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शापित होते हैं शोरगुलपसंद लोग / डॉ. दीपक आचार्य

- डॉ. दीपक आचार्य

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जमाने भर की सुनने के साथ-साथ जो अन्तरात्मा की आवाज सुनते हैं वे जीवन में सफल भी होते हैं और आनंद भी पाते रहते हैं। लेकिन अन्तरात्मा की आवाज सुनने के लिए अभ्यास चाहिए जबकि जमाने की तमाम हलचलों को सुनने-सुनाने के लिए न किसी प्रतिभा की आवश्यकता होती है, न हुनर या ज्ञान की।

सामान्य से सामान्य आदमी भी दिन-रात सुनने का यह काम कर सकता है। बहुसंख्य लोग बिना किसी मेहनत के आजकल यही कर रहे हैं। आजकल अधिकांश लोग किसी की नहीं सुनने वाले हैं। वे वही सुनते हैं जो कि और लोग सुनते हैं और इसमें किसी भी प्रकार की मेहनत नहीं करनी पड़ती।

आजकल सब जगह यही हो रहा है। लोग दुनिया भर की सुनने लगे हैं, जानने लगे हैं और जताने लगे हैं। ऎसे में उनके पास वो समय ही कहां बचता है कि खुद की सुन सकें, अपनी आत्मा से रूबरू हो सकें और अपने से संबंधित सूक्ष्म  संकेतों की थाह पा सकें।

कोई सा कैसा भी इंसान हो, ऊपर उठा हुआ हो या फिर कितना ही नीचे गिरा हुआ। भगवान की ओर से उसके जीवन की हर अच्छी-बुरी घटना-दुर्घटना का सूक्ष्म प्रतीकात्मक संकेत प्राप्त होता ही है। इसी प्रकार हर इंसान के जीवन में असंख्य अवसर आते हैं जबकि नियति और भगवान उससे कुछ कहना चाहते हैं, आगे बढ़ने और अवसरों का अधिकतम उपयोग करने के संकेत देना चाहते हैं किन्तु आम इंसान बाहर की दुनिया में इतना अधिक खोया हुआ रहता है कि उसे कुछ सूझ ही नहीं पड़ती कि क्या सुने, क्या न सुने।

फिर अधिकतर लोग आजकल तभी काम कर पाते हैं जब वे शोरगुल के बीच हों। शोरगुल न हो तो वे लोग काम ही नहीं कर पाते हैं चाहे वो काम उनकी पसंद का हो या न हो।

बहुसंख्य लोगों की पूरी की पूरी जिन्दगी शोरगुल का पर्याय बनी रहती है। वे रोजाना कई घण्टे शोरगुल में ही अपने आपको जीवित और जागृृत मानते हैं। शोरगुल न हो तो वे अधमरे या मायूस ही रहा करते हैं। 

बहुत से लोगों की जिन्दगी ही शोरगुल हो जाती है जहाँ पग-पग पर शोरगुल में डूबे रहना ही इनकी नियति हो जाती है। इस मामले में बहुत सारी प्रजातियां हैं जिनके शौक फरमाने के अंदाज भी अलग-अलग हैं।

अधिकांश लोगों की आदत होती हैं फिल्मी गीत-संगीत सुनना, भजन सुनना और बातों में रमे रहना। इन लोगों के बारे में नियति और ईश्वर दोनों की ओर से हर बार कोई न कोई संकेत आने का प्रवाह बना रहता है लेकिन ये लोग इस संकेतों को प्राप्त नहीं कर पाते।

ये संकेत बार-बार इनके आभामण्डल की ओर आते हैं मगर लौट जाते हैं क्योंकि इन लोगों का दिल और दिमाग गाने सुनने और किसी न किसी तरह के अलापों के व्यस्त रहता है।

बहुत से लोग वाहनों में यात्रा करते समय भी गाने, भजन और भाषण सुनने में व्यस्त रहते हैं। फिर आजकल तो मुफतिया रेडियो चैनल, एफएम आदि इतनी बड़ी संख्या में आ चुके हैं दिन-रात नॉन स्टॉप सुनते चले जाओ, कोई पैसा नहीं लगे।

फिर जब सुनना ही है तो सब कुछ सुुनते रहते हैं। चाहे संदेश हों या विज्ञापन या और कुछ। और फिल्मी गानों का दरिया तो हमेशा उमड़ता रहता ही है। इसी तरह की भीड़ में वे लोग भी शामिल  हैं जो मोबाइल से गाने सुनकर जिन्दगी की गाड़ी को आगे से आगे धकेलते रहने का सुख भोग रहे हैं।

अधिकांश ड्राईवरों और वाहनस्वामियों में तो यह शौक इतना अधिक परवान पर रहता है कि कुछ कहा नहीं जा सकता।  आजकल यह सुनने का शौक कुछ ज्यादा हो गया है। लेकिन इतना सत्य है कि जो लोग इस प्रकार के शोरगुल से आनंद पाते रहते हैं।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही है कि जो लोग शोरगुल पसंद होते हैं वे प्रकृति, आत्मा और ईश्वरीय धाराओं से दूर होते चले जाते हैं। मुख्य धारा या केन्द्र से जो जितना अधिक दूर चला जाता है वह उतना ही उद्विग्न, असन्तुष्ट और अतृृप्त रहेगा। यही कारण है कि जिन लोगों को शोरगुल पसन्द होता है वे लोग अभावों, समस्याओं और दुःखों भरी जिन्दगी गुजारने को विवश होते हैं और इनका जीवन अभिशप्त होता है।

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