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अंतहीन / कहानी / अपर्णा शर्मा

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आनंद वर्मा बॉस के साथ कुछ जरूरी बातों में उलझे थे। तभी उनके मोबाइल की घंटी बजी। जेब से मोबाइल निकाल कर बगैर नम्बर देखे ही स्विच ऑफ कर दिया। दो घंटे बाद दफ्तर से निकल कर मोबाइल देखा तो उनके दोस्त विजय की तीन मिस्ट कॉल थी। वो अभी फोन मिलाते कि विजय ने फिर फोन किया- “हैलो, आनंद, भाई, इतना स्विच ऑफ क्यों रखते हो? मैं पिछले दो घंटे से बराबर ट्राई कर रहा हूँ।”

“हाँ बोलो क्या बात है?”

“आज शाम का क्या कार्यक्रम है ?”

“कुछ विशेष नहीं।”

“ठीक है तब आज रात का खाना तुम लोग हमारे साथ लोगे। ऋतु बहुत दिनों से कह रही है।”

“नहीं भाई शान्ति कहीं जाना नहीं चाहती। मैं कोई वादा नहीं कर सकता।”

“भाभीजी से मैं खुद बात कर लूंगा। तुम बस समय से घर पहुँच जाओ।”

“ठीक है।” आनंद ने मोबाइल जेब में रख लिया। तभी बस आई और वह उसमें सवार हो गया। खिड़की के पास वाली सीट ले बैठ गया और बस के अंदर के माहौल से निर्लिप्त हो बाहर देखने लगा। बस ने शीघ्र ही रफ्तार पकड़ ली और आनंद के विचारों ने भी। ठीक एक साल पहले का घर का खुशहाल माहौल उसकी नजरों में घूम गया। हँसते खेलते बच्चे और सदा गुनगुनाती मुस्कुराती बीवी। उसे सब याद आने लगा। परन्तु इस खुशहाल परिवार को ऐसा ग्रहण लगा कि उसका साया अब इस जीवन में तो हटना मुश्किल है। डर है कि कहीं वह अगली पीढ़ियों और अगले जन्म भी पीछा न करे। घर में कदम रखते ही मन बोझिल हो जाता है। समझ नहीं आता पत्नी को कैसे दिलासा दे। परिवार को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी उसी की थी। वह न दे सका। अब पछतावे के अलावा कुछ नहीं है।

आनंद ने घर में प्रवेश किया। छोटे बेटे ने नमस्ते कर उसका स्वागत किया। आनंद का मन हल्का हुआ। आज पत्नी के चेहरे पर भी उदासी कुछ कम थी। वह पानी ले आई। थोड़ी घरेलू बातों के बाद पत्नी ने कहा- “मैं चाय बनाती हूँ।”

आनंद को जरा सहारा मिला। वह बोला- “नहीं तुम जल्दी से बच्चों के लिए कुछ बना दो और तैयार हो जाओ। हमें विजय ने खाने पर बुलाया है।” पत्नी शांत रही और चलने की तैयारी करने लगी।

आनंद और शांति विजय के यहाँ पहुँचे तो विजय और ऋतु ने उनका स्वागत किया। पुरूषों में वही दफ्तर और राजनीति की बातें छिड़ गई। महिलाएँ इनसे शीघ्र ही ऊब कर अपने घरेलू विषयों पर बातें करने लगी। साथ ही खाने की तैयारी भी हो रही थी। विजय के बच्चे अंकल आण्टी के अधिक दिनों में आने की शिकायत कर रहे थे। ऋतु ने कहा- “आप लोग इतने दिनों में आए और तब भी बच्चों को साथ नहीं लाए हो। मैंने तो सभी को आने के लिए कहा था।”

शांति- “छोटे बेटे की तबियत ठीक नहीं है। इसीलिए नहीं आए और हम भी जल्दी ही लौटेंगे।”

ऋतु खाने की तैयारी में जुट गई। वह मदद के लिये कभी बच्चों और कभी विजय को छोटे-छोटे काम सौंप रही थी। साथ ही शान्ति से बातें भी कर रही थी शीघ्र ही खाना तैयार हो गया। सबने रूचकर खाया। खाने के कुछ देर बाद चाय का दौर चला। बच्चे अपने टी.वी. कार्यक्रमों में व्यस्त हो गए और बड़े ड्राईंग रूम में चाय की चुस्कियाँ लेने लगे।

अनायास ही आनंद के मुँह पर अपनी बेटी का नाम आ गया। जबकि विजय और ऋतु उसका जिक्र कर शान्ति को दुःखी नहीं करना चाहते थे। पर अब जब जिक्र छिड़ ही गया तो ऋतु ने आहिस्ता से पूछा- “भाई साहब अनुभूति का कुछ पता लगा क्या?”

