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विधा की दुविधा / व्यंग्य / गोविन्द सेन

इन दिनों मैं विधा की दुविधा में फंसा हूँ. पशोपेश में हूँ कि किस विधा में लिखूं? इसी सिलसिले में मैं एक दिन विधा कालोनी में जा पहुँचा. वहाँ पहुँचकर मुझे बड़ा अजीब लगा. घर किताबों के बने थे. इन किताबों में निराला, पंत, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, दुष्यंत आदि-इत्यादि [नाम गिनवा पाना असम्भव है] की आत्माएं दौड़ रही थीं. आशय यह कि हर किताब में किसी न किसी साहित्यकार की आत्मा घूम रही थी.

कुछ संभाला तो पाया कि कविता मेरे सामने खड़ी है. उसने मुझे सूक्ष्म संवेदनशील आँखों से देखा और मुस्कुराकर कहा-‘आप तो मुझे लिखिए.’ मैं कहना चाहता था-‘आपको क्या खाक लिखूं . आप तो आजकल बड़ी दुरूह, बिम्बात्मक, फंतासी, प्रतीकात्मक आदि-आदि न जाने क्या-क्या होती जा रही हो. मेरी तो समझ में नहीं आ रही हो. तुम्हारा चरित्र भी संदिग्ध है. निराला के साथ तो तुमने सारे बंधन ही तोड़ दिए. बेचारे कई भावुक कवि [मैं भी] तुम्हारे इस उन्मुक्त व्यवहार से आज भी दुखी हैं. फिर आपके बच्चे भी तो बहुत हो गए हैं.’ लेकिन मेरे भीतर बैठे एक शिष्ट और मृदुभाषी आदमी ने मुझे रोक लिया.

मैंने कहा-‘ज़रूर, आप ही तो लिखना शुरू किया है.’ मैंने कविता को आश्वस्त करने की गरज से उसका हाथ थाम लिया तो उसका बड़ा भाई ‘गीत’ मुझे खूंखार निगाहों से घूरने लगा. जैसे मुझे कच्चा निगल जाएगा. पास ही खड़ा गीत का दोस्त ‘नवगीत’ अलग से आँखें तरेरने लगा. कुछ आगे बढ़ा तो स्कूल से आते हुए कविता के बच्चों [सीपिका, क्षणिका, हंसिका, मुक्तक, कटपीस आदि] ने मुझे घेर लिया. चिल्लाने लगे-‘हमें लिखो अंकल ! हमें लिखो! आजकल हम पत्र-पत्रिकाओं में खूब दौड़ रहे हैं.’

कविता की गली में आगे बढ़ता हूँ तो गज़ल मुझे बड़ी हसरत से देखती है. उसकी गागर-सी आँखों में उमड़ा भावों का सागर देख मैं अभिभूत हो जाता हूँ. वह कहती है-‘नवोदित कवि मुझे लिखो! आजकल कविता को कौन देखता है? अरे, मरे रूप-रंग पर तो ग़ालिब तक मार मिटे. फिर हिंदी में दुष्यंत कुमार को भी तो मैंने ही अमर बनाया है. कुछ दिनों तक निराला ने भी मेरा सामीप्य लाभ उठाया है. अब मैं वैसी नहीं रही हूँ [वह नजरें झुका लेती है]...विराट भाई साहब मुझे मयखाने से उठाकर इस देवघर में ले आये हैं. उन्होंने मेरा नाम ‘मुक्तिका’ रख दिया है.’

‘हाँ...हाँ...और वो पीड़ा का राजकुमार ‘नीरज’ भी तो आपको ‘गीतिका’ कहकर प्यार से पुकारते हैं.’

‘आप तो मुझ पर आसक्त लगाते हैं.’ कहते-कहते वह छुई-मुई सी हो सिमट गई. मैं हड़बड़ा गया. लेकिन सहज स्वर में कहा-‘नहीं तो. [वैसे हूँ ज़रूर] आगे मैं उससे पूछना चाहता था-‘आजकल लौंडे आपको तेवरी क्यों कहने लगे हैं?’ लेकिन भीतर बैठे उस शिष्ट सज्जन ने यहाँ भी रोक लिया.

थोड़ा आगे बढ़ता हूँ तो मुझे व्यंग्य दादा मिलते हैं. अपनी धारदार मूँछों पर ताव देते हुए बोलते हैं-‘अरे, उस चरित्रहीन गज़ल के चक्कर में मत पड़ना. पता नहीं उर्दू में किस-किस के साथ ऐय्याशी कराती रही. देख भाई, आज ‘हरिशंकर’ जो कुछ भी है अपनी वजह से है. कहानी-कविता पर भी अपना अच्छा इम्प्रेशन है. तू तो कलम को लाठी बना और व्यंग्य में घूमा.’ कहते हुए उन्होंने मेरी पीठ थपथपायी. बोले-‘ जा बेटा! लाठी घूमा.’

इधर कहानी से छूटा ही था कि कहानी की जवान होती छोटी बहन ‘लघुकथा’ ने अपने तेज आवाज में पुकारा-‘अरे, ओ युवा साहित्कार! इधर आओ. आप तो मुझे लिखो. देखो मैं युवा हो रही हूँ. मुझे आप जैसे सशक्त नौजवानों की ज़रूरत है. [मैं अपने दुर्बल शरीर को देखने लगता हूँ कि इस मैं किस कोण से सशक्त लगा रहा हूँ.] दीदी जो काम जिंदगी भर नहीं कर पायी, वो काम मैं अपने सोलहवें साल में कर दूंगी.’ उसने श्रीदेवी की तरह बेशर्म होकर कहा.

मैं उस तन्वंगी से कुछ कहने ही वाला था कि ‘कहानी’ ने बैठक में प्रवेश किया. मैं उनके सरल, सहज और गंभीर व्यक्तित्व से अत्यन्त प्रभावित हुआ. वे यथार्थवादी [पारदर्शी नहीं] साड़ी पहने हुए थीं. कहने लगीं-‘कभी-कभी मुझे भी लिख लिया करो भाई!’ मैंने उत्साहित होते हुए कहा-‘कभी-कभी क्यों? मैं तो अक्सर आपको लिखने की कोशिश करता रहता हूँ.’

तभी उपन्यास अपने भरी-भरकम शरीर के साथ और नाटक अपनी नाटकीय चाल से मेरी ओर आते हुए दिखे. मैं पलटकर बेतहाशा भागा. उनका सामना कर पाने की हिम्मत नहीं थी.

जब अपने कमरे पर पहुँचा तो मैं पसीने से तरबतर था. जान बची, लाखों पाए. भगवान बचाए इस गंभीर साहित्य से. सोच रहा हूँ इन सब लफड़ों को छोडूं और गुलशन नंदा की परम्परा को बढ़ाऊँ. जहाँ लक्ष्मी भी सरस्वती की अनुगता हो जाती है. बहरहाल, अपनी विधा सम्बंधी समस्या को मुक्तिबोध की कविता के पेटर्न में यूँ कहना चाहूँगा-

मुझे कदम-कदम पर

विधाएँ मिलाती हैं

बाहें फैलाए

एक पंक्ति लिखता हूँ तो

सौ विधाएँ फूटती हैं.

-193 राधारमण कालोनी, मनावर, जिला-धार [म.प्र.] 454446 मो. 09893010439

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