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आम पुराण / डॉ. कामिनी कामायनी

आम पुराण।

इस बार उत्तर प्रदेश और बिहार में आम के वृक्ष फल नहीं देने की वजह से लज्जित से खड़े दिखाई पड़ रहे थे, कहीं कोई एक दो पेड़ फला तो फला, मगर वह भी गदराया सा नहीं । किसानों में, बागीचे के मालिकों में गहरी उदासी देखकर, मन ने कहा, कोई बात नहीं, इस साल नहीं तो अगले साल, हमें कैसे भूल जाएगा हमारा, प्यारा आम, जिस पर हमें बहुत नाज़ है । हमें वे वक्त याद आए,जब

एक जमाने में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अपनी भारत यात्रा में आम का नाम लेकर कोयल की सुरीली तान की भांति आम पर चर्चा कर भारतीय जनता को हर्षोल्लास से भर दिया था । हमारे पास रसीले आम हैं, महसूस कर सभी झूम उठे ।

इस पर गहन अध्ययन के लिए कोश, किताब छानने के  पश्चात हमने पाया, बहुत सी मीठी, बिना गुठली की जानकारी, जो प्रस्तुत है –

वृहत हिन्दी कोश के मुताबिक, इसका अर्थ है, एक प्रसिद्ध फल, जिसे आम्र या रसाल भी कहा जाता है ।यह पुल्लिंग है और इसका बोट्निकल नाम है मेंजीफेरा इंडिका ॥ बाली{ इन्डोनेशिया } में इसे मांगुस्तीन कहते हैं ।

आम का विशिष्ठ अर्थ भी है, जैसे, आम खास, दीवाने आम, जहां बादशाह जनता के बीच बैठते थे, आम दरबार –खुला दरबार, जिसमें सभी लोग जा सके । आम फहम –जो सबकी समझ में आ सके । आम रास्ता, आम राय, आम लोग, आदि आदि । मगर चर्चा यहाँ सिर्फ रसाल पर है ।

आम हमारी सभ्यता और संस्कृति का भी प्रतीक है । हमारे यहाँ शादी ब्याह में आम्र वृक्ष की पूजा की जाती है । पूजा के समय कलश में आम्र पल्लव रखना अत्यंत शुभ माना जाता है । हवन ।यज्ञ में सूखी लकड़ियों का प्रयोग होता है ।

ऐसा भी कहा जाता है कि तुलसीदास ने जिस भूत की सिद्धि कीथी, वह आम के पेड़ पर ही रहता था ।

भारतीय साहित्य में इस पेड़ को काफी लोक प्रियता प्राप्त है ।अमराईयों में झूले डालकर झूलती नायिकाओं के नयनाभिराम रूप और मनोहारी किस्से से संस्कृत साहित्य समृद्ध है ।लोकगीतों में भी इसकी महिमा कम नहीं है ।

“अमुआ के डाली पे बैठी कोयलिया” किसी भी व्यक्ति को, उसके ग्राम्य जीवन, उसके परिवेश की याद दिलाने के लिए जब मधुर स्वर से कूकती है, तब मन आत्मविभोर हो जाता है ।उसे प्रकृति की यह दूती अपनी सखी सहचरी मालूम पड़ती है ।‘ अमुआ तले डोला रख दे मुसाफिर’ विदा होकर ससुराल जाती बेटियों की विरह वेदना कितनों की आँखों को अश्रुपूरित कर देती है ।

आम प्रतीकात्मक स्वरूप है जिंदगी के बदलते स्वरूप का भी, कभी खट्टा, कभी मीठा ।

आम के अनेक किस्में हैं, लंगड़ा, चौसा, तोतापरी,मालदह, कृष्ण भोग, दस हरी, बंबईया, कल्कतिया,सुपारी, सिंदूरी, अल्फ़ान्सो दक्षिण भारतीय आदि । अल्फ़ान्सो अपनी उत्तम स्वाद के वजह से देश विदेश में प्रथम स्थान बनाए हुए है ।

