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थक जाते हैं ये गधे-घोड़े और खच्चर - डॉ. दीपक आचार्य

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यों तो गधे, घोड़े और खच्चर बोझ ढोने के लिए ही होते हैं और इनके भरोसे सांसारिक यात्राओं का संपादन भी होता रहा है और तीर्थाटन से लेकर युद्ध के मोर्चे तक में भी ढेरों भूमिकाओं को पाया जा सकता है लेकिन अब न घोड़ों में उतना दम-खम रहा है, न खच्चरों और गधों में।

रहे भी कैसे अब जो भी बोझ रहा है वह परंपरागत नहीं है बल्कि बोझ के मामले में भी हम नवाचारों के युग में प्रवेश कर चुके हैं। आजकल तरह-तरह का बोझ ढोना पड़ रहा है दुनिया के तमाम बोझा ढोने वालों को।

अब तो जो जितना अधिक बोझ ढोता रहता है वह उतना अधिक सामाजिक, सहिष्णु और आज्ञाकारी माना जाने लगा है और जो बोझ से दूर रहने के हुनरों और तिलस्मों से वाकिफ हैं वे सारे मौज-मस्ती उड़ाते हुए उन्हें चिढ़ा रहे हैं जो कि निष्ठा से सेवा करने को ही जिन्दगी मान बैठे हैं।

पुराने घी से बने जिस्मों और संस्कारों में पले-बढ़े घोड़ों, गधों और खच्चरों को कुछ नहीं कहना पड़ता है, वे अपने सारे काम चुपचाप कर दिया करते हैं। न वे किसी से शाबाशी चाहते हैं, न इन्हें किसी से पुरस्कार, सम्मान और अभिनंदनों की लालसा होती है।

जो काम दिया गया उसे पूरी तल्लीनता के साथ पूरे करते हैं और परिपूर्णता एवं परिपक्वता पाकर ही दम लेते हैं।  पर आजकल सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है। ये वही काम करते हैं जो उनके अपने होते हैं और वे ही बोझ उठाते हैं जो या तो कोमल-मखमले और गुदगुदेदार होते हैं या फिर इनसे खनकने की आवाज आती हो।

इतने बेशर्म और निर्लज्ज हैं कि अब न चाबुक से मानते हैं, न कुछ कहने-दुत्कारने और गुर्राने से।  ये सारे के सारे मनमर्जी के बादशाह हो गए हैं। इनके भीतर से वह गंध ही समाप्त हो गई है जो इन्हें हर पल स्वाभिमान, पुरुषार्थ और सेवा के भावों का स्मरण कराती रहती थी और  इन्हीं के बूते ये त्याग को अपनाते हुए अपने कर्म की सुगंध देते थे।

ऊपर से कितना ही कुछ कह दिया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि अब वो बात रही ही नहीं। इनके भीतर औरों के लिए जीने, औरों की सेवा करने और सेवा के माध्यम से आत्मतोष और पुण्य की चाहत खत्म हो गई है।

इन्हें अब अपनी प्रतिष्ठा की भी नहीं पड़ी है, चाहे कुछ कर लो, कह दो, सब बेअसर ही रहता है। रहे भी क्यों न, जब इनका लक्ष्य ही एकतरफा हो गया है। जब बस्तियों और इंसानियत के गलियारों से जंगल के रास्ते एक बार निकल ही पड़े तब कौन पालतु और उपयोगी रह पाता है, सारे के सारे ऎसे होते जा रहे हैं कि जैसे फालतू ही हों, और पृथ्वी भी इनके भार से तंग आ गई हो।

कोई सा काम बताओ, पहले तो ना नुकर करते हुए यही प्रयास करते हैं कि उन्हें कभी कोई काम करना ही नहीं पड़े, बैठे-बैठे पूरे के पूरे चरागाह को चट करते रहें। और सौंप ही दिया जाए तो फिर सौ-हजार बहाने बनाते हुए अपने आपको नाकारा सिद्ध करने के आत्मप्रयास करते रहेंगे और अपने नाकारापन या काम बिगाडू कल्चर से काम भी बिगाड़ देते हैं और माहौल भी।

और कुछ नहीं तो जब-जब काम आ पड़े ये थके-हारे घोड़े, गधे और खच्चर अपनी मनगढन्त  व्यथा कथा सुनाते हुए औरों की मानवीय संवेदनाओं को भुनाने के लिए सब कुछ दांव पर लगा देते हैं।

बहुत सारे ये थके हुए नाकारा और संवेदनहीन प्राणी हर तरफ नज़र आने लगे हैं जिनके बारे में साफ-साफ सुना और अनुभव किया जाता है कि क्यों न इन्हें अपने-अपने बाड़ों से धकिया कर कहीं दूर भेज दिया जाए ताकि बाड़े साफ-सुथरे भी रहें और काम भी होता रहे।

इनके लिए न कोई च्यवनप्राश काम आ रहा है न शिलाजीत या और कोई औषधि अथवा पारंपरिक जड़ी-बूटी। इनसे मुक्ति पाए बगैर न समाज का भला हो सकता है, न देश का। 

क्यों न इनका दाना-पानी और सब कुछ छीन कर देश निकाला दे दिया जाए ताकि देश के लोग खुश रह सकें और वह सब कुछ पा  सकें जिनके लिए हम बने हैं, यह देश बना है।

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