मंगलवार, 17 मई 2016

कहानी संग्रह - अपने ही घर में / रिक्तता ही रिक्तता : लाल पुष्प

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

रिक्तता ही रिक्तता

लाल पुष्प

तरह-तरह की रोशनियाँ, तरह-तरह की मिठाइयाँ। उसने रोशनियों की ओर नहीं देखा, मिठाइयों को हाथ भी नहीं लगाया। उसके आसपास का शोरगुल, जो आम तरह भी उसे मन के किसी तन्हा कोने में फेंक देता था, आज ज़्यादा बढ़ा हुआ था। जब भी यह दीवाली आई, उसने आसपास के शोर में खुद को ज़्यादा अकेला पाया। और वह तीन बार आई थी। उसे लगा, हमेशा लगता था, जब भी यह दीवाली आई तो राम अयोध्या लौट आया... लेकिन वह अपनी अयोध्या छोड़ आया था। राम जब अयोध्या छोड़कर बनवास गए होंगे, बनवास के कष्टों की पीछे भी उनमें एक उम्मीद रही होगी, कि कभी न कभी, चौदह साल बाद वह अयोध्या वापस लौटेगा। उसे तो एक बार अपनी अयोध्या छोड़ने के उपरान्त वह उम्मीद भी न रही।

लिंकिंग रोड, बान्द्रा, मुम्बई।

और उसकी ‘अयोध्या’ ?

वहाँ से चालीस मील दूर, लोकल गाड़ी से सिर्फ़ दो घंटे, सिंधूनगर के नाम से।

उसने शाही रास्ता छोड़ा और फुटपाथ पर चलने लगा। ऐसे दिन किसी कार या टैक्सी के नीचे मरना अच्छा नहीं है। लाल बत्तियाँ, हरी बत्तियाँ, सभी रंगों की बत्तियाँ, रंग-बिरंगे परदे, खिड़कियों पर लटके, जिन पर बत्तियों के अक्स काँप रहे हैं। उन पदरें के पीछे गूँजते ठहाके, उन पदरें के आगे जलते पटाखे। उसके जहन में सब दीप बुझ गए और सभी कोनों में अंधेरा छा गया। उसकी अयोध्या, गैर पारदर्शी अंधकार की परदे के पीछे गुम हो गई। हाँ, उसके आगे यादें रहीं, यादें, जलते पटाखे?

गज़ेबो के पास एक निहायत ही खूबसूरत, फैशनबिल औरत आगे बढ़ी, यहाँ-वहाँ नज़र फिराई, सामने खड़ी टैक्सी के भीतर बैठे मर्द की बाहों में चली गई और उसके बाहों में चले जाने से टैक्सी भी चली गई। दो मिनट के बाद एक दूसरी टैक्सी आई, शायद दूसरी औरत के इन्तज़ार में। उसने वहाँ से जाना चाहा। उसे किसीका इन्तज़ार न था, न किसी को उसका इन्तज़ार था। मुद्दत हुई, उसे इस लफ़्ज़ से ही चिढ़ थी, क्योंकि उसने किसी पर भरोसा नहीं किया था। सिर्फ़ उस एक ‘इन्तज़ार’ में ही किया था। लेकिन बाद में जाना वह भी स्थाई नहीं, कितना भी तवील है लेकिन स्थाई नहीं है, क्योंकि कभी न कभी पूरा हो जाने वाला है इसलिये सच नहीं है। क्योंकि जब संपूर्ण हो जाता है तो फिर कोई चाह बाक़ी नहीं रहती, क्योंकि...!

उसके दिमाग़ का इंजन ख़यालों के खाली डिब्बे घसीट रहा था, क्योंकि उसकी हर बात के पीछे ‘क्योंकि’ है ....

