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ठंडी चाय / कहानी / यशोधरा विरोदय "यशु "

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देहरादून का कैण्ट इलाका है; शान्त, सुन्दर….. और ऊपर से मौसम की मेहरबानी । आज तो सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही है। सड़कें थोड़ी गीली, थ...

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देहरादून का कैण्ट इलाका है; शान्त, सुन्दर….. और ऊपर से मौसम की मेहरबानी । आज तो सुबह से ही रूक रूक कर बारिश हो रही है। सड़कें थोड़ी गीली, थोड़ी शुष्क है जिन पर एकाध गाड़ियाँ चल रही हैं । शाम के 6 बज चुके हैं और मंदिर वाली गली के कोने में नेगी ढाबे पर इस वक्त हलचल बढ़नी शुरू हो गई है , चाय और समोसे की खुशबू ने यहां बारिश के मौसम का रंग जमा रखा है । इसके सामने सड़क पर अभी अभी एक कॉलेज की बस रूकी है जो गली के गर्ल्स हॉस्टल की है । बस से एक एक कर लड़कियाँ उतर रही हैं ..... कुछ ने छाते निकाल रखे हैं, तो कुछ ने स्टोल से सिर ढक रखा है और सम्भलती हुई कदम रख रही हैं, वँही कुछ चमकती आँखों के साथ इस खुशनुमा मौसम का मजा लेने सड़क पर निकल आई हैं । आखिर में दो लड़कियाँ इत्मीनान से बस ड्राइवर को बाय करती हुई बाहर आती हैं... और बस से उतरते ही उसमें एक तेज कदमों से चल कर दुकान के टिन शेड के नीचे पहुंच जाती है , दूसरी सड़क पर रूक कर दोनों बाहें फैलाए ....“वाउ! क्या माइन्ड ब्लोईंग मौसम है यार ....बिलकुल नाईन्टिज के गानों के जैसे ...” । “हां जरूर लेकिन अभी ईपी निकाल कर और इक्कीसवीं सदी में आ जाइए स्वाति मैडम” किनारे खड़ी लड़की ने हंसते हुए कहा । स्वाति ने झट से अपने कान से ईयरफोन निकाला और मोबाईल,ईपी दोनो को बैग के साईड पाकेट में डालते हुए उसके पास पँहुच कर बोला “लो आ गई इक्कसवीं सदी में ... लेकिन इस मौसम में चाय समोसे तो बनते हैं ..रिचा” । रिचा स्वाति के कन्धे पर हाँथ रखते हुए … “हाँ तो चलो मैने कब मन किया” ।

दोनों दौड़कर नेगी ढाबे पर पहुँचती हैं ... स्वाति… “भैया दो चाय और दो समोसे .....’पनीर वाले’..” तेज आवाज में आर्डर देती है । ढाबे वाला.. “बैठिए अभी भिजवाते हैं”। दोनों ढाबे के अन्दर बने कमरे में बैठ जाती हैं ...जँहा दो चार लोग और बैठे हैं, सामने एक लड़का बैठा है ..सर नीचे है और नजरे अपने मोबाईल के स्क्रीन पर । कमरे में लड़कियों की आवाज और हँसी से सबका ध्यान उनकी तरफ आ चुका है सिवाए उस लड़के के । यहाँ लड़कियों के नान स्टाप बातों का सिलसिला शुरू हो चुका है .... स्वाति… “कल सण्डे है यार... असाइनमेंट बनाना है “। रिचा ... “हाँ पर मुझे शॉपिंग के लिए मार्केट भी जाना है, एक दिन की तो आउटिंग मिलती है हमें” । स्वाति.. “ हाँ यार मुझे भी टेलर के पास जाना है वो लास्ट वीक ड्रेस दी थी ना ऑल्टर करने.. उसे लेना है” । लड़कियाँ जिस जगह ,जिस शहर पहुँचे..सबसे पहले वहाँ के टेलर से जान पहचान हो जाती है।