आनंद ने नकारात्मक सिर हिलाया। कुछ देर सब मौन रहे। विजय ने कुछ सांत्वना देने के ख्याल से कहा- “हमें हार नहीं माननी चाहिए आनंद। अपना प्रयास जारी रहना चाहिए।”

“और क्या प्रयास किया जाय? कितना प्रयास किया जाय? कुछ सुराग मिले, कोई उम्मीद नज़र आए तभी तो आगे प्रयास संभव है। हम जो कर सकते थे कर चुके।”

“नहीं हमें बराबर पुलिस, मीडिया और समाज सेवी संस्थाओं से सम्पर्क बनाए रहना चाहिए।”

शान्ति ने गर्दन नीचे झुका ली। उसकी आँखों से कुछ बूंद आंसू टपक गए। जिन्हें उसने चुपचाप पोंछ लिया। आनंद की आँखों के कोर भी गीले हो गए। उनकी बेटी अनुभूति जो स्नातक की छात्रा थी एक वर्ष पहले अपहरण कर ली गई थी। तमाम कोशिशों के बाद भी वे उसका पता नहीं लगा पाए। यही दुःख शान्ति और आनंद को रात दिन कचोटता रहता था। उन्होंने लगभग सभी रिश्तेदारों और मिलने-जुलने वालों से किनारा कर लिया था। क्योंकि हर जगह वही जिक्र होता, जो शान्ति के लिए कई दिनों की बेचैन का सबब बन जाता था।

विजय ने शांन्ति को समझाते हुए कहा- “भाभीजी आप धैर्य रखें। मुझे पूरा यकीन है कि हमारी बच्ची एक दिन सकुशल घर लौटेगी।”

आनंद ने कप मेज पर रखते हुए गंभीर स्वर में कहा- “तुम उसके घर लौटने की बात कहते हो। पता नहीं अभी तक जिंदा भी है या नहीं?”

शान्ति सिर झुकाए हुए ही गम्भीर स्वर में बोली- “मरने की खबर ही मिल जाती तो तब भी कलेजा ठण्डा हो जाता अधिक डर तो इसी बात का है कि जिंदा है तो पता नहीं किस हाल में कहाँ किन हाथों में...।” इतना कहकर शान्ति सुबकने लगी।

विजय और ऋतु उन्हें दिलासा देते रहे। कपों में अधपी चाय ठण्डी हो गई। आनंद और शान्ति उठकर खड़े हो गए। आनंद व ऋतु उन्हें छोड़ने सड़क तक आए, सभी लगभग मौन थे ।

आनंद और शान्ति की आँखों से छलका दुःख और मेहमानों के जाने के बाद के सूनेपन से उत्पन्न सन्नाटा विजय के घर में देर रात्रि तक पसरा रहा। अगली सुबह सब कुछ कार्य कलाप सामान्य तरीके से होने लगे। परन्तु शाम को विजय के घर लौटने पर चाय पीते वक्त ऋतु ने अनुभूति का जिक्र छेड़ दिया। वह शान्ति के दुःख से दुःखी थी और उसके हाव-भाव से लग रहा था कि दिन में उसने शायद इस मसले पर गम्भीरता से विचारा होगा और कई बार भावुक हुई होगी। ऋतु ने चाय का घूट पीते हुए गम्भीर भाव से कहा- “भले लोगों की ही भगवान क्यों परीक्षा लेता है। बेचारी शान्ति की हालत देखी नहीं जाती। न जाने किस ने किस जन्म का बैर निकाला है इन लोगों से।”

“कुछ स्पष्ट भी तो नहीं है कि किसी ने जान बूझकर साजिश रची है या बच्ची ही नादानी कर गई।”

“ऐसा तो सोचना ही व्यर्थ है। अनुभूति जैसी समझदार लड़की ऐसा गलत कदम उठाएगी, विश्वास नहीं होता। यह सब इन्ही बेखौफ लोगों का काम है जो भोली-भाली लड़कियों को बहका फुसलाकर या डरा धमकाकर गलत रास्ते पर डालने का धंधा कर रहे हैं। वे ही जगह-जगह कितनी ही शर्मनाक और खौफनाक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इस सब में उन्हें मोटा पैसा जो मिल जाता है और हमारी पुलिस तो उन्हें खुली छूट देती ही है। मरना हर तरह से औरत को ही है।”

“ऐसी घटनाओं के पीछे औरत का लोभ और मंद बुद्धि भी कम जिम्मेदार नहीं है। वह स्वयं लालच में फंसती है और स्वयं को भौंड़े तरीके से प्रस्तुत कर रही हैं।”

