मंगलवार, 17 मई 2016

कहानी संग्रह - अपने ही घर में / लेन-देन : मोतीलाल जोतवाणी

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

लेन-देन

मोतीलाल जोतवाणी

टेलीफ़ोन पर हुए वादे के अनुसार मैं हफ़्तेवार ‘भारत’ के दफ़्तर में दोपहर के ठीक ढाई बजे पहुंचा। यह दफ़्तर इमारत की दूसरी मंजिल पर है। लिफ़्ट से होते हुए वहाँ पहुंचा तो देखा, मुख्य संपादक शर्मा के कमरे के बाहर बिजली का लाल बल्ब जल रहा था। उसमें आभास हुआ कि वह ज़रूरी काम में व्यस्त थे और उनके पास कोई मिलने जा नहीं सकता। फिर सोचा, वैसे तो उनके संपादकीय स्टाफ कॉन्फरन्स का समय सुबह साढ़े दस बजे से, आधे पौने घंटे के लिये होता है और ज़्यादा करके उसी वक़्त यह लाल बल्ब जलता है। इतने में न जाने क्या सोचकर मेरे चेहरे पर एक बदरंग मुस्कराहट फैल गई और मैंने वहीं स्टूल पर बैठे चपरासी की ओर देखा। उसके चेहरे पर ऐसा कुछ नहीं था, जिससे मुझे महसूस हो कि मैं अन्दर नहीं जा सकता था।

मैंने दरवाज़़े को हल्की सी दस्तक दी और अब दरवाज़ा खोलते हुए भीतर क़दम रखा तो देखा, एक नौजवान औरत शर्मा की कुर्सी के पास खड़ी, उसकी टेबिल पर झुककर उसे अपनी कुछ रचनाएं दिखा रही थी। अरे हां, यह तो वही औरत है जिसकी रंगीन तस्वीर हफ़्तेवार ‘भारत’ के मुख्य पृष्ठ पर हर बार विज्ञापित होती है ...यह बात ध्यान में आने पर मैंने शर्मा को दुआ सलाम में कुछ कहना ही चाहा कि उसने आँखें उठाकर मेरी ओर देखा और कहा.‘आओ बैठो, तुम्हारा ही इन्तज़ार था...’

मुझे पता था शर्मा को किसी एक का भी इन्तज़ार नहीं रहता है। मैं उसकी कुर्सी के सामने, मध्य में रखी बड़ी टेबिल के उस ओर रखी तीन कुर्सियों में से एक पर जा बैठा। टेबिल पर हमेशा की तरह इस बार भी देखी-अनदेखी, स्वीकृत-अस्वीकृत रचनाओं का ढेर और देसी-परदेसी अख़बारें, रिसालों के ताज़े अंकों का अम्बार करीने से रखा हुआ था।

इस नौजवान औरत ने भी आँखें ऊपर उठाकर मुझे देखा उसने उस एक नज़र में मुझमें क्या देखा पता नहीं, पर मैंने देखा उसकी निगाह में अचानक ही खुद को संभालने में हिचकिचाहट की परछाइयां तैर आईं...और जल्द ही वह टेबिल के बगल से घूमकर मेरे नज़दीक कुर्सी पर आ बैठी।

माहौल में उस नौजवान औरत के लिये तनाव की स्थिति को हटाने या कम करने की कोशिश करते हुए शर्मा ने उससे कहा.‘ठीक है, उन कविताओं में से कुछ चुनकर जल्द ही प्रकाशित की जायेंगी...।’

और उसकी मुझसे और मेरी उससे जान-पहचान कराते हुए कहा.‘यह है मिस प्रतिभा...हाल ही में दिल्ली यूनीवर्सिटी के किसी कॉलेज में हिन्दी की अध्यापिका नियुक्त हुई हैं...कभी-कभी टी.वी. पर हिन्दी में ख़बरें भी प्रसारित करती हैं...और ये हैं हमारी हफ़्तेवार में कॉलम के लेखक। ये साहब वहदत्त लखनवी के नाम से ही लिखते हैं।’

प्रतिभा ने एक बार फिर आँखें उठाकर मेरी ओर देखा और विस्मित लहज़े में कहा.‘वहदत लखनवी आप हैं? मैं आपका कॉलम बड़े चाह से पढ़ती हूं’ और उसके हाथ नमस्कार में जुड़ गए।

