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मई दिवस की संघर्ष गाथा / आरिफा एविस

 

मई दिवस को पूरी दुनिया में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन मजदूर आन्दोलनों की उपलब्धियों और खामियों का लेखा-जोखा लेने वाला दिन है. मई दिवस का इतिहास मजदूर वर्ग के निरन्तर संघर्स, बलिदान और उनके विकास का इतिहास है.

मई दिवस हमारे लिए संकल्प का दिवस है. यह दिन अपनी कामयाबी और हार से सबक लेने का दिन है. साथ ही यह उन सपनों को जिन्दा रखने का दिन है जो मई दिवस के नायक अल्बर्ट पार्सन्स और उनके बहादुर साथियों ने देखा था. पार्सन्स ने कहा था- “हमारी मौत दीवारों पर लिखी ऐसी इबारत बन जाएगी जो नफरत, बैर, ढोंग-पाखंड,अदालत के हाथों होने वाली होने वाली हत्या, अत्याचार और इन्सान के हाथों इन्सान की गुलामी के अंत की भविष्यवाणी करेगी. दुनियाभर के दबे कुचले लोग अपनी कानूनी बेड़ियों में कसमसा रहे हैं.  विराट मजदूर वर्ग जाग रहा है. गहरी नींद से जागी हुई जनता अपनी जंजीरों को इस तरह तोड़ फेंकेगी जैसे तूफान में नरकुल टूट जाते हैं.”

जब से दुनियां में फैक्ट्रियों, कारखानों और बड़े उद्योगों का निर्माण शुरू हुआ, तब से उनमे काम करने वाले मजदूरों को प्रतिदिन गुलामों की तरह 14 -18 घंटे काम करना पड़ता था और सप्ताह में कोई भी छुट्टी नहीं होती थी. 1832 में अमेरिका के बुनकर, दर्जी, मोची और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों ने ’10 घंटे कार्य दिवस’ निश्चित करने के लिए संगठित होकर संघर्ष किया. निरन्तर संघर्षों और दबावों के कारण 1860 ई. तक पूरे अमेरिका में कानूनन ’10 घंटे कार्य दिवस’ का अधिकार मजदूरों को दे दिया गया.

पूरी दुनिया में मजदूर सगठनों और संस्थाओं ने मजदूरों की राजनीतिक चेतना को उन्नत करने का काम किया, जिसके परिणामस्वरूप 1867 तक आते-आते मजदूरों का नारा बदल गया जो प्रकार था-“ 8 घंटे काम , 8 घंटे आराम, 8 घंटे मनोरंजन और सप्ताह में एक दिन का अवकाश हो.”

इस नारे ने मजदूर आंदोलनों को संगठित किया और संघर्ष को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. देखते ही देखते ही अमेरिका में ही मजदूर संगठनों की संख्या 200 से अधिक हो गयी. लाखों मजदूरों आन्दोलन में उतरने लगे. इसी दबाव के चलते ‘8 घंटे कार्य दिवस’ को 1867 में कानूनी घोषित किया गया, लेकिन मजदूरों को 14-14 घंटे काम करने के लिए गैर कानूनी रूप से दबाव डाला जाता था. पहली मई 1886 को ‘काम के घंटे 8 करो’ अपना विशेष राजनीतिक अर्थ दे गया. इसी दिन अमेरिका के शिकागो शहर में मजदूरों का ऐसा सैलाब उमड़ा जिससे मजदूर वर्ग की लड़ाई के इतिहास में नया अध्याय जुड़ गया. मजदूर आन्दोलन के चार नेताओं को फर्जी मुकदमा चला कर फंसी पर चढ़ा दिया गया.

भले ही मजदूर आन्दोलन के नायकों को फांसी पर चढ़ा दिया गया हो लेकिन आने वाले पीढ़ी को दिया गया संदेश और उनके विचार हमेशा जीवित रहें हैं और  आगे में अमर रहेंगे. आगस्ट स्पाइस ने लूट पर टिकी मानव द्रोही व्यवस्था को चुनौती देते हुए कहा था कि “अगर तुम सोचते हो कि हमें फांसी पर लटका कर तुम मजदूर आन्दोलन को... गरीबी और बदहाली में कमरतोड़ मेहनत करने वाले लाखों लोगों के आन्दोलन को कुचल डालोगे, अगर तुम्हारी यही राय है- तो ख़ुशी से हमें फांसी दे दो. लेकिन याद रखो... आज तुम एक चिंगारी को कुचल रहे हो, लेकिन यहाँ-वहाँ तुम्हारे पीछे, तुम्हारे सामने, हर ओर लपटें भड़क उठेंगी. यह जंगल की आग है. तुम इसे कभी नहीं बुझा पाओगे.”