वक़्त बीते नहीं बीता तो वह हर कहीं खड़ा रहा, जैसे-तैसे खड़ा रहा। अंधकार के सिर्फ़ चंद टुकड़े, रोशनी की जगमगाहट बर्दाश्त न कर पाने के सबब, डर से बिल्डिंग की दाईं तरफ़ वाली दीवारों पर चढ़ गए थे। वहाँ भी जब बीच-बीच में, ज़मीन से काफ़ी ऊपर जाते राकेटों की रोशनी उन्हें ढूँढ़ लाती, तब वो जैसे ज़्यादा डर में थर-थर काँपने लगे... एक क्षण में, आपस में, अनेक छोटे-छोटे टुकड़े होकर, उसी चमक में घुलकर फिर से आपस में समाकर एक हो गए।

‘साहब, मोमबत्तियाँ लीजिये। एक आने की दो, मेहरबानी करके ले लीजिये’, एक लड़का उसके नज़दीक आया।

बच्चे हैं जो मोमबत्तियाँ ले रहे हैं और वह भी बच्चा है जो बेच रहा है। उसने एक आना दिया, मोमबत्तियाँ नहीं लीं। उन छोटी-छोटी, बारीक मोमबत्तियों से उसके जहन में कोण रौशन न होंगे। थोड़े समय के लिये, उनकी काँपती लौ में हल्की रोशनी में वह अपनी यादों को समेटने की कोशिश करेगा भी, तो इस बीच मोमबत्तियाँ खत्म हो जाएँगी और वे यादें जहन के भीतर, बहुत दूर-दूर फासलों में खो जाएँगी। देर हो जाएगी, फुर्सत नहीं है, फ़ायदा भी नहीं है। दाइमी रोशनी, अयोध्या, सिंधूनगर पीछे छूट गया है। बीच में मजबूरियाँ हैं, उनमें वज़नदार ताले लगे हुए हैं, क़दम-क़दम पर लोहे के दरवाज़े हैं और हर दरवाज़े की हर सलाख के सामने पहरेदार है, और हर पहरेदार के हाथ में बंदूक है और हर बंदूक में गोलियाँ हैं।

पैदल करते, लिंकिंग रोड पार हो गया। वह सिनेमा घर पार करके वहाँ पहुँचा जहाँ चार रास्ते बन रहे थे। बाईं तरफ़ वाला, जिसके कोने पर फर्नीचर की शाही (शाही लोगों के लिये) दुकान है, सीधा समुद्र की तरफ़ ले जाने वाला है और आगे बढ़ने से समुद्र का शोर भी, खास करके रात के वक़्त सुनने में आता है। इस शोर में कितने पापों की आवाज़ दब जाती है। उसे समुद्र अच्छा लगता है। इन्सानों से भी ज़्यादा अच्छा लगता है। मुम्बई समुद्र है, पर पहाड़ उसे समुद्र से भी ज़्यादा अच्छे लगते हैं। सिंधू नगर में बहुत पहाड़ हैं। वह तो रहता ही पहाड़ों के चरणों में था। उसका मक़सद, जिसमें अब उसका विश्वास नहीं रहा है, उसने अब महसूस किया है कि शायद उसका वह मक़सद था ही नहीं और वह मक़सद उसके लिये गलत था, या वह खुद उस मक़सद के लिये ग़लत आदमी था। यह बात सबसे पहले इस पहाड़ पर ही उसके सामने खुलासा हुई। दूसरा रास्ता सीधा गोडबंदर रोड से जा मिलता, तीसरा रास्ता, जिसके कोने पर पार्क के नाम पर छः क़दमों के छोटे दायरे में सूखे हुए घास के चारों तरफ़ चार झूले बाँधे गए थे, बांद्रा स्टेशन की तरफ़ जाता था। चौथा पीछे, वही गोडबंदर रोड।

उसने सोचा, कौन-सा रास्ता लूँ, या कोई न लूँ, वापस मुड़ जाऊँ ? देर नहीं हुई थी क्योंकि पटाखों की आवाज़ अभी ज़ोर नहीं पकड़ पाई थी। इस तरफ़ जैसे रात बढ़ती जाती है, पटाखों की आवाज़ तेज़ होती जाती है।

इस वक़्त वह कहाँ होता ? उसने सोचा, और फिर उसने सोचा कि इन सवालों में कहीं कुछ गड़बड़ है। जब तक उसमें यह नहीं जुड़ जाता कि वह अगर इस वक़्त ‘कहीं’ होता था तो कहाँ होता ? शायद उसके जहन के पीछे सिंधूनगर था। यानि वह इस वक़्त सिंधूनगर में होता, तो वहाँ-कहाँ होता था ? इसके लिये वक़्त देखना ज़रूरी है। कोई मिल जाए ....।

‘वक़्त कितना हुआ है ?’ तेज़ी से आते एक आदमी से उसने पूछा। उस आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया, हालाँकि घड़ी भी देखी! जल्दी-जल्दी उसके पास से गुज़रते एक बार उसे देखता गया। उस नज़र से ज़ाहिर था जैसे ‘ये भी कोई वक़्त पूछने का वक़्त है ?’

