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हिंदी में हाइकु (१३) कितना खारा-आंसुओं का सागर-फिर भी प्यारा / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

कवि और व्यंग्यकार डा. गोपाल बाबू शर्मा एक हाइकुकार भी हैं. मैं यह इसलिए कह रहा हूँ की लोग हाइकुकार को अधिकतर कवि नहीं मानते. इसका एक वाजिब कारण भी है. वह यह कि आज हिन्दी में लिखे जा रहे हाइकुओं में अधिकतर काव्य तत्व होता ही नहीं. किन्तु डा. गोपाल बाबू शर्मा इसके एक सुखद अपवाद हैं. हाइकु रचनाओं में उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का कवि-रूप और व्यंग्यकार दोनों ही स्पष्ट: परिलक्षित हैं. उनका सद्य प्रकाशित हाइकु-संग्रह, ‘काफिले रोशनी के’ में आपको शायद ही कोई ऐसा हाइकु मिले जो उसे कविता के स्तर से गिरता हो. साथ ही उनकी अधिकतर हाइकु रचनाओं का स्वर व्यंग्यात्मक है. उनके हाइकुओं में दरिद्र और दुखियों के लिए संवेदनशीलता और करुणा भी है. इस लेख का शीर्षक, उनका ही एक हाइकु –“कितना खारा-आंसुओं का सागर-फिर भी प्यारा” – उनके कविता स्वरूप को पूरी तरह उजागर कर देता है.

<काफिले रोशनी के> पहले डा. गोपाल बाबू का एक और हाइकु-संग्रह <मोती कच्चे धागे में> आ चुका है. यह २००४ में प्रकाशित हुआ था. इसके १० वर्ष बाद यह संग्रह आया है. इससे पता चलता है कि डा. शर्मा हाइकु-विधा को बहुत गंभीरता से लेते हैं और वह हाइकु-ढाँचे में अपनी रचनाओं का थोक में उत्पाद नहीं करते. वह अपनी कलम तभी उठाते हैं जब उन्हें वास्तव में कुछ कहना होता है. पहले संग्रह की तरह ही ‘काफिले रोशनी के’ भी हर हाइकु में आपको वैचारिक स्तर पर कोई न कोई ऐसी बात ज़रूर मिल जाएगी जो आपका ध्यान आकृष्ट किए बिना न रहे. इसमें कहीं आज की स्थितियों का विरोधाभास है तो कहीं वैषम्य है, कहीं संवेदना है तो कहीं सकारात्मक सोच है. डा. शर्मा ने हाइकु के अनुशासन को कहीं भी तोड़ा नहीं है. हाइकु के साथ उन्होंने अपनी पूरी निष्ठा बरती है और ईमानदारी का सलूक किया है. हाइकु की जो स्वतन्त्र इकाई है, उससे कोई छेड़ छाड़ नहीं की है. उत्साही लोगों ने हाइकु-महाकाव्य तक लिख डाले हैं पर गोपाल जी ने हाइकु के मुक्त स्वरूप को ही स्वीकार किया है. न तो उन्होंने हाइकु गीत लिखे न दोहे, न हाइकु चौपाइयां रचीं जिनमें कई कई हाइकु समाविष्ट कर दिए जाते हैं.

‘काफिले रोशनी के’ {अरविन्द प्रकाशन, अलीगढ, २०१४) का प्रथम हाइकु ही कवि की सामाजिक दृष्टि को स्पष्ट कर देता है –

हम तो जिए

काँटों की दुनिया में

तुम्हारे लिए*

इस संसार में हर किसी के जीवन में दुःख और दर्द भरा हुआ है. लेकिन हम एक दूसरे की तकलीफ बाँटते हुए, जीने के लिए ही तो पैदा हुए हैं. यदि हम सब सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए भी जिएँ तो हमारा जीवन सार्थक हो सकता है. डा. शर्मा इसी तरह के जीवन जीने का आह्वान करते हैं. उनकी दृष्टि में जीवन और जगत के प्रति, ज़ाहिर है, एक सकारात्मक सोच है. लेकिन हमारे जीवन में जो विषमताएं हैं और विरोधाभास हैं, कवि उनका भी सामना करने से हिचकिचाता नहीं. जहां जहां वह विरोधाभास पाता है, वह उसकी पहचान करता है और उसे उजागर करता है.

