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खुद नहीं तो बच्चों के लिए करें धूम्रपान का त्याग / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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31 मई तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष...

बंदर वाली सोच से नहीं छूटेगी यह लत

कहते है कि बंदर मनुष्य के पूर्वज है। यह बात मुझे अनेक अवसरों पर अक्षरश: सत्य लगती है। कारण यह कि मनुष्य के व्यवहार में आज भी वे गुण या कहे अवगुण विद्यमान है, जो बंदरों में पाए जाते है। मसलन अपने रहने के लिए सुरक्षित स्थान न बनाने वाले बंदर बरसात होने पर सोचते है कि अब अपने रहने के लिए एक सुंदर सा स्थान बना लेंगे, किंतु बरसात बंद होते ही उसकी यह सोच फुर्र हो जाती है। कमोबेश यही स्थिति मानवीय समाज में भी देखी जा रही है। हम हर वर्ष 31 मई को तम्बाकू निषेध दिवस का आयेाजन करते है और यह संकल्प लेते है कि मानवीय शरीर को व्याधियों का उपहार देने वाली इस नशीली चीज को हाथ नहीं लगाएंगें। जैसे ही 31 मई के चौबीस घंटे गुजरते है और 1 जून के सुबह के दर्शन हमें होते है, हमारी तम्बाकू निषेध वाली संकल्पना न जाने कहां लुप्त हो जाती है? अच्छे अच्छे आलेख और कहानियां हमें सावधान करती प्रतीत होती है, कि हमें इस व्यसन का त्याग कर देना चाहिए। बड़े-बड़े ब्लागर और साहित्य की दुनिया में अपना डंका बजाने वाली साहित्यकार भी तम्बाकू के सेवन से अपार मित्रता रखते देखे गए है। साथ ही तम्बाकू का सेवन न करने वाले किसी युवक-युवती को मुंह या गले का कैंसर हो जाने पर यह कहते नहीं थकते कि वह तो तम्बाकू नहीं खाता था फिर यह रोग क्यों हो गया? ऐसी दलीलें केवल खुद को अंधकार में रखने से कम नहीं कही जा सकती है।

भारत में इतिहास 500 वर्ष पुराना

भारत वर्ष में तम्बाकू चलन का इतिहास 500 वर्ष से भी अधिक बताया जाता है। कहा जाता है कि बादशाह अकबर से पूर्व तम्बाकू के उपयोग का जिक्र इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं है। अकबर के दरबार में आए पुर्तगाली यात्री ‘वर्नल’ ने बादशाह अकबर को एक जड़ाऊ सुंदर चिलम उपहार स्वरूप दिया था। बादशाह को वह चिलम बहुत पसंद आई और उसके मन में चिलम में तम्बाकू भरकर पीने की इच्छा जागृत हो उठी। बादशाह को चिलम के माध्यम से धुंए छोड़ते देखकर पहले तो दरबारियों ने बड़े आश्चर्य का अनुभव किया। बाद में दरबारियों को भी धुंआ उड़ाने का मन होने लगा। कहते है वह सन 1609 की घटना है और तभी से धीरे धीरे भारत वर्ष में धूम्रपान की शुरूआत होने लगी। तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट वास्तव में हमारी संस्कृति नहीं वरन यह विदेशी संस्कृति का अहम हिस्सा है। कहते है कि इसका शुरूआती रूप अमेरिका में देखा गया, जहां लोग तम्बाकू को पत्ते में लपेटकर बीड़ी की तरह पिया करते थे। इसी तरह इंग्लैंड में इसकी शुरूआत कागज में लपेटकर सिगरेट की तरह पीने के रूप में हुई। आज हम 21वीं सदी में पहुंच चुके है, यह बड़े शर्म का बात है कि हमारे नौनिहालों को बीड़ी सिगरेट पीने की शिक्षा स्वयं उनके पिता अथवा परिवार के बड़े सदस्यों द्वारा दी जाती है। छोटे बच्चों को बीड़ी सिगरेट लेने भेजना या जलाकर लाने कहना ही हमारे भारत वर्ष में एक गलत परंपरा के तहत प्रारंभिक चरण कहा जा सकता है।

तम्बाकू के धुंए में सांस ले रहे नव-निहाल

भारत वर्ष गांवों का देश है। गांवों के लगभग हर घर में धूम्रपान जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है। ऐसे घरों में जन्म लेने वाले बच्चे न चाहते हुए भी धूम्रपान की ज्यादतियों का शिकार हो जाते है। पेसिव स्मोकिंग या सेकेंड हेंड स्मोकिंग उतनी ही नुकसान देह है, जितनी किसी धूम्रपान करने वालों के लिए होती है। हम बड़ों द्वारा फेंकी गई बीड़ी या सिगरेट के टुकड़ों को उठाकर पीने की आदत को सेकेंड हैंड स्मोकिंग कह सकते है। बढ़ते बच्चों में इस प्रकार की आदत ज्यादा खतरनाक हो सकती है। कारण यह कि उनका विकास इस तरह की आदत से प्रभावित हो सकता है। यह एक कटु सत्य है कि जिन घरों में सिगरेट या बीड़ी का धुंआ रह-रहकर उठता रहता है, उन घरों के बच्चे तम्बाकू के धुंए में ही सांस लेते हुए बड़े होते है। इस तरह बीड़ी-सिगरेट का सेवन न करने के बाद भी उनका जीवन नरक बनने लगता है। शिशु रोग विशेषज्ञ अथवा मनोवैज्ञानिकों की माने तो छोटे बच्चों में वयस्कों की तुलना में जल्दी-जल्दी सांस लेने की क्रिया होते रहती है। यही कारण है कि उनके फेफड़ों में बीड़ी सिगरेट का खतरनाक धुआं तेजी से प्रवेश करता है। धूम्रपान का एक दूसरा पहलू भी बड़ा दर्दनाक है। प्राय: ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं भी बीड़ी पीने की आदत की शिकार होती है, जो उनके बच्चों के लिए हानिकारक हो सकता है। कमोबेश यही दुष्प्रवृत्ति शहरों में रहने वाली भद्र समाज की आधुनिक नारियों में भी पाई जाती है। बड़े शहरों एवं महानगरों में महाविद्यालयीन युवतियां भी बड़े शौक से सिगरेट का कश लगाती देखी जा सकती है। यह एक फैशन के रूप में भी स्वीकारा जा चुका है।

शारीरिक अंगों से तार-तार कर रहा

सिगरेट या बीड़ी का धुआं बच्चों की श्वसन प्रणाली पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है। इसी कारण बच्चे अस्थमा जैसे बीमारी का शिकार हो रहे है। यदि बच्चों में अस्थमा की बीमारी पहले से ही विद्यमान हो, तो बीड़ी सिगरेट का धुआं इसे बढ़ाने में ‘एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा’ की तर्ज पर अपना प्रभाव दिखाता है। धुएं के गुलछर्रे उड़ाने से आंख की रौशनी और कान की श्रवण शक्ति भी प्रभावित होती है। इसकी अति होने से अंधापन और बहरापन विकार के रूप में सामने आता है। मुख कैंसर और दांतों के खराब होने का मुख्य कारण भी धूम्रपान को माना जाता है। बीड़ी-सिगरेट के साथ ही चिलम या रगडक़र खाई जाने वाली तम्बाकू मानवीय शरीर के फेफड़ों को प्रभावित करते हुए खासी, टीबी, कैंसर, ब्रोंकाईटिस इत्यादि रोगों का बढऩे का अवसर प्रदान करते है। यह विकार मानवीय शरीर की मांसपेशियों से आक्सीजन खींचकर शरीर को कमजोर बना देते है। आज धूम्रपान के व्यसन में स्कूली बच्चे कुछ ज्यादा ही उलझते जा रहे है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भी अपना असर नहीं दिखा पा रहा है, जिसमें शैक्षणिक संस्थाओं से 200 मीटर की दूरी पर व्यसन सामग्री न बेचे जाने का आदेश कानून का रूप ले चुका है। धूम्रपान को जड़ से समाप्त करने प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर से शुरूआत करनी होगी। यह देखने में आ रहा है कि प्रत्येक परिवार में कम से कम 10 से 20 प्रतिशत सदस्य किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन कर रहे है। इसमें तपकीर एवं गुड़ाखू की गिरफ्त में आए लोग भी शामिल है।

(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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अब लोग धूम्रपान के प्रति सचेत होते जा रहे हैं -फिर भी एक वर्ग ऐसा है जो इसी से रिलैक्स होता है.इस दिशा में लोगों को सजग करने से वांछित परिणाम मिल सकते हैं

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