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हिन्दी में हाइकु (१०) विरुद्धों का सामंजस्य / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

हाइकु रचनाओं की अनेकानेक विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है कि वे अप्रत्याशित रूप से दो विरोधी भावों की संगति उपस्थित कर काव्यात्मक सौंदर्य को प्राय:बढाती हैं.

‘विरुद्धों का सामंजस्य’ यह पद-बंध, हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और चिंतक राम चंद्र शुक्ल का है. शुक्ल जी के गद्य में परस्पर मिलते जुलते दो प्रयोग आते हैं- समन्वय और विरुद्धों का सामंजस्य. समन्वय में दो या दो से अधिक विरोधाभासी प्रत्यय या शब्द एक दूसरे के पूरक बनकर पूर्णता की ओर संकेत करते हैं. जैसे, जीवन की पूर्णता कर्म, ज्ञान और भक्ति, तीनो के समन्वय में है. इसी प्रकार कार्य-कारण सम्बन्ध का निर्वाह भी समन्वय दर्शाता है. समन्वय की दो इकाइयों में एक स्वाभाविक पूरक-सम्बंध है. वस्तुतः समन्वित प्रत्यय एक दूसरे के विरोधी होते ही नहीं. उनमें केवल विरोधाभास होता है- हमें यह केवल आभास भर होता है कि वे विरोधी हैं. समन्वय की तरह ही सामंजस्य में भी विरोधी भावों/

विचारों में शब्दों का संयोग है. किंतु यह मेल सहज न होकर सप्रयत्न कराया जाता है. साहित्य में इससे सौंदर्य आता है. वस्तुतः जो प्रत्यय एक दूसरे के नितांत विरुद्ध हैं उनका समन्वय तो हो ही नहीं सकता. उनमे केवल सामंजस्य ही बैठाया जा सकता है.

हाइकु रचनाओं में हमें यही विरुद्धों का सामंजस्य अक्सर देखने को मिल जाता है. हाइकु क्योंकि 5-7-5 अक्षरों की तीन पंक्तियों का लघुतम काव्य है, इसे आकर्षक बनाना बहुत कठिन होता है. इसीलिए इसमें कभी-कभी विरुद्धों-के-सामंजस्य की तकनीक अपनाई जाती है. विरोधी भावों में सामंजस्य बैठाकर कवि पाठक को चकित कर देता है. स्वर-निःस्वर, जीवन-मरण, परुष-कोमल, लघु-विशाल आदि, विरोधी भावों का अप्रत्याशित संयोग यह चमतकार करता है. एक जापानी हाइकु जिसका हिंदी रूपांतर/भावानुवाद कुछ इस प्रकार किया जा सकता है पर ग़ौर कीजिए –

बसंत आया

सबकुछ तो मिला

कुछ भी नहीं - (बाशो)

इस हाइकु में सबकुछ मिल जाना और कुछ भी नहीं मिल पाना दो वदतोव्याघाती पद हैं जिनका तार्किक रूप से कभी समन्वय हो ही नहीं सकता. पर इन्हें वसंत ऋतु से जोड़कर यह कमाल सम्भव हुआ है.

हिंदी हाइकु रचनाओं में भी इस प्रकार के प्रयोग बिखरे पड़े हैं और उन्हें कई रूपों में अभिव्यक्त किया गया है. कभी आपको विरोधी-भाव साथ-साथ एक ही पंक्ति में मिल जाएंगे, तो कभी वे एक ही पंक्ति में न होकर आस-पास होंगे. विरोधी प्रत्ययों को साथ रखकर उनमें संगति उत्पन्न करना तो आम बात है. इसे हम अनेकों बार देख सकते हैं,-

टेसू महके

लो बसंत आगया

मधुर दाह – (देवेंद्र नारायण दास)

नैनों की राह

उतर जो भी जाए

भाए सताए - (होरी लाल प्रेमी)

प्रिया के रूप

सुमन कंटक से

हमने भोगे - (रमेश कुमार त्रिपाठी)

अलग-अलग किंतु एक ही पंक्ति में आस-पास दो विरोधी भावों का उदाहरण,-

दुःशासन में

चीटी हड़पे हाथी

डकार न लें -(भगवान दास एज़ाज़)

कभी-कभी दो विरुद्धों को दो अलग-अलग पंक्तियों में भी देखा जा सकता है, -

क्षण भर का

सुख पाने को नर

सतत दुःखी - (डॉ. सुरेंद्र वर्मा)

कड़ुवा नीम

देता मधुर हवा

शीतल छाया

उपर्युक्त दूसरा हाइकु मूलतः राजस्थानी बोली में है जिसका हिंदी में अनुवाद कवि गोवरधन लाल शर्मा ने स्वयं किया है. मूल हाइकु इस प्रकार है –

खारा नीमडो

देवे मधुरी हवा

शीतल छाया -

इस कोटि के दो-एक अन्य हिंदी रचनाओं के उदाहरण भी देखें, -

खामोशी तेरी

लाएगी ज़लज़ला

चीखो तो भला – (कृष्णकुमार त्रिवेदी)

रोती चिड़ियें

टूटे नीड़ों को देख

हंसते लोग - (राजीव राज)

यह आवश्यक नहीं है कि दो विरोधी भावों को प्रकट करने के लिए विरोधी पदों का ही प्रयोग हो. कभी-कभी विरोधी पदों का इस्तेमाल किए बिना ही विरोधी भावों को अभिव्यक्त किया जा सकता है. एक जापानी हाइकु देखिए, जिसका यहां अनुवाद दिया जा रहा है,

लड़ा गया था

जहां युद्ध, मलवे

में पौधा उगा - (शीकी)

कहां तो युद्ध ने हर चीज़ को मलवे में बदल दिया और कहां वहीं मलवे में पौधा उग आया है. विध्वंस और सृजन का यह सामंजस्य है. हिंदी हाइकु रचनाओं में भी इस प्रकार के प्रयोगों की कमी नहीं है

हरे हो गए

बूढे-बूढे पर्वत

वर्षा ऋतु में –(रमेशचंद्र शर्मा चंद्र)

यहां हरा रंग ताज़गी का प्रतीक है तो पर्वतों का बूढापन उनकी पुरातन उपस्थिति का. इसी विरोधी भाव को ऐसे शब्दों से अभिव्यक्त किया गया है जो स्वयं विरोधी नहीं है.

और अंत में, एक ही हाइकु में विरुद्धों के एक दुहरे सामंजस्य का उदाहरण देखें –

लाभ अलाभ

तो होता ही रहता

क्यों हर्ष शोक - (सुरेंद्र वर्मा)

 

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डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी /१,सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लाग surendraverma389.blogspot.in

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