भारत में भी निरन्तर संघर्षों और बलिदानों के बल पर मजदूर वर्ग ने बहुत सी आर्थिक, सामाजिक और राजीनीतिक सफलताएँ प्राप्त की थीं, जिसमें काम के घंटे 8, यूनियन बनाने का अधिकार, न्यूनतम मजदूरी और आन्दोलन करने का मौलिक अधिकार प्राप्त किया था. लेकिन आज हम देखते हैं कि एक-एक करके हमसे से ये अधिकार छीने जा रहे हैं. हमारी मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं हो रही है, महंगाई बढती जा रही है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पीनेका पानी जैसी सामाजिक सुरक्षा धीरे-धीरे समाप्त कर दी गयी हैं.  ठेका मजदूरी का प्रचलन बढ़ रहा है जिसके चलते फैक्ट्री मालिक कभी भी मजदूरों को निकाल देता है. यदि मजदूर अपनी मांगे कम्पनी या सरकार के सामने रखता है तो उसको पुलिस द्वारा मारा पीटा जाता है.

दिल्ली एन.सी.आर से सटे हुए क्षेत्र पूरी तरह से मजदूर बस्ती के रूप में पहचाने जाते हैं. हर रोज लाखों लोग 5 से 10 हजार रुपये तक की नौकरी करने के लिए दिल्ली,गाजियाबाद, गुडगाँव में साइकिलों पर सवार होकर या रेल में लटक कर अपनी जान जोखिम में डालकर किसी न किसी तरह नौकरी करने जाते हैं. विकास और सुधार के शोर शराबे के बीच यहाँ असंगठित क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ है. लोनी, खोड़ा, बवाना जैसे इलाके आज असंगठित मजदूरों का एकमात्र ठिकाना बनते जा रहे हैं. इन क्षेत्रों में दोने बनाना, चूड़ी बनाना, बटन टांकना, हौजरी कपड़ों की सिलाई,कपड़ों की कटिंग, पुराने तारों को छीलने-जलाने का काम, इलेक्ट्रॉनिक सामानों के सर्किट को प्लेटों में लगाना, जींस की रंगाई और धुलाई, बिंदी-राखी बनाना, बाईंडिंग, पैकिंग  जैसे काम पीस रेट पर बहुत ही कम मजदूरी पर कराया जाता है. एक परिवार की महिलाएं और बच्चे मिलकर दिन भर खटने के बाद 40-50 रुपये ही काम कर पाते हैं .

ऐसे इलाकों में मजदूर वर्ग इन गंदी बस्तियों में रहने और गंदा पानी पीने को मजबूर हैं. यहाँ रहने वाले प्रत्येक परिवार के सदस्य किसी न किसी बीमारी से ग्रसित हैं. डेंगू, मलेरिया, टी.बी., पथरी जैसी बीमारी हर परिवार के सदस्य को होती रहती है. कुल मिलाकर यहाँ की स्थिति झोपड़-पट्टी से भी बदतर है.

आज की तारीख में मजदूर वर्ग की सुनने वाला कोई नहीं है. उसकी अपनी कोई पार्टी, संगठन या नेता नहीं है जो उसके दुःख तकलीफों में उसका साथ दे सके.ऐसे में मायूस होने से काम नहीं चलेगा. मजदूरों के नेता खुद मजदूरों के बीच से निकलेंगे. अपने ऊपर भरोसा करने की जरूरत है. निराशा और पस्ती से निकलकर आपस में एकता कायम करके अपनी समझदारी बढ़ाने और संघर्ष की तैयारी करने की जरूरत है. मई दिवस और मजदूर वर्ग के संघर्षों की विरासत बहुत ही शानदार रही है. हम सभी को अपनी विरासत से प्रेरणा लेकर नई शुरूआत करने की आवश्यकता है. नये सपने देखने की आवश्यकता है और नया समाज बनाने में जुट जाने की जरूरत है.

इंकलाब जिन्दाबाद                                                                    

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बहुत ही ज्ञानवर्द्धक आलेख , मजदूर यूनियन का इतिहास पता चला . धन्यवाद

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