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किसी के नहीं होते मुद्राभक्षी भिखारी - डॉ. दीपक आचार्य

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जानवरों के बारे में कहा जाता है कि जिसके मुँह खून लग जाता है वह फिर उसे कभी छोड़ता नहीं, उसके जीवन का लक्ष्य ही खून का चस्का होकर रह जाता है। कुत्ता एक बार पागल होकर किसी को काट खाता है, उसके बाद वह मरते दम तक पागल ही बना रहता है जब तक कि वह खुद न मर जाए या कोई मार न डाले।

बाघ भी जब किसी इंसान का खून पी लेता है फिर उसे दूसरा कुछ भी अच्छा नहीं लगता, वह एक के बाद एक इंसान का शिकार करता ही रहता है और उसकी गति-मुक्ति फिर दूसरे लोगों को ही करनी पड़ती है। न कुत्तों का पागलपन  दूर किया जा सकता है, न

नरभक्षी शेरों की आदत को कभी नहीं छुड़वाया जा सकता। वह तो खून पियेगा ही। आदमी भी काफी हद तक ऎसा ही होता जा रहा है।  कोई भूखा-प्यासा और दीन-हीन भीख मांगे तो बात समझ में आती है लेकिन ऎसे-ऎसे लोग भीख मांग रहे हैं जिन्हें किसी चीज की कोई आवश्यकता नहीं है।

केवल एक ही धुन सवार है और वह है दौलत जमा करने की। यह अलग बात है कि ये लोग केवल धन-संपत्ति जमा ही जमा करने का काम करते रहते हैं, यह धन उनके किसी काम नहीं आता। धन की तीन ही गतियां हैं। या तो छापा पड़ जाता है और जिन्दगी भर की कमायी हुई प्रतिष्ठा के साथ सम्पत्ति भी चली जाती है। या नष्ट हो जाता है अथवा चोर-डकैत चुरा ले जाते हैं।  इसे ही कहते हैं धन भी गया और धरम भी। बड़े-बड़े भिखारी बेशर्मी के साथ सामने आ रहे हैं।

गली-मोहल्लों, चौराहों-तिराहों से लेकर सब तरफ भिखारी ही भिखारी नज़र आ रहे हैं। कोई छुपा रुस्तम भिखारी है, कोई दिखता है, कोई  ऊपर से दिखता नहीं पर होता सुपर भिखारी है।  इंसान की पूरी जिन्दगी में वह तभी तक मानवीय, ईमानदार, संवेदनशील और समाज या देश के लिए उपयोगी बना रहता है जब तक कि वह पैसों का अंधा दास न हो, भिखारी न हो।

एक तरफ व्यक्ति की जिन्दगी के सारे संस्कार, चरित्र, मर्यादाएं, कुटुम्ब के प्रति आत्मीयता, प्रेम-सद्भाव, सामाजिक सौहार्द और माधुर्य और दूसरी तरफ केवल और केवल दौलत। जब तक हराम का पैसा अपने पास नहीं होता है तभी तक वह इंसान कहलाने लायक रहता है।

जैसे ही हराम का पैसा आने लगता है, भ्रष्टाचार और रिश्वत का पैसा घर में प्रवेश कर जाता है, मुफतिया भोग-विलास और लजीज खान-पान मिलने लगता है, सब कुछ पराया ही पराया आनंद देने लगता है तब इंसान मुद्राभक्षी हो जाता है।

एक बार जो कोई आदमी मुद्राभक्षी हो जाता है फिर उसे वापस सामान्य इंसान बनाना असंभव है। इस तरह के इंसान के लिए पूरी दुनिया, रिश्ते-नाते, मर्यादाएं, चरित्र, संस्कार, ईमानदारी और संवेदनशीलता सब कुछ समाप्त हो जाता है।

उसकी पूरी की पूरी जिन्दगी दौलत के लिए समर्पित हो जाती है, दूसरा कुछ सूझता ही नहीं। दिन के उजाले की बात हो या फिर रात के सपनों की, उसे धन-सम्पदा ही दिखती है और हर काम से लेकर प्रत्येक इंसान तक को एटीएम समझता है जिससे कार्ड के बिना भी किसी न किसी प्रकार से गुमराह कर, दबाव डाल कर या प्रलोभन देकर पैसों की उगाही का धंधा चलता रहे।

इन लोगों के जीवन का हर कर्म, व्यवहार और स्वभाव सब कुछ मुद्राओं के बाजारों की तरह बन जाता है जहां सिर्फ वही बात सुनी, बोली और समझी जाती है जिसमें मुद्रा की खनक या नोटों की फडफड़ाहट की ध्वनि निकलती हो।

इन लोगों के लिए वे ही सारा समाज, घर-परिवार और कुटुम्ब गौण हो जाता है और ये उन लोगों से निकटस्थ आत्मीय और सहजात जैसे हो जाते हैं जिनसे लेन-देन का कारोबार बना रहता है। इस मामले में इन सारे के सारे असामाजिकों को सामाजिक होते हुए देखा जा सकता है। इनका अपना एक समाज बन जाता है जिसमें दो-तीन तरह के लोग होते हैं। लाने वाले, देने वाले और पाने वाले। इनके सिवा और किसी की न जरूरत पड़ती है न अन्य किसी को स्वीकारा जाता है।

इन संबंधों में न जात-पात देखी जाती है, न कोई ऊँच-नीच, न छोटा-बड़ा। समरसता और समानता का इससे बड़ा कोई उदाहरण दुनिया भर में कहीं  भी देखने को नहीं मिलता जितना इन मुद्राभक्षी कबीलों में। जो एक बार मुद्राभक्षी हो जाता है वह किसी को भी बेच या खरीद सकता है। चाहे समाज हो या देश।

इन लोगों को मुद्रा चाहिए होती है और इसके लिए कुछ भी करने-करवाने को हर क्षण तैयार रहते हैं। इन भिखारियों को मुद्रा दे दो, फिर सब कुछ लूट ले जाओ, इनके बाप का क्या जाता है, भुगतना तो समाज और देश को पड़ता है।

असली असामाजिक और देशद्रोही तो ये भिखारी हैं जो जमीर बेचकर दुनिया का सब कुछ खरीदने और बेचने की ताकत पा लिया करते हैं। कोई इस मुगालते में न रहे कि ये हमारे अपने हैं, ये किसी के नहीं हो सकते। यहां तक कि अपने भी नहीं। कोई मुद्रा का लोभ-लालच दिखाये तो ये अपने शरीर के अंग तक गिरवी या पीपीपी मोड पर रख दें या बेच डालें।  हे राम ! इन भिखारियों को हमारे मुल्क में ही क्यों पैदा किया होगा?

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