बुधवार, 4 मई 2016

आलोक कुमार की कविताएँ

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मौन रहना सीख लो

तुम भी,

मौन रहना सीख लो।

गिरने दो

अधर की लहर को

हृदय के कुण्ड में

क्यों बहे यह जगत में

व्यर्थ में।

चहना जिनको भी होगी,

जोड़ लेगें

मन को अपने, हृदय की तुम्हारी

डोर से,

प्यास लगने पर पथिक

कुँए को खोजता है।

कुआँ किसी को अंजुलि में

पानी नहीं देता।

स्नेह को न करो

व्यक्त तुम, शब्द में।

मौन ही, सबसे बडी

अभिव्यक्ति है।

'''''''''' आलोक

 

मेला

यह जीवन है,

एक चौराहा।

यहाँ मेला है,

कुछ लम्हों का।

रिश्तों के भूले रस्तों से,

आते रहते हैं लोग यहाँ।

कई चेहरे हैं,

इन चेहरों में,

कई अपने हैं

कुछ बेगाने भी।

पहचानेगे,

समय की धूल झाड़कर

अपनों को,

पर समय कहाँ है

इतना भी ?

कल मेला भी तो उजड़ेगा,

चेहरे सब गुम हो जाएँगें।

रह जाएगा बस,

एक अहसास,अस्पष्ट

और प्रतीक्षा,

अगले मेले की।

'''''''''' आलोक

 

तलाश

अट्टालिकाओं के इस शहर में,

बस एक कमरे की तलाश।

है अजीब सी बात,

फिर भी चल रही है आज,

इस घरों के जंगल में,

एक अदद घर की तलाश।

भटक रहे हैं डालियों पर,

छोड़कर सब काम.काज।

है अजीब सी बात,

फिर भी चल रही है आज,

पत्तियों से भरे वृक्ष पर,

एक अदद पत्ती की तलाश।

लोग कितने, और कितने,

हैं योग अपने आसपास।

है अजीब सी बात,

फिर भी चल रही है आज,

साधनों की भीड़ में गुम,

बस एक संयोग की तलाश।

जिन्दगी के शोर गुल में,

है भरा मृत्यु का त्रास।

है अजीब सी बात,

फिर भी चल रही है आज,

जल रही एक देह में ,

बच गए जीवन की तलाश।

''''''''''' आलोक

 

आत्मबोध

आलोक हूँ मैं,

दिखता नहीं, पर दिखाता

कर्मपथ मैं, सहचरों को ।

काल हूँ मैं,

रूकता नहीं मैं, रोकता हूँ

मृत्यु बनकर, नश्वरों को ।

है अनादि इतिहास मेरा।

अंतहीन प्रवास मेरा।

मृत्यु-जीवन से परे हूँ,

किन्तु मैं अहसास देता।

मुक्त होकर भी स्वयं मैं,

हर्ष व आमर्ष का आभास देता।

निर्मोह हूँ मैं,

किन्तु फिर भी,

जन चेतना में मोड़ देता।

मुक्ति देकर प्रियजनों को ,

भोगने को छोड़ देता।

जानता हूँ सभी को,

किन्तु मैं अज्ञान फिर भी।

पूज्य हूँ, श्रद्धेय, हूँ

प्रख्यात हूँ मैं, 'ईश' पद से।

''''''' आलोक

 

 

बाग

मैंने जिक्र किया था

कभी जिस बाग का

वह बाग,

आज भी मौजूद है।

बस,

सूखे हुए हैं पेड़,

(बारिश जो नहीं हुई )

कल तक जो पत्ते,

हरे-भरे,

पेड़ों पर लहराते थें,

आज

विषाद का पीलापन लिए

गिरे हैं जमीन पर।

वह फूलों की सेज ,

जिस पर गर्व था मुझे,

नहीं है।

वहाँ बाकी है

पथरीली जमीन , और

ढेर सारे काँटे,

पैरों को चुभने के लिए।

तुम्हारा अब भी गुजरना होगा

बगीचे से ,पर

हर आहट पर तुम्हारा

इंतजार न होगा।

न होगी अब वह फूलों की सेज,

तुम्हारे आराम के लिए,

पड़ी होगी वहाँ पर, एक चटटान

निराशा की।

चन्द पल बैठ वहाँ,

आँसू बहा लेना।

आज कल,मैं भी,

रोया करता हूँ,वही पर बैठकर।

कभी-कभी,

कल्पना जब,

बेहद परेशान करती है।

'''''''' आलोक

 

 

अन्तर्द्वन्द्व

मैं जो सोचता हूँ,

मैं जो चाहता हूँ,

वह होता नहीं है।

क्यों

परिस्थितियों के मकड़जाल में,

उलझ जाता है बार बार

मेरा विस्तार।

और मैं,

संकोच के वृत्त में बैठा,

अपनी अंगुलियों से व्यर्थ

स्वयं को सहेजने का

करता हूँ प्रयत्न।

असफल आक्रोश,

अधीर,अनियंत्रित आचरण को

देता है जन्म।

और फिर,

बस आग होती है,

शीत पड़ने के पश्चात भी

एक अजीब सी गन्ध

वातावरण में,

जलने और जले होने के मध्य

विवश,असमर्थ मनःस्थिति की।

जो सुना,सत्य मान बैठा मैं,

और एकान्त में,

'अदृश्य' की कल्पना किया करता हूँ।

मेरे,जगत के मध्य

है असमंजस की बाड़।

विच्छिन्न आलोक में,

उलझा हूँ तर्क में,

या मैं अंधेरा हूँ,

या जग अंधेरा है।

''''''''''''' आलोक

 

 

अतीत के मलबे के नीचे.......

अतीत के मलबे के नीचे

कराहता वर्तमान ,

मुँदती आँखों से है देखता,

रक्तिम भविष्य को।

मैं तोड़ना चाहता हूँ

परंपरा को।

मैं विलग हूँ स्वभाववश

समाज से।

रचने की आकांक्षा है,

कुछ,मौलिक,नवीन।

पर, करूँ क्या ?

रक्त.रंजित हाथों पर मेरे,

पड़े हैं भूत के प्रस्तर।

मैं अतीत का मोह नहीं करता,

विवशता, हाय!

इसे मैं छोड़ भी तो नहीं पाता।

झपकती आँखों से बस,

देखता हूँ,

क्षितिज को, भविष्य के।

मेरे और भविष्य के मध्य,

आकांक्षा है, आशा है

और,

दूरी है, अंतहीन।

''''''''' आलोक

--

 

alok kumar 

deputy jailor

district jail 

kanpur nagar (U.P)

pin 208001

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