राजनीति के क्षेत्र को ही ले लें. जनता जिनसे अपनी रक्षा की अपेक्षा करती है, वे ही राजनेता उसके दर्द को और भी बढाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. राग तो प्रेम और अहिंसा का गाते हैं, पर उनकी बगल में छुरी दबी रहती है.

पहरेदार

बन बैठे बगुले

मछलियों के *

 

अब तो काग

पहने मोर पंख

अलापें राग*

 

कैसे तमाशे

बातें बुद्ध गांधी की

काम हिंसा के *

 

यही हाल आज सामाजिक स्तर पर परस्पर रिश्तों का भी है -

गैर या सगा

आदमी से आदमी

डरने लगा *

 

मिले अक्सर

मुस्कानों में छिपे

खूनी खंजर *

 

स्वागत झूठ

मन में अ-दावतें

मुस्काने झूठी *

गरीब और अमीर के बीच अधिक खाई गोपाल बाबू को खलती है. वह इस वैषम्य को रेखांकित करने में चूकते नहीं –

गहने जड़े

कहीं बदन पर

मात्र चिथड़े *

 

कहीं अमृत

कहीं प्यास के लिए

सिर्फ ज़हर *

 

लूट ली हाय

पगडंडी की लाज

राज-पथों ने *

घर और परिवार की स्थितियां तो और भी खराब हैं. घर आँगन बंट गए हैं,. परिवार के छोटे बड़े बच्चे, जिन्हें स्कूल में पढ़ना चाहिए, गरीबी से तंग आकर कूड़े के ढेर में अपना जीवन—यापन तलाश रहे हैं. बुज़ुर्ग लोगों की बात सुनने वाला कोई नहीं रहा. वे स्वयं को शाख के टूटे पत्ते की तरह महसूस करते हैं. एक शब्द में, घरों में जहां गमलों में तुलसी और फूल होने चाहिए, कांटेदार नागफनियाँ उगाई जा रहीं हैं –

उगने लगे

घर के गमलों में

कांटे ही कांटे *

 

आँगन बंटे

दीवारें हुईं ऊंची

प्यार लाचार *

 

किससे कहे

शाख से टूटा पत्ता

मन की बात *

सब अपने अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं. गांधीजी ने एक बार कहा था प्रकृति के पास इतना कुछ है कि वह इंसान की ज़रूरी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके लेकिन वह उसकी लालसा और विलासता को बेशक पूरी नहीं कर सकती. पर आदमी लालची है. अपनी विलासता के लिए प्रकृति पर अतिचार करने से बाज़ नहीं आता. पेड़ और पौधे, जो पक्षियों और फूलों के घर हैं उजाड़े जा रहे हैं. सीता जिन्हें पंचवटी में शरण मिली थी, बुद्ध जिन्हें वटवृक्ष के नीचे बोध प्राप्त हुआ था अब बे-पनाह से हो रहे हैं. वृक्ष लगाने की योजनाएं कागजों में ही सिमट कर रह गईं हैं. डा.शर्मा कहते हैं –

कवि बनाए

फूलों ने पत्तियों ने

पेड़ पौधों ने *

 

वृक्षों ने किया

कितना बड़ा हित

सीता बुद्ध का *

 

लेकिन आज की विडम्बना देखिए –

पेड़ उगते

सिर्फ कागजों पर

कटें वन में.*

धर्म से धार्मिक भावनाएं – प्रेम और करुणा – पूरी तरह समाप्त हो गई हैं. मठों में विराजते मठाधीशों के आचरण पर प्रश्न-चिह्न लगने लगे हैं. लोग धर्म के नाम पर केवल कर्मकांडों तक सीमित रह गए हैं. वे पत्थर को पूजते हैं, और पत्थर के भगवान को तरह तरह के भोग चढाते हैं. दरिद्र नारायण को कोई नहीं पूछता. उसे तो बस गालियाँ ही नसीब होती हैं. क्षमा करने की प्रवृत्ति तो मानो पूरी तरह कुंठित हो चुकी है. क्षमा पर्व पर रस्मी तौर पर, मौखिक रूप से, क्षमा भले की मांग ली जाए पर आदमी का अहं टूटने का नाम नहीं लेता. गोपाल बाबू पूछते हैं –

क्या यही धर्म?