बातें करती हुई थोड़ी देर में स्वाति को महसूस होता है कि मौसम तो पहले से ही ठण्डा है, कमरे में फैन ने बेकार ही शोर मचाए है..क्यों ना उसे बन्द ही कर दे....ये सोचती हुई स्विच बोर्ड पर नजर घुमाई तो देखा कि उसके बगल में सामने वाला लड़का बैठा है। स्वाति ने हल्की स्माईल के साथ उस लड़के से कहा … “एक्सक्यूज मी ! आप वो फैन ऑफ कर देंगे प्लीज..” जिस पर उसने सीधे स्वाति को कोई प्रतिक्रिया न देते हुए, ढाबे पर काम करने वाले एक लड़के को फैन ऑफ करने का इशारा कर दिया। यह देख स्वाति सोच रही है कि खुद भी तो कर सकता था ..दो कदम की दूरी पर ही तो स्विचबोर्ड है , तभी ढाबे वाला लड़का एक कप चाय और एक प्लेट बन्द मख्खन लड़के के टेबल पर रखने के बाद फैन बन्द करता है और लौटने लगता है तो उसे टोकती हुई स्वाति ने कहा..“क्यों भैया हमारी चाय कहाँ है”? लड़का… “वो अभी गर्म हो रही है” । सवालिया लहजे में स्वाति ने फिर पुछा... “अच्छा, उधर तो दे दी” । लड़का रूकते हुए.. “जी.. वो भइया थोड़ी ठण्डी चाय पीते है ना इसलिए उनको दे दी ..आप की अभी ले आते हैं”। “ओके”..होठों को गोल घुमाते हुए स्वाति ने मुँह बनाकर बोला ।

स्वाती ने सामने वाले लड़के की तरफ देखा पर वँहा तो कोई रिएक्शन ही नहीं है..जैसे कुछ सुना ही ना हो..किसी से कोई मतलब नहीं ..। उसने अपना मोबाईल टेबल पर एक साइड रखा और चाय पीने लगा। स्वाति की नजरे अभी भी उस पर है । ये देख रिचा ने धीरे से कहा .. “क्या बात है, अच्छा लग रहा है क्या” ? स्वाति ... “अच्छा है पर उतना भी नहीं जितना कि ऐटिट्यूड दिखा रहा है” कहते हुए पीछे मुड़कर ढाबे वाले को आवाज लगाई ... “भैया समोसे भी गर्म ही लाना ..ठण्डी चाय और समोसे का कोई मजा नहीं है”। अबकी उस लड़के ने एक शान्त नजर डाली सामने बैठी लड़कियों पर और फिर चाय की शिप लेते हुए बन्द खाने लगा .. तो स्वाति भी रिचा से बातों में व्यस्त होने का थोड़ा बहाना सा करने लगी.. “तो असाइनमेंट की कापी ले ली तूने” । रिचा … “नहीं अभी खरीदनी है यार, और हाँ वो उसके टापिक दे देना मुझे, मै नोट नहीं कर पाई….रावत सर भी ना एक बार जो डिक्टेट कर देते हैं दुबारा रिपीट ही नहीं करते” । “हूँ..... ले लेना, लिख लिए हैं मैंने” ...स्वाति ने कहा ।

सब बातें चल रही हैं पर रह रह कर उसका ध्यान सामने बैठे लड़के पर ही जा रहा है। अबकी स्वाति ने एक ऑब्जरवेशन वाली नजर उस पर डाली....सामान्य नैन नक्श और औसत कद काठी का लड़का है, ड्रेसिंग और हेयर स्टाईल से भी डिसेंट लग रहा है ...चेहरे पर भाव तो सौम्य है लेकिन स्वभाव से अड़ियल लग रहा है। स्वाति बाते तो रिचा से कर रही है पर मन ही मन उस लड़के के ऑब्जरवेशन में लगी है इस बीच उसके चाय समोसे कब के आ चुके ये उसे पता ही नहीं चला। “ऐटिट्यूड तो ऐसे है जैसे कि रजवाड़े से आए हैं...हमममम पर मुझे क्या करना है जो भी है” ....ये सोचते हुए फाईनली अपना ध्यान उधर से हटा कर सामने रखे चाय और समोसे पर लगाया । तभी तीन लड़के और ढाबे में एंट्री करते हैं और सामने बैठे लड़के को देख तेज आवाज लगाते है ...अबे यँहा बैठे हो! ..पास आ कर “अच्छा बेटा अकेले अकेले चाय और बन्द” कहते हुए एक उसकी बगल में बैठ गया।

