विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

हिंदी में हाइकु (११) प्रश्नवाचक हाइकु / डा. सुरेन्द्र वर्मा

जब भी हम कोई प्रश्न पूछते हैं तो सामान्यतः हमारा उद्देश्य किसी सूचना को प्राप्त करना होता है. हिमालय की ऊंचाई क्या है? सबसे ताक़तवर जानवर कौन है? अकबर का जन्म कब हुआ था? ताजमहल कहां स्थित है? तुम किधर जा रहे हो? यह समस्या कैसे हल हुई? -आदि, ये जितने भी प्रश्न हैं उन सबमें ही हम कोई न कोई जानकारी लेना चाहते हैं. यदि ऐसा है तो कविता में प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, क्योंकि कविता न तो किसी प्रकार की जानकारी लेने के लिए लिखी जाती है न ही कोई जानकारी प्राप्त कराती है. हाइकु जैसी छोटी सी कविता में तो प्रश्नों को उठाना और भी अनर्गल होगा. फिर भी हम सभी का यह सामान्य अनुभव है कि बड़ी कविताएं ही नहीं हाइकु जैसी लघु कविता भी प्रश्नवाचक हो सकती है| वस्तुतः प्रश्नवाचक हाइकुओं की एक अलग ही कोटि है.

फड़फड़ाते

मेरे वातायन पर

क्या तुम भी?

यदि हम ध्यान से देखें तो इस हाइकु में वस्तुतः कोई प्रश्न पूछा ही नहीं गया है. इस प्रश्न के माध्यम से तुम-संबोधित व्यक्ति की उपस्थिति केवल दर्ज भर की गई है और प्रश्न के पीछे एक गूढ अर्थ ध्वनित होता है.

प्रश्न करना कभी-कभी गहरे तथ्यों की ओर संकेत करता है. यह सतह के नीचे पहुंचने का एक प्रयास हो सकता है. सामान्य भाषा में भी प्रश्न का यह उपयोग हमें प्रायः देखने को मिल सकता है. क्या खुबसूरती केवल चमड़े की सतह तक ही सीमित है? अथवा, क्या गांधी का सच केवल इतना ही है कि उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए एक संघर्ष किया?, -ये सभी प्रश्न नहीं हैं. ये किन्हीं गूढ अर्थों की ओर संकेत करते हैं.

हाइकु लेखन का स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि वह गहन-गम्भीर दार्शनिक सोच की ओर संकेत करे और इसके लिए प्रायः प्रश्नवाचक पद्धति अपना ली जाती है, -

पेड़ तो यहां

खड़े क़तार बद्ध

है छांव कहां - (डॉ. गोपाल बाबू शर्मा)

चाहने से क्या

चीज़ें मिला करतीं

बावरे मन ? - (डॉ. रमेश कुमार त्रिपाठी)

उपर्युक्त दोनो ही हाइकु किसी और ही बात की ओर संकेट करते है जो सतह पर नज़र नहीं आती.. पेड़ यदि क़तार बद्ध खड़े हैं तो छांव होना चाहिए, लेकिन नहीं है. ज़ाहिर है पेड़ और छांव दोनो के पीछे कोई और ही अर्थ छिपा है. इसी प्रकार केवल चाहने भर से चीज़ें नहीं मिलतीं तो कैसे मिलती हैं – इसी की तो तलाश है.

प्रश्नवाचक हाइकु सामाजिक क्षोभ और बेचैनी की भी अभिव्यक्ति कर सकते हैं. प्रश्न करना कभी-कभी अपने क्रोध को प्रकट करना भी हो सकता है, यथा, -

गर्वीले बांस

ऊंचे-ऊंचे आवास

कैसी है प्यास? - (डॉ. मिथिलेश दीक्षित)

कैसे हैं भाई

हरदम आतुर

रुधिर हेतु ? - (डॉ. स्वर्ण किरण )

पहले हाइकु में जहां भौतिक रूप से ऊपर और ऊपर जाने की निरर्थक दौड़ के प्रति क्षोभ प्रकट किया गया है, वहीं दूसरी रचना में यह क्षोभ बढती हिंसा की वृत्ति के लिए है. डॉ. बिंदु जी महाराज ने स्वार्थ प्रेरित राजनैतिक संदर्भ में अपना गुस्सा और क्रोध जतलाया है

राजनीति में

राज है मनमानी

नीति कहां ?

यह बेचैनी, क्रोध और क्षोभ आवश्यक नहीं सामाजिक राजनैतिक संदर्भ में ही हो, यह नितांत वैयक्तिक भी हो सकता है और उसे भी प्रश्न रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है,

पास तुम्हारे

विरह अकुलाए

कैसा है प्रेम ? (डॉ. राजेंद्र जयपुरिया)

कभी कभी नितांत वैयक्तिक पीड़ा की अभिव्यक्ति भी प्रश्नात्मक हाइकु में मिल जाती है,

अर्धांग तुम

बैसाखी भी तुम थे?

चलूं मैं कैसे ? - (उर्मिला कौल)

हाइकु रचनाओं में प्रश्न के माध्यम से निरर्थकता बोध भी ज़ाहिर किया गया है, -

साधन तो हैं

लक्ष्य का पता नहीं

किस काम के ? - (रमेश चंद्र शर्मा चंद्र)

यह हाइकु जहां ऐसे साधनों की व्यर्थता को इंगित करता है जो बिना प्रयोजन के इकट्ठे

कर लिए जाते हैं, वहीं एक गहरे अर्थ में प्रयोजन रहित जीवन की निरर्थकता की ओर भी संकेत करता है.

बेचैनी, क्षोभ, खीज और क्रोध जैसे भावों को कभी कभी व्यंग्यात्मक प्रश्नों के रंग में भी प्रस्तुत किया गया है.

थे घरोंदों में

फंसे हम, आकाश

कैसे नापते ? - (डॉ. रमेश कुमार त्रिपाठी)

प्रश्न व्यंग्य तो कर ही सकता है, कभी कभी एक सुखद आश्चर्य भी प्रकट कर सकता है,

नीलाम्बर में

सितारों की फसलें

कौन बो गया ? - (रमेश चंद्र शर्मा चंद्र)

यहां यह ध्यातव्य है कि उपर्युक्त हाइकु में जो आश्चर्य व्यक्त किया गया है वह वस्तुत: विलक्षण प्राकृतिक सौंदर्य की ओर संकेत करता है न कि, जैसा कि सतही तौर पर लगता है, सौंदर्य-सृष्टा के बारे में कोई जानकारी मांगता है. प्रश्न करने का प्रयोजन यहां दृश्य की सराहना करना भर है.

प्रश्न के माध्यम से कोई जानकारी प्राप्त करना कविता का कार्य नहीं है. यह तो प्रश्न का सामान्य और न्यूनतम कार्य है. पर कविता में (और साधारण भाषा में भी) प्रश्न के अन्य अनेक प्रयोजन होते हैं. हाइकु साहित्य में प्रश्नात्मकता सामाजिक-क्षोभ, वैयक्तिक बेचैनी, आंतरिक पीड़ा, व्यंग्य और कटाक्ष, निरर्थकता-बोध आदि, अनेकानेक भावनाओं को प्रकट करने का माध्यम बनती है |

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी, / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग –surendraverma389.blogspot.in

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget