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कहानी संग्रह - अपने ही घर में / थकी हुई मुस्कान : हरिकांत जेठवाणी

कहानी संग्रह - अपने ही घर में /

थकी हुई मुस्कान

हरिकांत जेठवाणी

टेलीग्राम का नीला कागज़ देखकर मन में चाहत के खिलाफ़ संजोई उम्मीदें पुर्ज़ा पुर्ज़ा हो गईं। लगा शायद....

अनुमान सही निकला।

छाया अब नहीं रही। तार में यही सन्देश था.एक बड़ी घटना की अल्प सूचना।

अनहोनी नहीं घटी थी। जो हुआ था उसकी कल्पना मैंने तब ही की थी जब उसके साथ आख़िरी बार मिलने के लिये मुम्बई पहुंच गया था।

वह शायद जून का पहला हफ़्ता रहा होगा। चार माही बरसात शुरू होने लगी थी। ट्रेन में रात भर जागते, अलिखित, अस्पष्ट अपराध भाव के तहत खिड़की से पेड़ों की नाचती परछाइयों को ताकते, कैसे पांच सौ किलोमीटर यात्रा तय की थी। फिर जल्दी-जल्दी टैक्सी में बैठकर बान्द्रा स्टेशन से कार्टर रोड पहुंचा था। आठ मंज़िली इमारत के आखिरी फ्लोर पर उसके फ्लैट के सामने जाकर खड़े होने के बाद भी विश्वास ही नहीं होता था कि छाया के साथ साक्षात्कार हो पायेगा और उसे उसी रूप में देख सकूंगा, जिसमें शायद पांच साल पहले दिल्ली छोड़ते वक़्त देखा था।

बादामी रंग के दरवाज़़े पर पीतल की नेम-प्लेट चमक रही थी.उसके पिता के नाम की, आँखें नेम-प्लेट के आख़िरी अक्षरों पर अटक गईं...डी. एस. पी. (रिटायर्ड)...मन में एक तस्वीर उभर आई, शेर की आँखों वाले एक जानदार शख़्स की। मैंने दूसरी बार बज़र दबाया।

बिल्डिंग का चौकीदार जो मेरी छोटी सूटकेस लेकर लिफ़्ट चलाकर मेरे साथ ऊपर आया था, उसने शायद मेरी परेशानी जान ली। झिझकते हुए बताया कि कल ‘दीदी’ की तबीयत बहुत ख़राब हो गई थी। दो बार डॉक्टर को बुलवाया गया था। कैन्सर का कोई इलाज नहीं निकला है साहब? कमाल है....!

लगा चौकीदार ने मुझे घूंसा मारा हो। मैं उस आकस्मिक आक्रमण के लिये तैयार न था। उस चोट ने मेरे अपराध भाव को और बोझिल बना दिया। छाया को कैन्सर है! उसके बिल्डिंग के चौकीदार को पता है और मुझे...! दोष मेरा ही था। अपनी धुन में रहते पिछले पांच सालों से मैं उससे संपर्क ही कितना रख पाया था।

दरवाज़़े के पीछे भारी आहट। कोई धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रहा था। ताले में चाबी घूमने की आवाज़ दरवाज़़े के गीले लकड़े का अनचाहा चीत्कार और फिर उसके बाप से मुलाक़ात। सफ़ेद घनी भौं से लगभग ढकी दो आँखें, जिन्हें ऊपर उठाए बिना ही थकी आवाज़ में पूछा.‘कौन?’

मैंने आगे बढ़कर उनके पैर छुए ‘मैंने पहचाना नहीं...’ उन्होंने मजबूरी में कहा। लगा उनकी नज़र काफ़ी कमज़ोर हो गई थी।

‘मैं हूँ डैडी...मैं...’ छाया के साथ अपनापन क़ायम होने के बाद मैं भी उन्हें डैडी ही बुलाया करता।

‘अच्छा...तुम हो...अन्दर आओ न...’