लड़के ने बन्द वाली प्लेट उसकी तरफ आगे बढाते हुए कहा कि “कॉल की थी पर तुम्हारा पता ही नहीं चला , दूसरे ने बन्द का टुकड़ा लेते हुए “हाँ यार वो मैंने अभी देखा” । बाकी दो लड़के ढाबे में रखे छोटे फ्रिज को खोल कर कोल्ड ड्रिंक निकाल रहें हैं जिन्हें देख कर ढाबे वाला लड़का दौड़ कर आया है और “पूछता है क्या चाहिए आप लोगों को” ..। “कुछ ना भाई, जो चाहिए वो ले लेंगे.. अपनी ही दुकान है क्यों नेगी भैया! । इस पर ढाबे वाला मुस्कराते हुए बोला , “बिल्कुल भाईयों आप का ही है”। लड़कों की आवाजों और शोरगुल के बीच स्वाति और रिचा चुप सी हो गई हैं। दोनों खामोशी से समोसे खाए जा रही हैं। दो चार मिनट के शोरसराबे के बाद लड़के अब बाहर निकलने लगते हैं और जाते हुए कुछ समोसे उठाकर बोलते हैं.. “भैया हिसाब में लिख लेना”।

सामने वाला लड़का अभी भी अपनी जगह पर है ..अब उसने पर्स से पैसे निकाले हैं और टेबल पर रख दिया फिर अपना सेलफोन पॉकेट में डालते हुए जाने के लिए उठता है लेकिन ये क्या अबकी स्वाति उसे देख कर चौक गई , चेयर के बगल में रखे वॉकर को आगे कर जब उसने अपना पहला कदम बढाया तो स्वाति का चेहरा स्तब्ध रह गया और लड़का वॉकर के सहारे चलते हुए उसके बगल से निकलकर आगे बढ गया। स्वाति भी झट से पीछे मुड़ती है और उसे जाते हुए देख रही है ....वॉकर के सहारे चलते हुए चाल भले ही थोड़ी टेढीं है पर उसके कदम बिल्कुल सधे हुए हैं। पल भर पहले जिसको लेकर उसने ना जाने कितने पूर्वाग्रह पाल लिए थे ,अब उसी के लिए दिल पिघल सा गया है ..जैसे जैसे वो दूर जा रहा है वैसे ही दिल में उतरता जा रहा है ।

क्या लाजवाब बन्दा है! उसे देख कर लगता ही नहीं कि उसकी लाइफ में ऐसी कोई दिक्कत होगी, और एक यँहा.. अगर राह चलते वक्त कभी सैन्डल टूट जाए तो मन उलझन में आ जाता है, कुछ कदम भी चलना मुश्किल हो जाता है और दूसरा ये शख्स है जो बैशाखी के सहारे जिंदगी के सफर को तय कर रहा है लेकिन चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं है ...फिजिकली चैलेन्जड होते हुए भी गजब का व्यक्तित्व लिए हुए है। जी में आ रहा है कि दौड़कर जा उससे सारी बोल आए, उन सब उलटी सीधी बातों के लिए जो उसने मन ही मन सोच लिए थे उस लड़के के लिए ..या फिर उससे कुछ बात ही कर ले ..अरे ऐसे बन्दे से दोस्ती कर लेनी चाहिए। मन में चल रही ऐसी उधड़ बुन और धड़कते दिल पर आखिर में स्वाति ने इस विचार के साथ लगाम लगाई कि ऐसे बिन्दास व्यक्ति को किसी के दोस्ती के एहसान या किसी सहानुभूति और तारीफ की जरूरत नहीं है।

बगल में बैठी रिचा को भी स्वाति के मनोस्थिति का एहसास हो चला है और उसने ध्यान हटाने के लिए बोला कि ..“चाय पी लो… ठंडी हो गई”। स्वाति, आँखों की नमी को रिचा की नजरों से बचाते हुए जल्दी से चाय की कप उठा कर पीने लगती है और महसूस करती है कि अब ये ठंडी चाय भी उसे लाजवाब लग रही है।

xxxxxxxx

यशोधरा विरोदय  "यशु " 

मकान संख्या -501

डॉ शकुंतला मिश्र यूनिवर्सिटी आवास

लखनऊ , यूपी

 

ई -मेल yashuvirodai08@gmail.com

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रचनाकार: ठंडी चाय / कहानी / यशोधरा विरोदय "यशु "
ठंडी चाय / कहानी / यशोधरा विरोदय "यशु "
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रचनाकार
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