रविवार, 1 मई 2016

लघुकथा / बहन / रमाकांत यादव

'बहन'

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दुर्ग से छपरा जाने वाली ट्रेन 'सारनाथ एक्सप्रेस' रात के सन्नाटे को चीरती हुई मध्य प्रदेश की घाटियोँ से होकर गुजर रही थी.मैं जनरल बोगी मेँ बैठा झपकियाँ ले रहा था कि तभी किसी ने मुझे आवाज दी,"थोड़ा उधर खिसकिए ,मुझे भी बैठना है."मैं चौँक कर उठा तो देखा सामने एक खूबसूरत लड़की खड़ी मुस्कुरा रही थी. मानवता के नाते मैंने उसे बैठने के लिए सीट दे दी.

थोड़ी देर बाद उसने मेरा परिचय पूछा और अपने बारे मेँ भी बहुत कुछ बताया .अचानक उसकी निगाह मेरी डायरी पर पड़ी. "क्या मैं आपकी डायरी देख सकती हूँ?"

"क्योँ नहीँ? ये लीजिए " कहते हुए मैंने अपनी डायरी उसके सुपुर्द कर दी.

उस डायरी मेँ मेरी कुछ कविताएँ और कहानियाँ थीँ.

"अरे वाह!आप तो कवि और लेखक भी हैँ .क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकती हूँ?"

"पूछिए"

"क्या आपकी कोई गर्लफ्रेँड है ?

"नहीँ,मगर आप ये सब क्योँ पूछ रही हैँ?"

"क्या आप मुझे अपनी गर्लफ्रेँड बनायेँगे?"उस लड़की की बात सुनकर मुझे उस पर थोड़ा गुस्सा तो जरूर आया मगर मैंने उससे प्यार से कहा,"मैंने आपको अपनी बहन समझकर बैठने के लिए सीट दी है न कि गर्लफ्रेँड समझकर."इतना सुनते ही

उसकी आँखोँ से झर-झर आँसू बहने लगे .उसको रोता देखकर मैं घबरा गया और पूछा,"क्या हुआ बहन?"

आँसू पोंछते हुए उस लड़की ने जवाब दिया,"भईया, अगर लड़कियोँ के प्रति ऐसी सोच आज का हर नवयुवक रखने लगे तो भविष्य मेँ फिर कभी किसी बहन की आबरु नहीँ लुटेगी."

रमाकांत यादव

पता-नरायनपुर, नेवादामुखलिशपुर , बदलापुर, जौनपुर, उत्तर प्रदेश-222125

मो.9984352193

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