उस घर में मेरी आवाज़ की पहचान क़ायम है, सोचकर खुशी हुई। लेकिन उनके छोटे से वाक्यांश का पहला हिस्सा दूसरे हिस्से के कितना क़रीब था। मैंने समझने का प्रयास किया पर उसके मुड़कर चलने पर मैं भी उनके पीछे चल पड़ा।

गुफ़ा जैसी सीमित अंधेरी कारीडोर से गुज़रकर वो बायीं ओर मुड़ा जहां निमित्त तबक़े की बैठक थी...खिड़कियों पर पर्दे लगे हुए थे, इसीलिये काफ़ी अंधेरा थाए सामने दीवान के साथ लैंप स्टैंड के पास कुछ रोशनी थी.एक कमरे में महदूद साईड टेबिल पर रखी ऐश ट्रे में आधा जला सिगार पड़ा था जिसमें से अभी भी हल्का-हल्का धुआं निकल रहा था। लगा वह काफ़ी वक़्त से जागा हुआ था या शायद रात भर सोया ही न था। कमरे में एक रहस्यमय गन्ध थी जो बारिश के दिनों में बंद खिड़कियों वाले मकानों में अक्सर पाई जाती है।

अजीब विनम्रता के साथ उसने मुझे सोफ़ा पर बैठने के लिये कहा और ख़ुद दीवान पर बैठकर, सिगार लेकर उसे फिर से सुलगाने की कोशिश करने लगे। पल भर के लिये उनके चेहरे पर पड़ी लाईटर की रोशनी में मैंने देखा, उसकी रौशन आँखें जो हर वक़्त हर दिशा में उत्साह से देखती रहीं थीं, बुझी हुई और सहमी हुई थीं, शायद उसने भांप लिया कि मैं लगातार उनकी ओर देख रहा था।

‘अच्छा किया जो आए...नहीं तो...’ कहकर वह चुप हो गया। वैसे भी वह मुंह से कम, आँखों से ज़्यादा बतियाते थे। हम उसकी आँखों की भाषा समझ लेते थे। हम यानि छाया और मैं। शुरू से ही।

‘छाया कैसी है?’ मैंने पूछा।

‘छव भ्वचम’ काफ़ी देर के बाद उसने जवाब दिया, जैसे अपने आपसे बात करते हुए धीमे से कहा.‘मैं सोचता हूँ...’

‘क्या सोच रहे हैं...’

सिगार का धुआं शायद उनके फेफड़ों में चला गया। वे बुरी तरह खांसने लगे। काफ़ी देरी के बाद सांस संभालते हुए उन्होंने उसी अंदाज़ में कहा : ‘अभी कुछ कह नहीं...प्ज पे जवव संजम चमतींचे’

‘कहाँ है?’

‘उस कमरे में...।’ उन्होंने एक अधखुले दरवाज़े की ओर इशारा किया। ‘तुम उससे मिल सकते हो। अगर नींद हो तो जगाना मत। कल दिन तमाम भोगा है...’

‘डॉक्टर...’

‘दो बार आया था। दर्द उभरता है तो जैसे सौ-सौ बिच्छू एक ही वक़्त डंक मारने लगते हैं। उसकी छटपटाहट...’ वे फिर चुप हो गए।

कुछ देर बाद खुद को संभालते हुए बताया : ‘डॉक्टर इन्जेक्शन लगाकर जाता है तो कुछ आराम मिलता है, पर थोड़ी देर के लिये।’

‘क्या सच में...?’

‘हां...कैन्सर...’

‘कहाँ?’

‘अंतड़ी में’

‘उसे पता है?’

‘हमने बताया नहीं है, लेकिन हर हफ़्ते टाटा इन्सटीट्यूट में जाने का मतलब वह नहीं समझती होगी ऐसा नहीं समझना चाहिये।’

‘कॉलेज?’

‘अप्रैल तक पढ़ाती रही। छुट्टियों में ही पता चला। फिलहाल छुट्टी पर है। पर जाने के लिये बहुत ज़िद करती है...’

‘मनोस्थिति कैसी है?’