मैंने अपने चेहरे पर खुशी को ज़ाहिर करते हुए कहा.‘वहदत्त लखनवी नहीं, राजेश कुमार। लेकिन मेरा असली नाम इस कॉलम के सिलसिले में किसी से मत कहियेगा।’ और मैंने भी नमस्कार में हाथ जोड़ दिए।

अब वह लगभग स्वभावाविक ढंग से मुस्कराई और कमरे में भी हालात सामान्य होने लगे।

शर्मा ने मुझे संबोधित करते हुए कहा, ‘राजेश तुम्हारा कॉलम का मवाद तो वक़्त पर पहुंच गया है। लेकिन दो हफ़्तों के बाद वाले अंक के लिये एक लेख तुरन्त चाहिये...उसका मुख्य पृष्ठ ऑफसेट पर छप चुका है। उस पर जेवरों से लदी एक सुन्दर सेहतमंद नारी की पारदर्शकता काम में लाई गई है और उसका शीर्षक ‘ज़ेवरात न सिर्फ़ सौंदर्य के लिये, बल्कि सेहत के लिये भी ज़रूरी’ दिया है। अब तुम ऐसा करो, इस विषय पर कुछ मिसाल देकर एक लेख लिख दो।’

बात करते-करते उसने पत्रिका के पैड पर वह शीर्षकनुमा लेख अपनी लिखावट में लिख दिया। मैं अभी पूरी बात समझना चाह रहा था कि शर्मा ने सवाली नज़रें उठाकर मुझसे पूछा, ‘क्यों ठीक है न? पहली तक यह लेख मुझे नीचे फोटो कम्पोजिंग विभाग में देना है।’

मेरी आँखों के आगे अपने घर-परिवार के परिचित सुनार सदोरेमल की तस्वीर उभर आई। एक बार जब मैं उसके पास अपनी पत्नी के ज़ेवर एवं कंगन लेने गया था तो उन साहब ने सोने के ज़ेवरात की शरीर के जुदा-जुदा अंगों पर जुदा-जुदा असर होने का एक छोटा-सा भाषण सुनाया था। इस लेख के सिलसिले में उस सुनार से भी मिलूंगा, मैंने सोचा और शर्मा से कहा.‘ठीक है, परसों तक यह लेख कुछ ब्लैक एण्ड व्हाइट तस्वीरों के साथ आप तक पहुंच जायेगा।’

प्रतिभा ने देखा कि हम दोनों के आपसी व्यवहार में काफ़ी अनौपचारिकता थी। उसे महसूस हुआ कि मैं उस हफ़्तेवार के ख़ास लेखकों में से और उसके मुख्य संपादक के ख़ास दोस्तों में से एक था। उसने मुझसे प्रत्यक्ष रूप में कुछ कहा नहीं, पर वह अपनी कुर्सी पर जिस तरह आराम से बैठी रही, उससे मुझे लगा कि अब वह मेरे सामने अपनी हिचहिचाकट के होने की संभावना को दूर कर पाई है।

इतने में दरवाज़़े पर बाहर से किसी ने हल्की दस्तक दी। शर्मा ने कुछ झुककर अपने टेबिल की दाईं और दराज़ के ऊपर लगे बटन को बंद किया। अब कमरे के बाहर बिजली का लाल बल्ब बुझ जाने पर चपरासी ने दरवाज़ा खोला और एक शख़्स को साथ ले आया। वह शख़्स मेरे लिये अनजान न था। डॉ. शुक्ला थे वो, उस वक़्त किसी हिन्दी प्रांत में राजभाषा के निदेशक थे। मुझे उसी पल याद आया उनसे मेरी पहली मुलाक़ात उस एक समारोह में हुई थी जिसमें उसके ही विभाग की ओर से शर्मा को साल के श्रेष्ठ संपादक होने की घोषणा करते हुए पुरस्कार दिया गया था।

डॉ. शुक्ला को देखकर शर्मा ने उसका स्वागत करते हुए कहा.‘आइये, आइये शुक्ला जी।’ मैंने भी अपनी मुस्कराहट बढ़ाकर उनका अभिनंदन किया। पर प्रतिभा अदब के साथ कुर्सी से उठ खड़ी हुई।

