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तुम्हारी ‘मां’ तुमसे बहुत प्यार करती है / डा. सूर्यकांत मिश्रा

द्वितीय रविवार मां दिवस पर विशेष...

तुम्हारी ‘मां’ तुमसे बहुत प्यार करती है

‘मां’ केवल एक अक्षर नहीं, बल्कि ईश्वर की एक ऐसी रचना है, जो गीता, बाईबिल, कुरान तथा गुरूग्रंथ में समायी हुई है। ‘मां’ भगवान की वह संरचना है जो केवल एक बार अपने बच्चे के रोने पर खिलखिलाती है, जब वह पहली बार ‘मां’ बनती है। इसके बाद वह जिंदगी भर अपने बच्चे के थोड़े से रोने पर भी विचलित हो उठती है। ‘मां’ से बड़ा मनोवैज्ञानिक आज तक इस दुनिया में पैदा नहीं हुआ। मां से बढक़र गुरू भी इस दुनिया में नहीं आ पाए। ‘मां’ के स्नेहिल आंचल से बड़ा आकाश भी नहीं। ‘मां’ का त्याग भी सभी त्यागों से बढक़र माना जाता है। ‘मां’ शब्द के अंदर पूरी कायनात भी छोटी दिखाई पड़ती है। ‘मां’ उस अहसास का नाम है, जो इस दुनिया में कदम रखते ही अपने सुरक्षित दामन में बच्चे को समा लेती है। यह एक ऐसा नाम है, जो प्रत्येक बच्चे की जुबान पर सबसे पहले आता है। ‘मां’ को समझने और जानने की हमारी हर कोशिश नाकाम ही होती है या यह भी कह सकते है कि उसे समझना आसान नहीं। पूरी दुनिया में ‘मां’ ही है जो हमें हर वक्त बच्चे की भांति दुलारती रहती है, फिर भले ही हम स्वयं माता-पिता क्यों न बन गए हो। कारण यह कि ‘मां’ की भावनाएं स्वयं उसकी नहीं बल्कि भगवान की प्रतिनिधि की तरह उसके साथ चलती रहती है।

 

हर मुसीबत का इलाज है ‘मां’ का साया

दुनिया में अलग अलग तरह के सैकड़ों रिश्ते हैं, किंतु ‘मां’ का रिश्ता उन सबसे अलग है। एक परिवार में रहने वाले चाचा-चाची, दादा-दादी, भाई-बहन सभी में आपसी भाईचारा हो सकता है, किंतु ‘मां’ से अपने बच्चों का रिश्ता इन सभी रिश्तों से अलग है। भावनाओं के बारीक तारों से बुना हुआ होता है। बच्चों की राहों में आने वाली मुसीबतों को सबसे पहले ‘मां’ का सामना करना पड़ता है। ‘मां’ के संघर्ष और बच्चों के प्रति त्याग की भावना ही वह ताकत है, कि मुसीबतों को अपना रास्ता बदलना ही पड़ता है। ‘मां’ का साया वह सुरक्षा कवच है, जिसके आगे कोई तकलीफ टिक नहीं सकती। अपने बच्चों की राह तकती ‘मां’ की आंखों से नींद ऐसे गायब हो जाती है, मानों वह सुबह की ताजगी का इंतजार कर रही हो। यदि आपको स्वर्ग का आनंद लेना हो तो पल भर के लिए ‘मां’ के अंचल तले अपना सिर छिपा ले, यह तय है कि भगवान भी इसे देख अपनी ‘मां’ की यादों में खो सकता है। इतने बड़े संसार में भगवान का भय प्रत्यक्ष रूप में मानने वाले कम ही है। लोगों को अपनी नजर में रखने का विचार विधाता के मन में आते ही उसने ‘मां’ नामक पात्र की रचना कर डाली। कहा जाता है कि इतनी बड़ी दुनिया में भगवान हर समय हर स्थान पर मौजूद नहीं रह सकता, इसलिए उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में ‘मां’ की रचना कर डाली। अपने बच्चों के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाली ‘मां’ स्वयं अपने कष्टों को नहीं देखती है। यही कारण है कि हर धर्म संस्कृति में ‘मां’ को पूज्यनीय माना गया है। मशहूर शायर मुन्नवर राणा कहते है कि-