उनकी आँखों में अचानक चमक आ गई। गला साफ़ करते हुए विश्वास भरे अन्दाज़ में कहा, ‘पुलिस आफिसर की बेटी है। रिलीफ़ मिलते ही मुझे दिलासा देने बैठ जाती है।’

उनका सिगार शायद बुझ गया था। उसे ऐशट्रे में झटक कर फिर से लाइटर जलाया।

‘देखता हूँ, शायद जागी हो।’

उन्होंने इजाज़ती अंदाज़ में गर्दन दरवाज़़े की ओर मोड़ ली।

मैं उठ खड़ा हुआ और दबे क़दमों से कमरे में चला गया। छाया के कमरे में बैठक से भी अधिक अंधेरा था। शुरू शुरू में कुछ भी नज़र नहीं आया। मैं खड़ा रहा। धीरे-धीरे कमरे की हर एक चीज़ मेरी आँखों में आकार पाने लगी। सबसे पहले एक चौड़ा पलंग और उसपर सफ़ेद चादर ओढ़े एक आकृति बेहद छोटी लग रही थी। गोया दस-बारह साल का बच्चा हो। विश्वास ही नहीं आ रहा था कि वह छाया हो सकती है। पलंग के पास एक छोटी अलमारी जिसपर कुछ आधी भरी, आधी ख़ाली शीशियां, पानी का जग। बाईं तरफ़ एक शोकेस, स्टीरियो-कैसेट-डेक। उसके आस-पास बिखरे हुए कुछ कैसेट्स। पलंग के सामने दीवार से लगे दो सोफ़ा नुमा कुर्सियां। धीरे-धीरे सब साफ़ स्पष्ट होने लगा। मैं चुपचाप उसके सामने बैठ गया। वह आराम से सोई रही। बीमारी ने उसका चेहरा विकृत नहीं किया था। गहरे अंधेरे में भी वह पहचान से दूर नही लगी। कम से कम उसके चेहरे पर बीमारी का ख़ास असर नहीं आया। उसे देखकर लगा, वह बेकार ही डर गए हैं। असल में आदमी की बीमारी से ज़्यादा बीमारी की चेतना पछाड़ देती है। मानसिक सतह पर हार क़बूल करने के बाद वह टूटने लगता है। छाया के चेहरे पर ऐसा कोई भी निशान न था। कुछ थकावट ज़रूर रही जो आत्मसंघर्ष का स्वभाविक परिणाम लगी। उसने हार नहीं मानी थी। ऐसा मुझे विश्वास हुआ। मन ही मन में कह बैठा.‘My brave girl*

‘अरे...तुम...’

बिल्कुल वही आवाज़ और वही अंदाज़। अर्से बाद मिलने के बाद भी उसकी अपनाइयत गुम नहीं हुई थी। आँखें खोलते ही कहा, ‘मैं सपना तो नहीं देख रही...’

‘छूकर देखो...’

मैं उठकर उसके पास पहुंच गया और अपना हाथ बढ़ाकर तकिये पर रखा। उसने धीरे-धीरे करवट लेते हुए अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और आँखें मूंद लीं।

‘तुम्हारा हाथ इतना ठंडा क्यों है?’ आँखें बंद होते हुए उसने पूछा।

‘मेरा हाथ ठंडा नहीं है, तुम्हारा हाथ गरम है।’ मैंने उत्तर दिया।

‘कहीं कोई असमानता ज़रूर है...है न?’

‘शायद...’

‘तुम बेठते क्यों नहीं?’

मैं उसके पलंग के किनारे पर बैठ गया। उसके बिस्तर में से दवाओं की बू आ रही थी.हल्की।

‘क्या सोच रहे हो?’

‘कुछ नहीं...’

‘तुम्हें यहाँ की बू अच्छी नहीं लग रही है न? सच-सच बतलाना।’

कमाल है! वह अब भी मेरे विचारों की आहट तक पहचान लेती है। मैंने सोचा।

‘हाल ही में मुझे इतनी इन्जेक्शन लगीं हैं, इतनी तो स्पिरिट लगाई गई है कि मैं खुद स्पिरिट बनती जा रही हूँ।’

मैंने उसकी आँखों में देखा जहां मुझे शरारत नज़र आई।

‘घबराओ मत...स्पिरिट बनकर तुम्हारा पीछा नहीं करूंगी-बनूंगी भी तो पेड़ बनूंगी दूसरे जन्म में...’

‘क्या कह रही हो...?’