शायद नौ बजे हैं।

एक छोटे, तंग, अंधेरे, सिर्फ़ बीच-बीच में दुकानों की रोशनियों से रौशन होकर फिर अंधेरे में डूबता रास्ता, जो उसके घर से शुरू होकर सीधा मुख्य चौक पर खतम हो जाता है। उसके घर से उस मुख़्य चौक तक हर क़दम उठाने से और ज़्यादा रौशन होता जाता है। बीच में से टूटा-फूटा है, ऊपर-नीचे है, पैरों को कई बार चोटें पहुँचाता है, बीच-बीच में कहीं बैरकों के पास ही बने शोच-कूप की टूटी दीवारों की वजह से गंदी बदबू से भरे, लेकिन इस चौक तक पहुँचते हज़ार हाथ बढ़ जाते हैं, हज़ार निगाहें उठती हैं, हज़ार मुस्कराहटें मिलती हैं। आदमी-आदमी वाक़िफ़ और चप्पा-चप्पा जाना पहचाना। इस राह के हर पत्थर पर वह बैठा है, हर स्तंभ के पास खड़ा है। उन पुलों और स्तंभों के आस-पास उसकी सारी की सारी मुहब्बतें जलीं हैं और सब मक़सद रौशन हुए हैं। उन मैदानों की हवाएँ, उसको दिए हुए किसी के वादे, दौड़ते हुए दूर तक ले गई हैं और पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर छोड़ आई हैं।

वह आज हर रोज़ की तरह, इस वक़्त लगभग नौ बजे तक इस चौक के किसी कोने पर खड़ा हुआ होता तो इस तरह खाली-खाली न होता। इस महानगरी में वह बिल्कुल अकेला है, सब गैर वाक़िफ़ हैं। तीन साल के अंदर उसे इस मुम्बई में यह भी पता नहीं पड़ा है कि उसके पड़ोस में कौन-कौन रहते हैं। कभी कोई मिलता नहीं है, घर में अगर कोई आ भी जाता है तो सिर्फ़ यह कहने कि ‘बर्फ़ चाहिये तो तुरंत मँगवा लीजिये’, जिसके पीछे कहने का मक़सद यही होता है कि वह बताना चाहता है कि उसने फ्रिज खरीद ली है।

उसने फैसला किया कि वह जल्दी पीछे नहीं लौटेगा। हालाँकि आगे चलकर कहीं भी, कुछ भी, उसे क्या मिलेगा, या किसी भी मक़सद से वह कहीं भी क्यों जा रहा है ? उसे कुछ मालूम न था ? उसे यह भी मालूम नहीं था कि उसका यह फैसला, पीछे न मुड़ने का, आगे बढ़ने का, पक्का है या नहीं ? किसी भी तरह के फैसले से उसने देखा है, कोई फ़ायदा नहीं है। और अब बस, गर वह किसी फैसले पर पहुँचा तो सिर्फ़ एक पर- कि कोई भी ‘फैसला’ व्यर्थ है। किसी भी मक़सद की तरह !

फैसला, मक़सद, किसका ? उसका ? वह ‘कौन-सा’ ?’ वह एक ही वक़्त, इन चार रास्तों की तरह, आपस में, अलग-अलग जाता हुआ नही था ! उन ‘सब’ में वह ‘कौन-सा’ था ? जाना जा सकता है ?

समुद्र, सिगरेट, वह एक बड़े पत्थर पर बैठा।

फैसला, मक़सद। उसने एक छोटा पत्थर उठाकर पानी में उछाला। वह गुम हो गया। फैसला, मक़सद। वे उसमें ऐसे ही गुम हो गए। वह भी इस दुनिया में यूँ ही गुम हो गया था।

मुझमें पहले ‘जानने’ की जलन थी। अब उसकी जगह एक और जलन ने ली है। ‘जाना’ जा सकता है ? मैं जो समझता हूँ कि मैं जानता हूँ, वह मात्र धोखा नहीं है,

बिल्कुल आरजी तस्कीन ?

