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दमन न करें मौलिक हुनर का - डॉ. दीपक आचार्य

- डॉ. दीपक आचार्य

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हर इंसान में एक या एकाधिक मौलिक हुनर विद्यमान होता ही है जो जन्मजात संस्कारों के साथ पैदा होता है और उसे हरदम अतिप्रिय एवं रुचिकर लगता है। जो इस मौलिकता को अपने जीवन का अंग बना लेते हैं वे जीवन में आशातीत सफलताओं और अप्रत्याशित उपलब्धियों का आनन्द पाते रहते हैं।

हर मनुष्य के लिए अपनी जो कोई मौलिक प्रतिभा होती है वह अपने आप में किसी ऊर्जा भण्डार से कम नहीं होती जो ईश्वरप्रदत्त हुआ करती है।  यह मौलिक हुनर भगवान का वह वरदान है जो हमारी पूरी जिन्दगी के लिए दिशा और दशा तय करने तथा जीवननिर्वाह के लिए संकेत होता है।

इस संकेत सूत्र को पकड़ कर जो आगे बढ़ता है वह सफलताओं को पाने में अव्वल रहता है। जो इस संकेत की अवहेलना करता है और मार्गान्तरण कर देता है वह सफल नहीं हो पाता। कामचलाऊ जिन्दगी जरूर पा सकता है।

हर इंसान में  एक या एक से अधिक ऎसे हुनर अवश्य होते हैं और इनके लिए भगवान की ओर से उसे पर्याप्त ऊर्जा नवाजी होती है। यह ऊर्जा यदि अपने नैसर्गिक प्रवाह के साथ यों ही चलती रहती है तब वह बिना अधिक परिश्रम किए इंसान को उपलब्धियों का शहद चटाती रहती है लेकिन इसकी अवहेलना करने पर यह अपनी प्रकृति बदलकर नकारात्मकता भी दे डालती है।

इसीलिए कहा गया है कि नैसर्गिक प्रतिभा की दिशा में ही आगे बढ़ना चाहिए। इससे जिन्दगी की राह अधिक आसान होती है और सहजतापूर्वक सारे लक्ष्यों को पाया जा सकता है। हर इंसान स्वाभाविक रूप से यही चाहता है कि उसकी दिली इच्छा और पसंद पूरी हो। लेकिन सभी को उचित अवसर एवं अनुकूल माहौल मिल ही जाए, यह संभव नहीं हो पाता।

इसलिए इन लोगों को चाहते हुए भी अपनी मनोभावनाओं को दमन करना  पड़ता है। इस मामले में अनेक प्रकार के लोग हम देखते हैं। पहली प्रकार के लोग अपनी रुचि और मौलिक हुनर को आजीविका और पसंदीदा विषयों के रूप में अपना लेते हैं जबकि दूसरी किस्म में वे लोग आते हैं जिन्हें न अवसर मिल पाते हैं, न प्रोत्साहन और न ही अपने अनुकूल माहौल। 

और यही वह कठिन समय होता है जब ये लोग बहुत कुछ चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाते और इसका मलाल इन्हें जिन्दगी भर रहता है। फिर कुछ सनकी, ईष्र्यालु, संवेदनहीन और नालायक लोग भी होते हैं जो चाहते हैं कि कोई भी दूसरा इंसान वो काम नहीं कर पाए जो उनके बूते का नहीं है।

ऎसे लोग मौलिक हुनरमंद लोगों की राह का सबसे बड़ा रोड़ा होते हैं जो अक्सर ऎसा कुछ कर ही डालते रहते हैं कि हुनरमंद लोगों को या तो पीछे हटना पड़ता है अथवा पलायन करना पड़ता है।

असल में ये ही लोग वास्तविक असामाजिक होते हैं जिनकी सनक के मारे अच्छी-अच्छी और अद्वितीय प्रतिभाओं की जिन्दगी नर्क हो जाती है और इसे देखकर इन नालायकों को बहुत मजा आता है। फिर ऎसे दो-चार-दस नालायक और नुगरे लोगों का कहीं कोई समूह बन जाए तो फिर उस क्षेत्र की मानवजनित विपदाओं के बारे में कुछ कहना ही क्या। भगवान भरोसे ही रहता है सब कुछ।

हुनर कैसा भी हो, इस मौलिकता को आँच नहीं आने दी जानी चाहिए।  जहां अवसर मिलता है वहाँ अनुकूलताओं में अपने आपको ढालने की कोशिश करें और जहाँ चंद सिरफिरे और कमीन लोगों के कारण अवसर नहीं मिल पाएं, वहाँ हताश न होकर सभी प्रकार की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी रास्ता बनाएं और तमाम प्रकार की विषमताओं को चुनौतियों के रूप में लें।

ऎसा करने से कुछ समय बाद यही चुनौतियां हमारे लिए राह आसान करने वाली हो जाती हैं। यह चुनौतियां हमें अपने कहे जाने वाले आत्मीयों, घर वालों और सहकर्मियों से भी मिल सकती हैं और बाहर के लोगों से भी। आजकल बहुत से लोग हैं जो बैठे-बैठे हराम की खाना चाहते हैं, पुरानी परंपराओं और अवधिपार ढर्रों में घुसे रहकर जैसे-तैसे टाईमपास करने वाले हैं, दूसरों को तंग करते हुए आनंद पाने वाले हैं और चाहते हैं कि बिना कुछ किए उन्हें भरपूर पैसा भी मिल जाए, मुफतिया साधन सुविधाएं भुगतने के मौके भी उपस्थित होते रहें तथा जहां जाएं वहाँ वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता रहे।

बहुत से लोग खाली पीपों की तरह बजते हुए शोर मचाकर आगे से आगे बढ़ने और आगे ही रहने के लिए आमादा होते हैं।  इन लोगों को हमेशा यही भ्रम होता है कि यह दुनिया उनकी सेवा-चाकरी और गुलामी के लिए बनी है और इसलिए दूसरों से जितनी अधिक से अधिक सेवा ली जाए, वह हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

आजकल के लोगों पर यह अहंकार इतना अधिक हावी हो गया है कि लोग न अपने आपे में रहे हैं, न अपने झाँपे में। हर कोई अपने आपको स्पाईडर मैन की तरह उछलता हुआ अनुभव करता है। लेकिन यह मनोदशा वे ही रखते हैं जो कुछ हैं नहीं, केवल दर्शाना चाहते हैं और इसके लिए वे सारी मर्यादाओं को तिलांजलि देकर कुछ भी कर सकने को स्वतंत्र एवं तैयार हैं।

इन सबसे अलग हटकर हर प्रतिभावान इंसान को चाहिए कि वे अपने भीतरी हुनर को जिन्दा रखे तथा अकेले अपने बूते ऎसा कुछ करे कि वह उन सभी को पछाड़ दे जो उसकी राह में कांटे बनकर आते रहे हैं। मौलिक हुनर की दिशा में ही आगे बढ़ते रहें। हुनर का दमन कभी न करें। अनुकूल स्थितियां न हों तो चुपचाप अपने कर्म में लगे रहें, एक न एक दिन समय अपने अनुकूल ऎसा आता ही है कि हमारा हुनर जमीन से लेकर आसमान तक गूंजने लगता है। 

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