‘तुम्हें पहाड़ अच्छे लगते हैं न? मैं दो-तीन जन्म लेकर किसी हिल स्टेशन पर पेड़ बन जाऊंगी। वहाँ तो आओगे न?’

‘छाया...’ उसके बाल सहलाते मैं इतना ही कह पाया।

‘कब आए, तुमसे यह पूछना तो भूल गई।’

‘थोड़ी देर पहले।’

‘कहाँ से?’

‘......’

‘अब वहाँ हो क्या?’

‘नहीं, माऊंट आबू से लौटते गया था। एक कारखाने में तुम्हारा भाई मिल गया.जो ‘लेबर’ आफ़िसर है। उसी ने ही तुम्हारे बारे में बताया। फौरन चला आया।’

‘थैंक यू कहूं क्या?’ उसके होंठों पर शरारत भरी मुस्कान थी। एक थकित मुस्कान।

छाया को इस तरह हंसता-बतियाता देखकर लगा कि मुझे जो उसके बारे में बताया गया है वह झूठ है, ग़लत है। सच और सही है तो सिर्फ़ उसकी मुस्कराहट है जो अब भी है और क़रीब-क़रीब ऐसी ही है जैसी बरसों पहले क्लास में लेक्चर देते, कॉमन रूम में अलग-अलग विषयों पर बहस करते या कॉफ़ी हाउस में साहित्य पर चर्चा करते वह बिखेरती रहती थी।

‘दिल्ली में ही हो?’

‘दिल्ली तो तुम्हारे वहाँ रहते हुए ही छोड़कर गया था।’

‘अरे...हां...कॉलेज से इस्तीफ़ा देकर तुम कलकत्ता चले गये थे...’

‘उसके बाद काफ़ी यात्राएं की हैं।’

‘कहाँ पहुंचे हो?’

‘कहीं भी नहीं!’

‘मतलब?’

‘पिछले महीने सातवीं नौकरी छोड़ दी।’

‘कहाँ?’

‘दार्जिलिंग के पास.चाय के खेत में...’

‘राजनीति के लेक्चरर का चाय के खेत से क्या वास्ता?’

‘पार्टी का हुकुम था। अपना पार्ट पूरा करके चला आया।’

‘मतलब तुम्हारी वही हरकतें अभी तक जारी हैं...’

‘तुम डैडी की भाषा कब से बोलने लगी हो?’

‘ओ...सॉरी...’ वह अचानक चुप हो गई और कहीं खो सी गई। काफ़ी देर के बाद दूर से अपनी आवाज़ में कहा, ‘‘डैडी के असर को नकार तो नहीं सकती। ख़ास करके जब से मम्मी नहीं रही है। दोनों भाई आते हैं कभी-कभी। दस्तूर निभाने। डैडी ही ख़याल रखते हैं मेरा। बहुत चिन्तित रहते हैं। घंटों बैठ रहे हैं। यूं ही गुमसुम-अकेले। छिप-छिप कर रोते हैं। और ख़ुद ही अपने आँसू पोंछते हैं...’

मुझे लगा, उनकी इन हालातों में मेरा भी योगदान था शायद। फिर वही अपराध भाव।

‘मम्मी को क्या हुआ था?’

‘वही पुरानी दमा (प्राणों की बीमारी) मुम्बई की नम आबोहवा में और बढ़ गया। दिल्ली को बहुत याद करती थी और तुम्हें...’

‘........’

‘तुमने चाय पी है?’

‘अभी कहाँ...’

उसने अपना दायां हाथ सर की ओर दीवार पर फेरते हुए पास में लगे बटन को दबाया।

शाम होने लगी थी। हम बालकनी में चले गये। छाया मेरे साथ ही खड़ी थी। दोनों हाथ रेलिंग पर रखकर दूर समुद्र की ओर देखते हुए।

उसकी बिल्डिंग समुद्र किनारे सड़क के ऐसे अर्धगोल मोड़ पर है जो बालकनी में आने पर तीनों ओर का समुद्र नज़र आता है। हवा का रुख़ एक दिशा में चल रही लहरों को देखते हलचल का अनुभव दे रहा था। लगा कि हम किसी समुद्री जहाज़ भी डेक पर खड़े हैं और जहाज़ धीरे-धीरे चल रहा है.अनजान यात्रा पर।

‘अभी भी लम्बी-लम्बी यात्राएं करते हो?’