मंदिर स्वर्णमय

उदर भूखे *

 

बात निराली

पत्थर को प्रणाम

प्राणी को गाली *

 

टूटा न गर्व

कितने ही गुज़ारे

क्षमा के पर्व *

 

ये मठाधीश

एक सौ आठ नहीं

चार सौ बीस *

डा. शर्मा अपने समाज को आईना दिखाते हैं. लेकिन आईना देखने के लिए कोई तैयार नहीं है. वह प्रश्न करते हैं, कितने लोग हैं जो दर्पण देख सकेंगे? शीशे के सामने तो सभी गूंगे और बहरे बन जाते हैं. आईना भी क्या करे ? इस अंधेर नगरी में सभी चहरे तो बदगुमा हैं, ऐसे में आईना भी मौन हो जाता है. पर दर्पण डरता नहीं, कभी झूठ नहीं बोलता. वह पत्थर दिलों की तरह संवेदना से शून्य नहीं है. पत्थर और आईने में इसी लिए कभी निभ नहीं सकती. –

कितने हैं जो

आईने से खुद को

रू-ब-रू करें *

 

सभी चहरे

दर्पण के सामने

गूंगे बहरे *

 

अंधेरी बस्ती

बदनुमा चहरे

आईना मौन *

 

कहाँ दर्पण

कहाँ यह पत्थर

दोस्ती निभेगी? *

असंवेदनशीलता और दोमुंहापन इतना बढ़ गया है कि लगता है, शहर में बस पत्थर ही पत्थर बसे हैं. आदमी गायब है. राजनेता भले ही शान्ति और अमन की बातें बनाएं अन्दर ही अन्दर वे हिंसक इरादे पालते हैं. लोग खून के आंसू रो रहे हैं और वे थूक के आंसू लगाकर हमदर्दी दिखाते हैं.

यहाँ व वहां

पत्थरों के बाहर

आदमी कहाँ?*

 

बातें अम्न की

मगर बगल में

खंजर, छुरी *

 

मिलने लगे

आज की दुनिया में

थूक के आंसू *

कवि यह अच्छी तरह जानता है की आदमी तो सच्चे अर्थ में वही है जो औरों के लिए जिए. जिसकी आँखें परदुःख में भी नम हो जाएं. जो दूसरों का सुख-दुःख अपने सीने में दबा कर रख सके. आसुओं का पानी बेशक खारा होता है, पर बहुत प्यारा है. आंसुओं को कोई कमतर न समझे. दरिद्र के खून के आंसू यदि अपनी सी पर आजाएं तो कहर भी ढा सकते हैं.

खून के आंसू

अपनी पर आजाएं

अंगार बने*

 

मज़ा जीने में

किसी का सुख दुःख

रखे सीने में *

 

वही आदमी

रखे औरों के लिए

आँखों में पानी *

 

कितना खारा

आसुओं का सागर

फिर भी प्यारा *

अपनी दुर्बलताओं और सामाजिक दर्द से निबटने के लिए कवि एक सकारात्मक दृष्टि अपनाता है. वह कोशिश करता है कि खून के आंसू अंगार बन जाएं. वह जानता है कि

‘रेत के टीले

दिखते बड़े ऊंचे

(पर) कितने दिन?’

उसे पूरा विश्वास है कि स्थितियां अवश्य बदलेंगीं – ‘फूल खिलेंगे / खिजा को चमन से / जाना ही होगा’. इसीलिए वह अनुशंसा करता है –

लिखना है तो

मृत्यु के पृष्ठों पर

ज़िंदगी लिखो*

 

जीना ज़रूरी

हो जाओ नीलकंठ

ज़हर पियो *

 

काफिले रोशनी के आ गए हैं. अन्धकार को जाना ही होगा.

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-डा, सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११०११

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग – surendraverma389.blogspot.in

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