मुझे लगा कि डॉ. शर्मा प्रतिभा से पहली बार मिल रहे थे। उन्होंने प्रतिभा से कहा.‘अरे, आप बैठिये न।’ और वह खाली कुर्सी पर बैठ गए।

शर्मा डॉ. शुक्ला को उसका परिचय देते हुए कहने लगे.‘यह है मिस प्रतिभा ...कहती है, आपका काम हो जाना चाहिये...वैसे भी मैंने अपनी ओर से एक जगह फ़ोन कर दिया है।’

डॉ. शुक्ला ने प्रतिभा की ओर एक बार फिर देखा और हाथ के इशारे से टेबिल के आर-पार इशारा करते कहा.‘आप दोनों का धन्यवाद।’

अब उसे फुरसत मिली थी और उन्होंने मेरी ओर रुख़ करते हुए पूछा, ‘राजेश कुमार जी कैसे हैं आप?’

मैंने उतने ही जोश और सरगर्मी से जवाब दिया.‘बस सब ठीक है।’

पल दो रुककर उसने शर्मा को बताया, ‘हमारे प्रांतिक भवन की आफ़िस कार मुझे हवाई अड्डे पर ठीक समय पर लेने आई। सारा काम सही ढंग से हो रहा है। मैं अपने साथ दूरदर्शन समाचार बुलेटिन के लिये आज सुबह वाली भीड़ की वीडियो कैसेट ले आया हूँ।’

यह सुनकर प्रतिभा ने शर्मा से पूछा.‘आप भी अब हमारे साथ टी.वी. सेन्टर तक चलेंगे न?’

शर्मा ने कहा.‘नहीं मैं नहीं चलूंगा...’

बात न जाने किस सिलसिले में चल रही थी। मैं टेबिल पर एक कोने में रखी अख़बारों और रसालों के ताज़े पर्चों के ढेर से ‘न्यूज़ वीक’ निकाल कर देखने, पढ़ने लगा।

पल रुककर शर्मा ने प्रतिभा से कहा.‘तुम डॉ. शुक्ला के साथ जाकर इस वीडियो कैसेट का कुछ हिस्सा आज के समाचार के प्रदर्शन में जोड़ लो...कहीं ऐसा न हो यह अहम न्यूज़ रूम में ‘किल’ या स्टूडियो में ‘क्राऊड आउट’ हो जाए...’

कुछ क्षण कमरे में सन्नाटा छा गया। मैंने ‘न्यूज़ वीक’ को उलट-पुलट करने के पश्चात रख दिया। उसमें भारत की ख़बर द्वेष के साथ पेश की गई थी। पर अब ‘न्यूज़ वीक; या ‘फारेन-टाइम्स’ की द्वेष पूर्ण व्यवहार पर बहस करने का अवसर नहीं था। अचानक मुझे महसूस हुआ कि शायद शर्मा मेरी वजह से इन दोनों के साथ टी.वी. सेन्टर तक नहीं जा रहे हैं और इसीलिए मुझे वहाँ से चलना चाहिये। मैंने शर्मा से कहा, ‘अच्छा, मैं चलता हूं, फिर परसों आपस में मिलेंगे। लेख मैं अपने साथ लेता हुआ आऊंगा।’

शर्मा ने तत्पर हाथ के इशारे से मुझे रोकते हुए कहा.‘नहीं-नहीं, हम दोनों साथ निकलेंगे। तुम्हें घर पर फ़ोन करना है तो कर लो। आज देर से शाम को इंडिया इन्टरनैशनल सेन्टर के ‘बार’ में शुक्ला ने हम तीनों को ‘कॉकटेलस्’ की दावत दी है।’

और वह कुर्सी से उठा। उसने शर्मा से कहा, ‘पांच बजे तक अपनी प्रांतिक भवन की आफ़िस कार को फारिग़ करना है...आप अपनी कार की चाबी दें, मुझे उसकी डिक्की में कुछ रखना है...’