आम खाने का एक विशेष अंदाज भी है, जिसे देवगौड़ा जी के शासन काल में तत्कालीन बिहार नरेश लालूजी ने उन्हें बिहारी तरीके से पत्रकारों की उपस्थिति में,पानी से भरे बाल्टी से निकाल, पूरा  आम खाकर सिखाया था ।

आम एक विशिष्ट तोहफा भी है । बेटी का ससुराल हो या बेटा का समधियाना, मुखिया जी का घर हो या मंत्री जी का, कलक्टर हो या कमिश्नर ;सजी हुई बड़ी सी आम की टोकरी बड़े बड़े लंका पार कर देती है । जटिल से जटिल ननद, क्रूर से क्रूर अफसर और घाघ से घाघ समाज सेवक भी आम का सौगात पचाते पचाते रसीले हो जाते हैं ।

अगर उलाहने भी आए, हुंह,कैसे आम भेजे ? खट्टे थे । “कोई बात नहीं अबकी बार और भी गुणवत्ता वाली दो टोकरी और भेज देंगे”।

बात खतम ।

राजनैतिक गलियारों में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है । बहुत साल पहले जब पाकिस्तानी राष्ट्रपति भारत आए थे तो इस मधुरिम फल को साथ लेकर आए थे, ताकि मीठे मुंह और मूड के साथ गंभीर वार्ता कामयाब हो सके ।

आम भले ग्रीष्म ऋतु का फल है, मगर आज के इस वैज्ञानिक युग में किसी न किसी विधि से इसे सालों भर खाया जा सकता है ।यही कारण है कि जार्ज बुश को फरवरी माह में ही इससे तैयार डिश खाने को मिला और वे इसके स्वाद के दीवाने हो कर अमेरिका एक्सपोर्ट करने का वादा करवा लिया । पहले का प्रतिबंध जो पेस्टिसाईड वगैरह से था, एक ही बार के स्वादिष्ट कौर से निरस्त कर दिया गया ।

वैसे आम का निर्यात आम आदमी के लिए भीषण कष्टप्रद रहा है । इस स्वार्गिक, मधुमय, रसमय स्वाद से उन्हें वंचित रख, वाणिज्यिक सभ्यता में, विश्व व्यापार को बढ़ावा देकर डालर के प्रेमी, आम का आम और गुठली का दाम सोचते सोचते, सहस्त्रो सिर वाले राक्षस हो जाते हैं । ऐसा ही एक किस्सा बहुत साल पहले बिहार प्रदेश का आया था, जब अमराईयों से प्रत्यक्ष रूप से आम अदृश्य होने लगा था ।ऐसी बात नहीं थी कि पेड़ हड़ताल पर थे या गंगा की उर्वर भूमि बांझ हो गई हो ।एक साल कम, दूसरे साल ज्यादा फसल हमेशा तैयार होती रही, मगर बहुत ही ऊंचे दामों पर उसे महानगरों में भेज दिए जाते थे । कुछ साल बाद फिर पता चला, इस बार आम बहुत सस्ता हो गया ।[अफवाह था या सच पता नहीं ], तत्कालीन बिहार सरकार ने आम बाहर भेजने पर प्रतिबंध लगा रखा था । आम गरीब अमीर सबको खाने का मौका मिलना चाहिए ।

आम के स्वाद के साथ साथ इसे पौष्टिकता का भरपूर खज़ाना भी माना जाता है ।इसमें बहुत सारे विटमीन्स, आदि पाए जाते हैं । आम पापड़ खाने वाले लोग कहते नहीं अघाते हैं कि इसे रात भर पानी में भिंगोकर, सुबह मथ कर खाने से पेट की अन्य तकलीफ़ों के साथ एमिओबाइसिस नामक बीमारी भी ठीक हो जाती है । कच्चे आम का पना भीषण गर्मी की ताप से बचाता है ।