समुद्र नहीं है, पहाड़ हैं। ‘प’ हैं, मैदान हैं, ‘म’ हैं, पुलें हैं पत्थर की, ‘प’ हैं। हम कभी जुदा न होंगे - ‘प’। हम कभी जुदा न होंगे - ‘म’। सिंधू नगर कभी नहीं सुधरेगा। रस्ते हैं ? बस्तियाँ हैं ? बदबू है, गंदगी है, ज़िन्दगी है ? एक-एक होकर सब जा रहे हैं। पहले भी सब एक-एक करके आए थे। ज़िन्दगी सख़्त है, ठीक है, बेहद मुश्किल है, ठीक है, बेकार जा रही है, ठीक है, उसकी आँखों पर बनावटी खूबसूरत चश्मा नहीं है। मेरा तुमसे प्यार नहीं रहा है, ‘म’ है। मजबूरी की बात है ‘प’ है। मेरा यह सबसे ‘गहरा’ ‘आखिरी’ प्यार है, ‘क’ है। तुम बिलकुल सही हो। यहाँ आओ, मेरे क़रीब आओ, सर्दी है, जज़्बात गर्म हैं, रात अकेली है, रास्ते सुनसान हैं। सभी सोए हैं, सिगरेट खत्म है, क़रीब आओ तो तुम्हें सुनाऊँ मुझको भी तुमसे, बहुत ही गहरा और आख़िरी प्यार है। क़रीब आओ (मैं सोच रहा हूँ) इस खूबसूरत फ़रेब से आज की ज़िन्दगी को आसान बनाएँ। नहीं तो तुम जानती हो, मुझसे पहले भी तुमने औरों को यही कहा है, मैं भी ऐसे ही कहता आया हूँ। हमारा हर प्यार सबसे गहरा और आखरीन है। यह दाइमी झूठ एक आरज़ी सच है।

गाड्रेज की अलमारी कब से ट्रक में चढ़ चुकी है। बिस्तरे बाँधे गए हैं। उसके भाई और बहनें पीछे ट्रेन में आएँगे। वह ट्रक में जाएगा, पिता के साथ। पिता के चेहरे पर खुशी है, आँखों में अभिमान है और बदन में फुर्ती है और वह यहाँ-वहाँ देख रहा है कि कोई उसकी तरफ़ देखे।

‘आप भी जा रहे हैं ?’

‘हाँ साईं, अपना फ्लैट लिया है, पूरे बीस हज़ार दिए हैं।’

‘पर फिर भी समझो कि सस्ता मिला है।’

सुनने वालों के मन में ईर्ष्या है। इस गंदी कैंप को अलविदा ! खुशनसीब हो, साईं बहुत खुशनसीब हो, हमारी ऐसी खुशनसीबी कब आएगी ?

लेकिन वह खामोश है। पहाड़ों, मैदानों, दरख़तों और रास्तों से उसने मन ही मन में विदा ले ली है। यह पत्थर की पुल ट्रक में नहीं ले जा सकते? इसके बिना ....।

बाम्बे, चित्तौड़गढ़, आगरा, आदीपुर। बाम्बे-सिंधूनगर-बाम्बे, सिंधूनगर- बाम्बे-सिंधूनगर और आज फिर बाम्बे। इस बार शायद हमेशा के लिये। क्योंकि इस बार अपनी जगह मिली है। वह जहाँ भी बसा, वहीं टूटा। इसलिये ट्रक में, ड्राइवर के पास बैठते, सामने शीशे में अपनी सूरत देखकर उसे लगा कि यह सूरत उसके बाप की उस सूरत से बिलकुल मिलती है जो उन्नीस साल पहले, उसने कराची छोड़ते हुए स्टीमर में डेक पर देखी थी। इस सूरत में कटे हुए पैरों का दर्द था।