‘मैं तो इस वक़्त भी खुद को यात्रा में समझ रहा हूँ। यहाँ खड़े तुम्हें ऐसा नहीं लगता?’

‘ऐसी यात्राएं ख़ुद को ठगने के समान हैं। लगता है चल रहे हैं, पर होते हैं वहीं के वहीं। चलो चलकर बैठे। मैं थकने लगी हूँ।’

मैं उसका हाथ थामे बेड के पास कुर्सियों की ओर बढ़ा। एक-दो क़दम साथ चलकर वह रुक गई।

‘मुझे सहारे की ज़रूरत नहीं है।’ उसने शरारत भरे अंदाज़ में कहा.‘लेकिन तुम्हारे साथ ऐसे साथ-साथ चलने में आज भी अच्छा लग रहा है।’

हम आमने-सामने होकर बैठे...खामोश! सिर्फ़ लहरें बात करती रहीं।

‘लहरों की भी अपनी भाषा होती है...तुम्हें पता है?’

छाया ने गुमसुम अन्दाज़ में कहा और मेरे जवाब का इन्तज़ार किये बिना कहती रही : ‘मैं उनकी भाषा, उनकी वेदना समझने लगी हूँ। आधी रात को जब नींद नहीं आती है तो यहाँ आकर खड़ी हो जाती हूँ और बातें सुनती हूँ। उनका हंसना, उनका रोना साफ़-साफ़ सुनाई देता है। तुम चले तो नहीं जाओगे?’

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

‘रहोगे न; बताओ?’

‘कल जाना पड़ेगा।’

‘बस?’

‘....’

‘यहाँ से कहाँ जाओगे?’

‘वापस अहमदाबाद, वहाँ का काम अभी अधूरा है।’

‘....’

‘जल्दी ही फिर आऊंगा। तुम ठीक हो जाओ तो तुम्हें शिमला ले चलूंगा; स्नो फॉल दिखाने। सच...’

‘सच? फिर तो मौत को निराश करना पड़ेगा!’

‘मज़ाक मत करो।’

‘सच को तुम मज़ाक़ समझते हो?’

‘नहीं, मज़ाक को सच मान बैठता हूँ कभी-कभी।’

मैं वह प्रसंग आगे बढ़ाना नहीं चाहता था, क्योंकि मुझे सच का पता था।

छाया शायद मेरी मजबूरी समझ गई और ख़ुद ही उसने विषय बदल दिया। ‘दूर क्षितिज के पास वह जहाज़ देख रहे हो?’ समुद्र की ओर उंगली से इशारा करते उसने पूछा.

‘थोड़ा ऊपरी हिस्सा नज़र आ रहा है।’

‘बता सकते हो, वह आ रहा है या जा रहा है।’

‘शायद आ रहा है।’ मैंने ध्यान से देखते हुए कहा।

‘नहीं, वह जा रहा है।’ उसने विश्वास के साथ कहा।

‘तुम्हें क्या पता?’

‘उस तरफ़ से कभी किसी जहाज़ को आते नहीं देखा है। सिर्फ़ जाते देखा है।’

‘यहाँ बैठकर यही देखती रहती हो?’

जवाब में उसने लम्बी सांस ली और मेरा हाथ पकड़ लिया.ज़ोर से।

मुम्बई में मेरी वह आख़िरी शाम थी।

तार का नीला कागज़ अब भी मेरे हाथ में है। तब भी विश्वास नहीं होता कि छाया अब नहीं रही है।

मन फिर भी तुरंत मुम्बई चला जाता है और कार्टर रोड पर आख़िरी मंज़िल वाले उस फ्लैट का बज़र दबाकर उस सीमित अंधेरी कारीडोर से गुज़रते हुए ड्राइंग रूम से होता हुआ स्पिरिट की बू वाले कमरे में स्टीरियो डेक पर बिखरे कैसेट्स में कैद उदास आवाज़ को सुनता बालकनी में बैठ जाता है; जहां लहरों की आवाज़ सुनाई देती है, लेकिन उनकी भाषा समझने वाली छाया अब वहाँ नहीं है।

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