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व्यंग्य-राग (१०) फीतों के रंग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

(पूर्वाभास में प्रकाशित – २७.३.१६)

 

फीतों के रंग जूतों के हिसाब से बदलते रहते हैं. काले जूतों में काला फीता ही फबता है. ब्राउन जूते में ब्राउन फीता ही डाला जाता है. किरमिच के स्पोर्ट्स जूते प्राय: सफ़ेद और पीले रंग के होते हैं, उनमें, ज़ाहिर है क्रमश: सफ़ेद और पीले फीते पड़ते हैं. किस्सा कोताह, जिस रंग का जूता उसी रंग का फीता. असल बात मैचिंग की है. जूते और फीते की यह मैचिंग साड़ी के फ़ाल की तरह कठिन तो नहीं होती, लेकिन उसी की तरह ज़रूरी तो होती ही है. दफ्तर के लिए मैं तैयार हो रहा था. जैसे ही जूता कसने लगा की फीता टूट गया. मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि मुझमें इतनी ताकत कहाँ से आ गई कि वह जूते के फीते जैसी मज़बूत चीज़ तोड़ दे. ऐसा होना तो नहीं चाहिए. अत: मैंने अनुमान लगाया कि हो न हो इस्तेमाल से फीता ही कमजोर पड़ गया होगा. मुझे दफ्तर जाना था सो इस मुद्दे पर सोच विचार ज्यादह नहीं कर सकता था. तात्कालिक समस्या यह थी कि दूसरा काला फीता कहाँ से आए कि उसे डाल कर जूता पहन लिया जाए. मरता क्या न करता, फटे-पुराने ब्राउन जूतों में से ब्राउन रंग का एक फीता निकाला गया और उसी को काले जूते में पिरो कर काम चलाया गया. दफ्तर में खूब भद्द उडी. काले जूते में ब्राउन फीता, वाह! क्या ‘मैच’ है!

कितनी दादागीरी है. अगर जूते के रंग के हिसाब से आपने फीते का चुनाव नहीं किया तो आपकी भद्द होने में कभी कोताही नहीं होगी. आप चाहें इसे ज़बरदस्ती कहे या फीताशाही. लेकिन है तो है !

फीते के रंग तो तरह तरह के होते ही हैं, काम के हिसाब से उसके कई प्रकार हैं. अभी हमने जूते के फीतों की बात की, लेकिन गोटे-किनारों की तरह कपड़ो के हाशिए पर लगने वाले सूत या रेशम की पतली पट्टी के रूप में भी फीते ही होते हैं; और निवाड़ की वह पतली धज्जी भी फीता ही होती है जिससे फाइलें, बांधी जाती हैं. वह दफ्तर ही क्या जिसमें फाइलें न हों और वो फाइल ही क्या जो फीते से न बंधी हो.

इस बात का संकेत पहले ही दिया जा चुका है कि फीते के रंग और प्रकार के साथ आप कोई समझौता नहीं कर सकते. अधिकतर फ़ाइलों में निबाड़ का फीता होता है जो बेहद मज़बूत होता है. उसे खोला तो जा सकता है लेकिन तोड़ा नहीं जा सकता. खोल कर फ़ाइल का आकार बढाया तो जा सकता है लेकिन तोड़ कर फ़ाइल का वज़न कम नहीं किया जा सकता. वैसे भी हर फ़ाइल का अपना वज़न होता है. वह फ़ाइल ही क्या जिसमे वज़न ही न हो ! फ़ाइल के वज़न के हिसाब से ही फीता तोड़ने का जुगाड़ बैठाने के लिए दफ्तरों में पैसा लिया जाता है.

फाइलों के फीते अधिकतर लाल रंग के होते हैं. ये लाल रंग के क्यों होते हैं, ये आजतक किसी को पता नहीं चला. इस पर रिसर्च होनी चाहिए. वे यदि लाल रंग के न भी हों तो भी उन्हें लाल रंग का ही माना जाता है – फाइलों के फीतों के लाल रंग का इतना आतंक है ! इसीलिए तो इसे ‘लाल फीताशाही’ नाम से नवाज़ा गया है. लाल रंग, जैसा कि आप सभी जानते हैं, एक उभयमुखी, क्या कहते हैं उसे अंग्रेज़ी में, ‘अम्बीवलेंट’, रंग है – एक साथ प्रेम का प्रतीक भी है और आतंक का द्योतक भी है. लाल फीते वाली फाइलें दफ्तर को बड़ी प्रिय होती हैं, वे बाबुओं को “प्रसन्न” कर देती हैं. उनमें यह ताकत होती है की वे प्रसन्न कर सके. लेकिन वे डराती भी खूब हैं. उनके मज़बूत फीते को तोड़ने की हिम्मत जुटाना कोई आसान काम नहीं है. बड़ा जोखिम है. लेकिन बहुतेरे ऐसे उत्साही और साहसी लोग होते हैं जो यह जोखिम उठा लेते हैं. पकडे गए तो जोखिम की कमाई की रकम से ही भरपाई भी कर देते हैं. ऐसे लोगों की संख्या आजकल दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है. भारत के विकास में उनका बड़ा योगदान है. सुना है आजकल सरकार सख्त फीतों के साथ बेरहम होती जा रही है और उनका रंग बदलने क पर आमादा है. वह लाल फीताशाही समाप्त करना चाहती है. एक बड़े दफ्तर के बाबू से मेरी मुलाकात हुई. कहने लगे सरकार के चाहने से क्या होता है? लाल फीताशाही तो सनातन है और हमेशा बनी रहेगी. दफ्तर तो आखिर हम चलाते हैं.

दफ्तर बाकायदा चल रहे हैं. फाइलों के फीते आज भी लाल हैं. तथास्तु.

- डा. सुरेन्द्र वर्मा १०, एच आई जी १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद २११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग (हाइकु) – surendraverma389.blogspot.in

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