शर्मा उसके चेहरे के भाव परखते हुए ज़रा सा मुस्करा दिया और अपने सफ़ारी सूट की जेब से चाबियों का गुच्छा निकालकर, उनमें से एक खास चाबी ढूंढकर, वह चाबी अलग पकड़ते हुए शुक्ला जी की ओर बढ़ा दी और डॉ. शुक्ला उन्हें लेकर तेज़ क़दमों से कमरे के बाहर निकल गए।

मैंने देखा, वहाँ शर्मा के कमरे में कुछ ऐसी बात थी जो मैं पूरी तरह से नहीं समझ पा रहा था; और कुछ बात ऐसी भी थी जो प्रतिभा की समझ के बाहर थी। लेकिन चार लोग, हम तीन और डॉ. शुक्ला आज रात को इंडिया इन्टरनैशनल सेन्टर में साथ रहेंगे। शायद प्रतिभा संतरे का रस पिये या लेमन जूस या शायद...उसके बाद वहीं डिनर भी होगा।

प्रतिभा और शर्मा की आँखें आँखों से मिलीं और उनके चेहरों पर एक भरपूर मुस्कराहट रक्स कर उठी। एक मुस्कराहट ने दूसरी मुस्कराहट के लिये, आज के जीवन में कामयाबी का एक और राज़ खोल दिया था।

अचानक कमरे का दरवाज़ा खुलने से उस बात पर ज़्यादा तवज्जो न दे पाए। सहायक संपादक भारद्वाज अपने एक हाथ में ले-आउट शीट और दूसरे हाथ में ब्रोमाइड लिये अन्दर आया और शर्मा के सामने उन्हें रखते हुए कहा, ‘सर इस लेख की दस लाइन बढ़ रही हैं। ये पंक्तियां दूसरे किसी पन्ने पर भी नहीं ले जा सकते।’

शर्मा ले-आउट पन्ने पर ब्रोमाइड कागज़ रखकर जांचा उस पन्ने पर लेख के उन्वान और तस्वीरों वगैरह के लिये जगह ख़ाली छोड़ दी गई थी। उसने कहा, ‘आख़िरी पैराग्राफ़ का सार दो पंक्तियों में देकर यह लेख यहीं ख़त्म कर दो...’

भारद्वाज ने बीच में ही कहा, ‘पर सर, यह आदमी पहले भी दो बार आपसे शिकायत कर चुका है...आपने ख़ुद उसकी कुछ पंक्तियां हटा दीं ...वैसे तो उसका आख़िरी पैराग्राफ अपने आप में उस लेख का निचोड़ है।’

शर्मा ने निर्णयात्मक आवाज़ में कहा, ‘तुम बारह पंक्तियों को दो पंक्तियों में देकर यह लेख वहीं समाप्त कर दो।’

भारद्वाज ने वे पन्ने वहाँ से उठाए। अब उसे हमें अभिवादन करने का समय मिला था, सो उसने और हमने मुस्कराकर वह रस्म निभाई। अब वह दरवाज़़े की ओर बढ़ा, उसने दरवाज़ा खोला तो उसमें से पहले डॉ. शुक्ला भीतर आए और फिर वह बाहर निकला।

डॉ. शुक्ला ने, शर्मा को उसकी चाबियों का गुच्छा सौंपते हुए कहा.‘अब यहाँ बैठने का वक़्त नहीं है, हमें चलना चाहिये।’

फिर प्रतिभा की ओर रुख करते हुए कहा.‘फिर, मिस प्रतिभा, चलें?’

प्रतिभा ने एक बार शर्मा की ओर देखा और उसके चेहरे पर हामी के भाव देखकर डॉ. शुक्ला से कहा.‘हाँ मैं तैयार हूँ, बेशक चलें।’

वह कुर्सी से उठकर उसके साथ चली गई।

पल भर के लिये कमरे में सन्नाटा रहा। मेरी निगाहों में कहीं कोई सवाल लटकता हुआ देखकर शर्मा ने मौन की दीवार तोड़ते हुए कहा, ‘राजेश, शुक्ला अपनी ऑफ़िस के काम से यहाँ आया है। ख़ास काम से...आज सुबह के एक हुजूम में उसके प्रांत के मुख्यमंत्री ने पीड़ा से सताए हुए किसानों को सरकारी मदद दी है। नया-नया मुख्यमंत्री है, चाहता है कि केन्द्रीय सरकार पर उसका असर अच्छा पड़े और आज रात को नैशनल हिक-अप पर समाचार बुलेटिन में उस भीड़ की तस्वीरों के साथ समाचार का प्रसारण भी होगा।’

मैंने गर्दन हिलाकर ‘हां’ कर दी; और क्षण भर में ही मेरे चेहरे पर वही बदरंग मुस्कराहट फैल गई।

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