वैसे देखा जाए तो इसमें सब कुछ है, रंग, रूप, गंध, रस, गुण ।इसकी भीनी भीनी खुशबू दूर से ही मस्तिष्क के तंतुओं को सचेत कर देती है कि सावधान यहीं कहीं छुपा है फलों का राजा आम । आम सिर्फ आम नहीं, यह लाखों लोगों को आजीविका प्रदान करता है ।इतनी बड़ी कंपनी माजा, मैंगो फ्रूटी, आम के बल पर ही सिर उठाए करोड़ों का व्यवसाय कर रहा है ।

वैसे इतिहास देखा जाए तो इस पर बुश ही नहीं, अतीत के अनेक राजे महाराजे, अमीर उमरा, न्योछावर होते आए हैं । प्राचीन और मध्य काल में ऐसे अनेक दृष्टांत हैं, जब आम के दीवाने ख़ास बादशाहों ने दूर दूर से इसकी उन्न्त प्रजाति मँगवा कर अपना निजी बगीचा लगवाया । कई जगह का नाम भी आम के वजह से पड़ा, आम बाग, अमरोहा, अमरावती, आदि ।लिच्छवि गणतन्त्र की प्रसिद्ध वैशाली की नगरवधू, आम्रपाली का नाम भी, उस नवजात बच्ची का आम के पेड़ के नीचे पड़े होने के कारण हुआ ।

· अतीत वर्तमान, भविष्य सब कुछ इसका स्वर्णमयी है । भारतीयों के दिल दिमाग पर आधिपत्य स्थापित करने के साथ साथ विदेशियों पर भी इसने अपना असर दिखाए  हैं । प्रवासी इसके पौधे, बीज अपने साथ विदेश लेते गए, अपने से जुदा नहीं कर पाए यही हमारी सांस्कृतिक विरासत है, धरोहर है ।

बौद्ध धर्मकी एक कथा है ।शाक्य मुनि गौतम बुद्ध अपने किसी पिछले जनम में राजा महाजनक थे । उन्होंने ज्यादा शिक्षा नहीं ग्रहण किया, मगर अपने महल के बगीचे में लगे एक आम के वृक्ष को हमेशा निहारा  करते थे। एक बार वे अपने हाथी पर सवार होकर, मंत्री दरबारियों सहित कहीं जा रहे थे ।रास्ते में उन्होंने आम का वृक्ष देखा, जो पके पके आमों के भार से लदा,खड़ा था । राजा के मन में इच्छा उत्पन्न हुई, आम खाने की, उनके हाथ में जो डंडा था, उससे मार कर आम तोड़कर खाया, । फिर क्या था, उनके साथ चल रहे लोगों ने डंडा मार कर, फल तोड़े ही, उसकी डालियाँ, पत्ते सब नोच डाले ।शाम को राजा फिर उधर से गुजरे ।उस नष्ट प्रायः वृक्ष को देखकर उन्हें बहुत क्रोध आया । फिर उनकी दृष्टि एक दूसरे आम के पेड़ पर पड़ी ।वह वैसा ही तना शांत, अपने आप में मस्त खड़ा था ।महल में आकार वे रात भर सोचते रहे ।अगर कोई वृक्ष फल नहीं रखता है, तो लोग उसे प्रताड़ित नहीं करते हैं । राजा बनना भी इतना ही कठिन है ।कभी कोई आक्रमण करता है, कभी राज्य का कोई हिस्सा हड़प लेता है । अगर हम फल विहीन पेड़ की तरह बने तो, हमारे पत्ते ।हमारी टहनियाँ सुरक्षित रहेंगी । एक दिन वे राज पाट त्याग कर सन्यासी बन गए । अब उनसे कोई भी पूछता कि आपका गुरु कौन है, तो वे कहते आम का वृक्ष ।

दूसरी ओर हिन्दू धर्म वालों का मानना है “वृक्ष कबहुँ नहीं फल चखे, नदी न पिवे नीर, परमार्थ के कारने साधू धरा शरीर” ।

बात आम से होते होते अध्यात्म पर चली गई जो इसका ध्येय नहीं था । अंत में, हम फिर अपने राष्ट्रीय फल आम का नमन करते हैं ।

डा0 कामिनी कामायनी ॥

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