चलती फिरती आंखों से अजां देखी है।

मैंने जन्नत तो नहीं देखी, पर मां देखी है।।

 

नि:स्वार्थ प्रेम की प्रतीक है ‘मां’

पारिवारिक सदस्यों में एक ‘मां’ ही वह शख्स है जो अपना प्रेम नि:स्वार्थ भाव से लुटाती रहती है। ममता, स्नेह और कर्तव्य की समर्पित मूर्ति ‘मां’ को कवियों, शायरों और साहित्यकारों ने अपने-अपने नजरिये से अपनी कलम में पिरोया है। किसी ने ‘मां’ को जीती जागती गजल माना है तो किसी ने उसकी उपमा ईश्वर से बढक़र की है। एक ‘मां’ ही वह पारिवारिक सदस्य है, जो अपने बच्चों का चेहरा पढक़र उसकी चिंता का पता लगा लेती है। बिना किसी लालच व स्वार्थ के वही अपने बच्चों के लिए हर वक्त उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करने तैयार रहती है। फिर वह पूस की कडक़ड़ाती ठंड की रात हो या जेठ की तपती दुपहरी वह अपने बच्चों के लिए हर कठिनाई पर विजय पाने चुनौतियों को अंगूठा दिखाती प्रतीत होती है। ‘मां’ से बड़ा दार्शनिक भी आज तक पैदा नहीं हुआ। अनेक बार ऐसे उदाहरण हमारे सामने आते है, जब एक ‘मां’ का दार्शनिक अंदाज सहसा ही हमें आकर्षित कर जाता है। परिवार में खाने की मेज हो या फिर फुरसत के पल में किसी प्रकार के हल्कें नाश्ते की बात हो, यदि चार लोग उपस्थित हो, और खाने की प्लेटें मात्र तीन, तब ‘मां’ का दर्शन शास्त्र बड़े ही निराले अंदाज में देखा जा सकता है। भले ही उसे लाख खाने की इच्छा हो, उसका यह कहना कि यह भी कोई खाने का वक्त है? कहीं न कहीं सभी को संतुष्ट करने के इरादे से कहा गया शब्द ही होता है। उसे तो इसी में आनंद आता है कि उसकी उपस्थिति में उसके बच्चे अपनी मनपसंद चीजें प्राप्त कर रहे है। यही है उसका नि:स्वार्थ प्रेम। मुन्नवर राणा जी लिखते है-

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है।

मां दुआ करती है, मेरे ख्वाब में आ जाती है।।

 

कर्तव्य की प्रतिमूर्ति है ‘मां’

एक ‘मां’ अपने कर्तव्य के प्रति कितनी सजग रहती है, इसे जानने के लिए मैं यहां एक ऐसी घटना का जिक्र करने जा रहा हूं, जो ‘मां’ के प्रति सम्मान और आदर के भाव को स्वत: ही जगा देती है। एक परिवार में अपने पति और दो बच्चों के साथ रहने वाली ‘मां’ अपने पति के कार्यालय जाने के बाद और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद घर पर एकदम खाली हो जाया करती थी। इस खाली समय को वह अपना घर व्यवस्थित करने में लगाया करती थी। ऐसे ही एक बार वह घर पर अकेली थी और साफ सफाई कर रही थी। इसी बीच उसे एक विषैले सर्प ने डस लिया। घर पर कोई और न होने से उसने सोचा कि अपने पति एवं बच्चों के लिए शाम का नाश्ता तैयार कर लेती हूं और वह उनकी आवभगत की तैयारी में जुट गई। अपने कर्तव्य पूर्ति को अपना सब कुछ मानने वाली उक्त मां यह भी भुल गई कि उसे सर्प पे डसा हुआ है। काम में व्यस्त रहने से उस ‘मां’ का खून का दौरा बराबर चलता रहा और उसे सर्प दंश का असर नहीं हुआ या हम यह भी कह सकते है कि कर्तव्य परायण ‘मां’ के आगे मौत ने भी घुटने टेक दिये।

 

मानवीय गरिमा भी प्रदान करती है ‘मां’

