में चाहे बनवा लेता है। समाज के तमाम भ्रष्टखोरों से उसके निजी सम्बन्ध होते हैं। उनकी मॉडल सरीखीं पत्नियां शहर की गन्दगी से भरीं सब्जी मंडी, गल्ला मंडी और बाजार के नाम पर जगह-जगह खुली कॉस्मेटिक्स और कपड़ों की दुकानों से खरीदारी न करके सीधे मालों या बिग शॉपों से करती हैं।

ईमानदारी की सौगंध खाकर नियम-कानूनों का पालन करने वाले गिनती के कर्मचारियों तथा अफसरों की पत्नियां और बच्चे क्या इस सुख को कभी पाते हैं। वे मध्य-निम्न वर्ग की श्रेणी जैसी लाइफ स्टाइल जी लें यही बहुत है। वर्ना तो वे जीवन भर महंगाई का रोना रोते-रोते और सुख को ललचाई भरी नज़रों से देखते-देखते ही एक पीढ़ी पार कर लेते हैं। हमारे शहर में कुछ दिन पहले ट्रैफिक पुलिस ने बिना हेलमेट लगाये टू-व्हीलर चलाने वालों के विरुद्ध अभियान चलाया और ऐसे लोगों का चालान करना शुरू किया तो हमारे जानने वाले एक ईमानदार और प्रतिष्ठित सज्जन जी इतने भयभीत हो गए कि वे अब पैदल चलते हैं तो भी हेलमेट लगाए रहते हैं। वहीँ दूसरी तरफ हमारे पड़ोसी भ्रष्ट जी बिल्कुल निडर होकर अपनी करिज्मा बाइक से चौकड़ी मार रहे हैं। आखिर भ्रष्टाचार की ताकत के आगे ट्रैफिक पुलिस के अभियान की क्या बिसात है। जोर से बोलें जय भ्रष्टदेव जी।

साइकिल की रोमांचकारी सवारी

हवाई जहाज, हेलीकाप्टर और मोटर कारों के आज के जमाने में साइकिल की बातें करना शायद मजेदार न लगे, लेकिन अंग्रेजों के जमाने में साइकिल खरीदना हवाई जहाज खरीदने जैसा ही था। तब टेलीविजन, रेडियो, मोबाइल, बेसिक टेलीफोन आदि नहीं थे। टीवी और रेडियो का आविष्कार हो जरूर गया था, लेकिन ये कुछ ही शहरों और उनमें भी कुछ ही लोगों के पास उपलब्ध थे।

स्वतंत्रता प्राप्ति से कई दशक पूर्व इलाहाबाद के यमुनापार इलाके में साइकिल के बारे में किसी ने नाम तक नहीं सुना था, देखना तो दूर की चीज है।

शहर के सिविल लाइंस में अंग्रेजी लोग रहा करते थे। वहां हिंदुस्तानियों को जाने की इजाजत नहीं थी। शहर के रईस और मानिंद लोग, जिनका उठना-बैठना अंग्रेजी हुकूमत के साथ था, वे आया-जाया करते थे। ये लोग साइकिल, बग्घी और मोटर-कारों की सवारी करते थे। आम हिंदुस्तानी और देहाती लोग इससे अपरिचित ही थे। तब आज की तरह अखबार पढ़ने का प्रचलन नहीं था। 15-16 बरस की उम्र में शादी हो जाती थी। ज्यादातर लोग खेती-किसानी ही करते थे। बात उसी दौर की है।

यमुनापार के करछना तहसील में गंगा किनारे एक गांव था चटकहना। यहीं के पं. कमला प्रसाद द्विवेदी कुछ पढ़-लिख लिए थे। घर से बाहर कदम रखा तो स्टेशन मास्टर की नौकरी पा गए। उन दिनों जरा सा पढ़े-लिखे लोग भी सरकारी महकमे में बाबू बन जाते थे। काफी दिन बीतने के बाद शहर में रहते हुए कमला बाबू कहीं से साइकिल चलाना सीख लिए। जब उन्होंने पहली बार साइकिल खरीदी तो उन्हें बड़ा रोमांच महसूस हुआ। कुछ ऐसा मानों नोबल पुरस्कार जीत लिए हों। उन्हें खुशी का ठिकाना नहीं था।