उसे अब उठना चाहिये। पीछे लौटना चाहिये। समुद्र के सामने उसे हमेशा माज़ी याद आता है। पहाड़ उसे इसलिये पसंद है। पहाड़ों पर वह अपना माज़ी भूल जाता है। हाल फिलहाल सम्पूर्ण तरह से जीता है। इर्द-गिर्द के माहौल में रहता है। वो उसी हाल में इर्द-गिर्द के माहौल में रहना चाहता है। पिछले हफ़्ते जब उसे नानावती हास्पिटल में एक मरीज़ की टांग कटने की बात सुनी थी - क्योंकि उस मरीज की टांग में ज़हर फैल गया था, तब उसके मन में यही विचार जागा था कि विज्ञान न जाने कब इतनी तरक़्की करेगा जो किसी के माज़ी को काटकर बाहर फेंक देगा, यहाँ, ज़हन से। अगर वह विज्ञानी होता, उसने सोचा था, तो सबसे पहले इसी बात को ईजाद करता। सुख कभी नहीं मिल सकता और सरल ज़िन्दगी कभी नहीं जी सकते, जब तक यह बात ईजाद नहीं होती है।

उसने दूर से बस आती देखी। समुद्र का एक हिस्सा, एक पल के लिये बस के बल्बों की तेज़ रोशनी में चमक कर, फिर गहरे अंधेरे में छिप गया। उसने बस पकड़ी, शायद आख़िरी थी। छोटे फासले के बीच चलती है। जहाँ पूरी होती है वहीं से शुरू होती है। आठ के क़रीब आदमी उतरे और उसके भी आधे, उसके साथ चढ़े। रास्ते पर फ़क़त दो स्टैंड थे, तीसरे पर उतरना था। अचानक उसके मन में आया, वह सीधा चला जाए और वहीं से सिंधूनगर के लिये रवाना हो जाए।

सिंधूनगर....!

वह सिंधूनगर छोड़ने के बाद, बीच-बीच में कितने बार गया था, यूँ ही। अचानक, अनचाही कशिश ! जब भी उसने यूँ महसूस किया, जैसे आज किया, तब उसने महसूस किया कि जैसे उसके पैरों तले कुछ भी न रहा, उसके इर्द-गिर्द एक ख़ला हो और उसके बीच, बिना किसी वजन के, खुद को तैरता महसूस करता हो। जैसे वह महसूस करता हो कि वह कुछ महसूस नहीं कर रहा है।

जब भी वह उस स्थिति से बाहर आया वह एक अजब डर से घिर गया। वह है ?

वह, खुद आप, क्योंकि वह दूसरा कोई नहीं है। महज़ यही एक यक़ीन उसके होने का पूरा सबूत हो सकता था ?

‘‘मोती हो ? अरे कैसे हो ?’

‘मैं ठीक हूँ, तुम कैसे हो ?’

‘मैं ठीक हूँ।’

‘आज इस तरफ़ आए हो ?’

‘बस , ऐसे ही।’

‘बाम्बे में मजा आता है न, खुशनसीब हो।’

वह खामोश रहा।

‘आओ चाय पीए, बातें करें’ मोती ने कहा।

यह वही मोती है, जिससे वह अरसे से मिलना चाहता था। जिसके साथ वह हर रोज़ रात को रस्ते के एक तरफ़ पत्थर की पुल पर बैठकर बातें करता था। खाने के बाद, माज़ी की बातें !! अपने पहले प्यार की, पहली नाकामयाबी की, अपने मक़सद के बारे में। पिता की मजाकिया तबीयत की बातें, मिसालों के साथ। अपने अंदर में एक बेचैन अस्पष्ट शक को छुपाते हुए कि उसके बाप की उस मज़ाकी तबीयत के पीछे हक़ीक़त में अपमान करने की मुराद है। अगर ग़ौर करके देखा जाए तो, सामने वाले को डंक की, उससे उत्पन्न होने वाले कठोर आत्म सुख हासिल करने की भावना, ऊपरी मज़ाक का नक़ाब ओढ़कर नुमायां होने वाले, और वह शक कि कैसे उसे पिता की मौजूदगी ने नर्वस बनाया और मानसिक सतह पर अलग करके खड़ा कर दिया। पहले वह शक जब तक उसमें अज्ञात था, उसने ख़ुद को बाप के लिये इस तरह के ख़याल के लिये खूब फटकारा - बाद में, जब मन में यह साफ़ हो गया, तब वह अपनी ओर वाली फटकार, बाप की तरफ़ हिकारत की सूरत अपनाने लगी। मोती से उसने कभी कुछ नहीं छुपाया, बाप की ओर पनपती यह हिकारत की बात भी सुना दी।

यही मोती उसे मिला था सिंधूनगर में, सिंधूनगर छोड़ने के बाद !!