यह बताने की जरूरत शायद नहीं है कि एक ‘मां’ ही अपने बच्चों की मार्गदर्शक होती है। वह कांटों पर सो कर अपने बच्चों को फूलों की सेज प्रदान करती है। स्वयं गीले बिस्तर में रात गुजारकर अपने बच्चे को नर्स और शीतल छाया प्रदान करती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जितने भी महापुरूष पैदा हुए है, उनके ऐतिहासिक स्थान बनाने में उनकी मां की भूमिका भी प्रमुख रही है। ‘मां’ के अलावा अन्य पारिवारिक सदस्य आपसे अपेक्षा कर सकते है कि भविष्य में आप उनके काम आ सकते है, किंतु एक ‘मां’ ही है जिसे इस प्रकार की अनुभूति नहीं होती। ‘मां’ की करूणा, स्नेह, प्रेम और ममता का वात्सल्य रूपी रस पीकर ही एक बालक मनुष्यता के ढाचे में ढल पाता है। एक बालक से मनुष्य बने व्यक्ति को मानवीय गरिमा भी उसकी ‘मां’ ही प्रदान करती है। इस ब्रम्हांड में यदि किसी ने भावनाओं की कद्र की है तो वह केवल मां ही है। एक मां ही है जो अपने बच्चे को हर स्थिति में बेहतर समझ पाती है। अपनी ‘मां’ के आंचल में छिपकर स्तनपान करने वाल बालक अनेक बार ‘मां’ के स्तनों को काट लेते है, किंतु वाह री ‘मां’! तनिक भी विचलित हुए बिना इस पर भी सुख का ही अनुभव करती है और अपने बच्चे की हंसते हुए बलैय्या ले लेती है। इतना त्याग ईश्वरीय सत्ता के अलावा शायद और कहीं नहीं हो सकता। ‘मां’ की इसी भावना से प्रेरित होकर किसी कवि ने कहा है-

मां से अधिक न प्रेरक होते, नये-नये प्रतिमान वीर।

मूल्यहीन है उसके सम्मुख, बड़े बड़े अनुदान भी।

मां के निकट पहुंचकर देखो, जब भी मन असहाय हो।

उस आंचल में थम जाऐंगे, भीषणमत तूफान भी।।

 

तूफान भी सिहर गया ‘मां’ के आगे

जापान में आए सुनामी को अभी बहुत समय नहीं बिता है। हम सभी जानते है कि उस सुनामी का आंधी में जापान पूरी तरह हिल गया था। उसी जानलेवा तूफान में एक ‘मां’ का संघर्ष यह सिद्ध कर गया कि ‘मां’ स्वयं के लिए नहीं जीती, बल्कि अपने बच्चों पर जान लुटाने उद्धत रहती है। जापान में घटित उक्त घटना दिल को छू लेने वाली कहानी कहती है। सुनामी के बाद बचाव कार्य का एक दल एक ध्वस्त घर की जांच करने पहुंचता है। उन्हें बारीक दरारों में से महिला का एक मृत शरीर दिखाई पड़ता है। महिला अजीबो-गरीब स्थिति में अपने घुटनों के बल बैठी होती है, ठीक उसी तरह हम मंदिर में भगवान के समक्ष नमन करते है। उसके दोनों हाथ किसी चीजे को पकड़े हुए थे और पीठ तथा सिर पर घाव के काफी निशान थे। बचाव दल ने जब उस महिला को निकला तो यह देखकर दंग रह गए कि उसके घुटनों और शरीर के नीचे टोकरी में कंबल पर लिपटा एक तीन माह का बच्चा सांसें ले रहा है। जब दल ने उस बच्चे को बाहर निकाला, तब बच्चा बेहोश था। यह बात सिद्ध हो चुकी थी कि तूफान से गिरे मकान के मलबे को महिला ने अपने शरीर पर झेल लिया था और बच्चे पर आंच तक न आने दी। बचाव दल ने बच्चे का कंबल हटाया तो उन्हें एक मोबाईल मिला, जिसके मैसेज बाक्स में संदेश लिखा था ‘मेरे बच्चे अगर तुम बचे गए तो बस इतना याद रखना कि तुम्हारी मां तुमसे बहुत प्यार करती थी।’ उक्त संदेश को पढक़र सभी दल सदस्यों की आंखें नम हो गई।

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(डा. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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