“पर उस प्रदर्शन को देखने और बोली लगाने वाला पुरूष है। पुरूष का क्षणिक सुख और पैसे का दंभ उसे बाजारू भड़कीली औरत की तरफ ले जाता है। आज विश्व पटल पर औरत को इस नजर से देखने का पुरूष का हक बलवती होता जा रहा है। मूल में धन है। जो धन पहले स्थानीय स्तर पर औरत के शोषण का कारण था आज वह अन्तर्राष्ट्रीय रूप ले चुका है। धनाढ्य देशों के नागरिक पर्यटन के बहाने गरीब देशों में जाय या स्वदेश में ही विदेशी माल का भोग करें उनके लिए दोनों हाल में पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं।”

“फिर भी मर्यादाओं को संजोना औरत का दायित्व है क्योंकि अधिक पश्चताप वह स्वयं ही करती है। तब जिन हालातों को बर्दास्त नहीं कर पाती उनको न्यौता ही क्यों देती है।”

“तुम ऐसा कैसे कह सकते हो? औरत हालातों को न्यौता देती है? अभी कुछ दिनों पहले एक धनी तानाशाह ने सुन्दरियों के लिए एक भोज का आयोजन किया था। इसमें शामिल होने के लिए सुन्दरियों की फीगर, वेट, हाइट और कलर जैसे सौन्दर्य के मानक निर्धारित किए थे।”

“और सुन्दरियों ने देश समाज, धर्म और साम्प्रदायिक मान्यताओं को धता बताकर वहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इतना ही नहीं नारीत्व की मर्यादाओं को ठेंगा दिखाते हुए मेजबान की निगाहों में आने को उसका भरपूर मनोरंजन किया।”

“जहाँ तक भागीदारी और जिम्मेदारी का सवाल है। वह किसी एक के माथे नहीं मढ़ सकते हैं। आज समाज के विविध पक्ष इस सम्बन्ध में गैर जिम्मेदार रवैया अपना रहे हैं। जिसकी चर्चा की आवश्यकता है वहाँ मौन, जहाँ दण्ड की आवश्यकता है वहाँ उदार, जहाँ निगरानी की जरूरत है वहाँ आँखे बंद किए है। मीडिया ने तमाम अचर्चित विषयों को चर्चा का विषय बना दिया है। जिसका असर नकारात्मक अधिक हो रहा है। साल भर के बालक से नब्बे साल तक के बूढ़े को एक जैसा मनोरंजन परोसा जा रहा है।”

“टॉप टैन सबको एक से कार्यक्रम जो परोस रही है। हर जगह तो उन्हीं का राज है। हीरो तो बेचारे बराबर के ठुमके लगाकर भी पिछड़ रहे हैं।” स्त्री अपनी परिभाषा बदल रही है। चंद दशकों पहले ममता दया, धर्म की वाहिका आज माता-पिता की हत्या जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम दे रही है।

“यह एक लम्बी बहस है। मूल प्रश्न यह है कि तमाम प्रयासों योजनाओं और गतिविधियों के बाद भी वैश्यावृत्ति का धंधा बंद क्यों नहीं हो रहा है? क्यों बार-बार मासूम लड़कियों को उठाकर उसमें झोंक दिया जाता है और फिर वहाँ से लौटने के उसके सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं।”

“निश्चित यह एक गम्भीर सवाल है और यह स्थिति किसी भी देश समाज के लिए शर्मनाक है। पर खाली यह उम्मीद लिए रहना कि पुरूष ही नारी का पूरा उद्धार कर देगा बेमानी है। इस संबंध में महिला को स्वयं भी सीमाएं, तय करनी होंगी। एक दूसरे की मदद को आगे आना होगा। पूरी सुरक्षा आत्म नियंत्रण में ही निहित है अन्य कोई भी उसे नहीं दे सकता है।”

ऋतु ने सहमति में सिर हिलाया- “हूँ, किसी एक दो दोष देना या उसी से पूरे हालत पर काबू पा लेने की उम्मीद रखना ठीक नहीं। दोनों ही पक्षों को अपने-अपने ढंग से कार्य करना होगा और दोनों का उद्देश्य एक ही बना रहना भी जरूरी है।”

बच्चे खेल खत्म कर लौट आए थे। उनके शाम के नाश्ते का समय हो गया था। ऋतु उठकर रसोई में चली गई। बच्चे पापा को दिन भर की घटनाओं का ब्यौरा देने और अपनी फरमाइशे करने लगे।

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लेखिका

clip_image002डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं - भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

मैं किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

सम्पर्क -

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

(अपर्णा शर्मा)

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