‘कैसे हो ?’

‘ठीक हूँ।’

‘कैंप छोड़ गए...!’

‘कैसे हो मोती ?’

‘तुम सुनाओ, बाम्बे कैसी है ?’

‘ठीक है।’

‘हो तो बिलकुल ठीक न ?’

‘बिलकुल ठीक।’

‘कुछ और सुनाओ ?’

‘क्या सुनाऊँ मोती, तुम ही कुछ सुनाओ।’

‘कैंप की याद आती है ?’

उसने कहा कि ‘हाँ उसे बहुत आती है।’

और इस तरह बीस मिनिट में, तुम सुनाओ - तुम सुनाओ और ठीक हो - ठीक हूँ के बार-बार के दोहराए गए वाक्यांश से, इन दोनों ने एक दूसरे को काफ़ी बोर किया। जल्दी जुदा होने के लिये दोनों आतुर थे। जुदा हुए, दोनों एक दूसरे से फिर मिलने का वादा करके। लेकिन बीच में कुछ न था। दोनों उससे सावधान थे।

उसके बाद भी वह जब-जब सिंधूनगर गया, जिस किसी से भी मिला, उसने बीच में एक भी कड़ी न पाई। जैसे वह रिक्तता, उसके इस ओर आते वक़्त उसका पीछे करते हुए साथ आई। उस खालीपन में धँस जाने में भी दर्द का अहसास न था, कोई अहसास था ही नहीं, उनमें पहचान के सभी सिलसिले टूट गये थे।

इस बीच उसने देखा, बैरकों के ऊपर पेड़ों की लटकती टहनियाँ काटी गई हैं। जिस होटल में वह घंटों के घंटों बैठकर दोस्तों के साथ गप्पे मारता था, उसका फर्नीचर बदला गया है, मालिक की आवाज़ में तब्दीली आ गई है, वेटर बदल गया है। वह लड़की जिसने उसे ख़त में लिखा था कि वह ‘मुझसे शादी नहीं करोगे तो मैं खुदकुशी करूँगी’, अब दो बच्चों की माँ बन गई है, बेहद खुश है।

ये क्या वही आदमी हैं ? ये क्या वही स्थान हैं ? इन सबके बीच में वो कब, कौन से जमाने में रहा था। रहा था, या सिर्फ़ किसी सिनेमा के पर्दे पर देखा था, शायद किसी नावल या कहानी में पढ़ा था ? या वो सब वही थे - आदमी और स्थान- वह खुद था जो बदल गया था ? बीच में गहरा कोहरा है। सब कुछ निर्मल, पारदर्शी है। उसकी नज़रें बदल रही हैं, जैसे एक नए गैर वाक़िफ़ शहर को देख रही हैं।

सन्नाटा गहरा, रिक्तता बड़ी।

ज़िन्दगी ठहरा पानी है, एक तिनके की तरह वह पड़ा हुआ है, बिना किसी हरक़त के, वह पानी में यहाँ-वहाँ हो भी रहा है तो हवा के झोंके से, न कि अपने बल पर, अपनी सत्ता से, अपनी इच्छा अनुसार....!

स्टेशन की तरफ़ न जाकर उसने घर की तरफ़ जाने वाला रास्ता लिया। बीच में चाय पी लेगा। नहीं, काफ़ी ! कुछ सिगरेट लेगा। पटाखों की आवाज़ अब रख-रखकर हो रही थी। वह तेज़ी के साथ चलने लगा। मन में डर था कि कहीं वह फैसला न बदल दे, यानि स्टेशन की तरफ़ न जाए, सिंधूनगर जाने के लिये। वह फिर नहीं जाएगा। कोई फर्क़ नहीं है, कोई भी दो जगहों के बीच। लेकिन खास करके किन दो औरतों के बीच में। गुज़रे तीन महीनों से और इस बार, यह बड़े से बड़ा अरसा था, वह सिंधूनगर नहीं गया था। कोई फ़ायदा न था। वह जहाँ भी खड़ा है, धरती उसके पावों तले खिसक गई है। उसे कहीं भी नहीं जाना है, किसी से भी नहीं मिलना है और कुछ भी नहीं पाना है।

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------