यकीं करिये हफ़्तों तो वे उसे कमरे में बड़े सम्मान के साथ रख रोज देखा करते थे। इस तरह कई दिन गुजर गए। यूं कहिये कई हफ्ते गुजर गए। एक दिन उन्होंने विचार किया कि इसे गांव ले चलना चाहिए। पर एक समस्या थी। शहर से नैनी की ओर बढ़ने पर पुराने यमुना पुल के आगे तब पिछड़े गांव जैसे हालात थे। सड़कें कच्ची थीं। कुछ-कुछ जंगल जैसा दृश्य था। नैनी जेल और रेलवे स्टेशन थे, परन्तु उससे एक-दो किमी आगे निकल आने पर हर तरफ खेत-खलिहान ही दिखते थे। राह चलते लोग एक-दूसरे से नमस्कारी करते और हाल-चाल जरूर पूछते थे। बड़े-छोटे का अदब-लिहाज था। पाठशालाएं थीं, लेकिन अधिकतर के पास अपने भवन नहीं थे। गांवों में वैसे आज भी पेड़ों की छांव में शिक्षा दी जाती है। इस माहौल में जब लोग साइकिल के बारे में जानते तक नहीं थे, तब साइकिल ले आने पर उनमें कौतूहल तो जगेगा ही। लोग उसे पहली बार देखेंगे तो क्या सोचेंगे, उन्हें कैसा लगेगा, क्या वे डर जाएंगे, महिलाएं और बच्चे तो सचमुच घबड़ा जाएंगे। दृचक्रपथगामिनी को देखकर वे कुछ रोमांचित होंगे तो कुछ सिहर भी जाएंगे। छोटे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर खड़ा बच्चा तेज रफ़्तार से आ रही किसी एक्सप्रेस या मेल गाड़ी को देखकर डर के मारे पीछे हट जाता है, कुछ वैसे ही जब गांव की पगडण्डी पर साथ चलते लोगों से साइकिल सवार तेजी से आगे निकलेगा तो वह सिहर जाएगा। ऐसे ही तमाम विचार उनके दिमाग में उमड़-घुमड़ रहे थे। वे बेचैन थे, कैसे ले चलूं साइकिल। रास्ते में लोग घूर-घूर कर देखेंगे तो कैसा लगेगा।

आषाढ़ बीत गया था, सावन की हरियाली शबाब पर थी। गांवों में पेड़ों पर झूले पड़ गए थे। लड़कियां नीम के पेड़ों पर रस्सियाँ लटका उस पर लकड़ी के पीढ़े रखकर गाना गाती हुई झूला झूल रही थीं। बीच-बीच में रिमझिम बारिश भी हो रही थी। कुरता-धोती पहने कमला बाबू हनुमान जी का नाम लिए और चल दिए गांव की ओर। साइकिल के पैडल पर तेजी से पैर चलाते हुए बीच-बीच में घंटी बजाते हुए वे आगे बढ़ रहे थे। बमुश्किल नैनी स्टेशन से एक मील आगे बढे़ होंगे कि लोगों की नजरें उनकी ओर पड़ने लगीं।

अपनी ओर लोगों के घूर-घूर के देखने से वे भी सहम से गए। जो जहां दिखता वहीं ठिठक जाता। मानों पहाड़ टूट पड़ा हो। गांवों में तमाम तरह की चर्चाएं होने लगीं। खैर किसी तरह गांव के मुहाने पर पहुंचे। अपना गांव अपना होता है। वहां वे साइकिल से उतरकर पैदल ही चल दिए। यहां भी हाल वैसा ही था। हर कोई उन्हें देखता और ठिठक जाता। घर पहुंचे तो पूरा घर एक साथ बाहर निकल आया। जंगल की आग की तरह कानाफूसी पूरे गांव में होने लगीं। कुछ मिनटों में पूरा गांव कमला बाबू के दुवारे जुट गया था।

आश्चर्य की बात तो यह थी कि हर कोई साइकिल की तरफ ही देख रहा था, लेकिन कोई भी उसके पास नहीं जा रहा था। लोग विस्मित थे। जवानी के जोश में कमला प्रसाद भी उत्साहित थे। काफी देर तक माहौल में सन्नाटा पसरा रहा। सन्नाटे को स्वयं कमला ने ही तोड़ा। साइकिल को स्टैंड से उतारकर तेजी से आगे बढे़ और सामने खाली जमीन पर चक्कर लगाते हुए चलाने लगे। यह देख सभी लोग पीछे हट गए। बच्चे एक-दूसरे से चिपक गए। बूढ़े पीछे हो लिए। महिलाएं जो कम ही बाहर निकलती थीं, वे भी घूंघट की ओट में यूं निहारने लगीं, जैसे भूडोल आ गया हो। साइकिल की घंटी बजते ही लोग सिहर जाते थे। लोगों के आश्चर्य को देखकर कमला प्रसाद ने रफ़्तार बढ़ा दी और हवा से बातें करने लगे।

दिन बीत गया। रात बीती तो अगले दिन बड़े सवेरे ही पंचायत बुलाई गई। गांव के बुजुर्गों ने कहा कि वे अपने जीवनकाल में दो ही घंटियां सुने हैं-एक देवस्थलों में बजने वाली और दूसरी पाठशालाओं में बजने वाली घंटी, ये तीसरी घंटी कैसे बनी। बहरहाल पंचायत में कमला प्रसाद तलब किए गए और उन्होंने सबको साइकिल के आविष्कार, इसके फायदे और चलाने की विधि समझाई। साइकिल की रामकहानी सुनकर लगता है कि आज की भागमभाग जिंदगी से हजार गुना अच्छा था तब का गंवईं माहौल।

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