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मौत का आह्वान फिर-फिर - डॉ. दीपक आचार्य

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हम सारे के सारे लोग चाहते तो यह हैं कि अमर बने रहें, मौत कभी आए ही नहीं। और कुछ नहीं तो कम से कम शतायु तो हो ही जाएं। और हमारी आयु ही न बढ़ें बल्कि काले-घने और लम्बे बाल भी हों, हीरो-हीराईनों और अप्सराओं सा सौंदर्य भी बना रहे, स्लिम भी बने रहें, कानों से सुनते भी रहें, आँखों से देखते भी रहें, चलते-फिरते और भ्रमण करते रहें, खाने-पीने और जमा करते रहने का सामथ्र्य भी दिनों दिन बढ़ता रहे, दिमाग भी चलता रहे और शरीर की तमाम ज्ञानेन्दि्रयां-कर्मेन्दि्रयां भी अपना काम करती रहकर भरपूर आनंद देती रहें।

इस सवार्ंंग सेहत को हमेशा बनाए रखने के लिए कुछ लोग वाकई मेहनत करते हैं, संयमित जीवन जीते हैं, नियमित योगाभ्यास भी करते हैं और अपने जीवन को सात्विक, पवित्र और आनंददायी बनाए रखने के परंपरागत नुस्खों और पुरखों की दी हुई सीख पर अमल करते हैं।

बहुत से लोग अपने आपको सेहतमंद और हर प्रकार से दुरस्त रखने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन इन लोगों का अपनी कर्मेन्दि्रयों पर कोई नियंत्रण नहीं है। सारी कर्मेन्दि्रयां स्वच्छन्द और उन्मुक्त भोग के लिए  हमेशा उतावली रहती हैं और इस चक्कर में सेहत गंवा बैठते हैं।

अधिकांश लोगों का खान-पान और दिनचर्या सब कुछ गड़बड़ा गया है। शहरों में अस्सी फीसदी और गांवों-देहातों में आधे से ऊपर लोग अब परंपरागत सेहतमंद दिनचर्या भुला बैठे हैं। अमरत्व और सेहत-सौंदर्य आदि सब की भरपूर और अपरिहार्य चाहत के बावजूद हम सभी लोग जो कुछ कर रहे हैं उससे तो साफ-साफ लगता है कि हम सब बड़ी ही प्रसन्नता और हर्ष के साथ मौत को अपनी ओर आकर्षित करते हुए काल का आह्वान करने में दिन-रात जुटे हुए हैं।

और देख भी रहे हैं कि काल किस तरह से हमारे बीच से उन लोगों तक को उठा ले जा रहा है जिनकी मौत की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। प्राकृतिक और दैवीय आपदाओं से होने वाली जन-धन हानि को छोड़ दिया जाए तब भी इंसान के व्यक्तिगत जीवन से लेकर परिवेश तक की सभी प्रकार की आपदाओं के मूल में इंसान ही है जिसने प्रकृति से भी नाता तोड़ लिया है और अपनी श्रेष्ठतम परंपराओं से भी, जिनके सहारे हमारे पूर्वज शतायु हुआ करते थे और मरते समय तक प्रसन्न, स्वस्थ और मस्त रहा करते थे।

अकाल मृत्यु जैसी बातें बहुत कम सुनी जाती थीं और आयु पूर्णता पर स्वाभाविक मृत्यु ही देखी जाती थी। अब सब कुछ उल्टा हो गया है। आयु पूर्णता पर स्वाभाविक मृत्यु की घटनाएं बहुत कम देखी जाती हैं, जबकि  अल्पायु में मौत का माहौल हमेशा बना ही रहने लगा है। 

बहुत छोटी-छोटी उम्र वे लोग हमारे बीच से जा रहे हैं जिन्हें अभी बहुत अधिक जीना था। आजकल किसी का कोई भरोसा नहीं रहा, कोई कब हमारे बीच से उठ जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इस अनचाहे बदलाव के लिए कोई और नहीं बल्कि हम ही जिम्मेदार हैं।

सोच तो रहे हैं हम लम्बी पारी की, और काम ऎसे कर रहे हैं कि विकेट जितना जल्दी हो उखड़ जाए। और लोग देखते ही रह जाएं।  बीज से लेकर फसलें तक रसायनों से तरबतर हैं, जात-जात के केमिकल्स आ गए हैं जो कि फसलों की उत्पादकता को कई गुना बढ़ा रहे हैं मुनाफे से मालामाल भी कर रहे हैं मगर गुणवत्ता का सत्यानाश करने के साथ ही घातक अवस्था तक जहरीले हो गए हैं।

पानी और मिट्टी सब कुछ बिगड़ गया, हवाओं का भी नहीं रहा भरोसा अब। खान-पान से लेकर सब कुछ बासी खा-पी रहे हैं, कितना पुराना कोई माल है, कितना सड़ा हुआ बासी है, इसका किसी को कोई पता नहीं है। सब कुछ पैकिंग माल पर ही जिन्दा हैं।

सेवा, समाज, देश और परोपकार के सारे के सारे भाव समाप्त हो गए हैं और इनका स्थान ले लिया है धंधे ने।  इस धंधे में कोई मरे, कोई बीमार हो जाए, इससे किसी को कोई सरोकार नहीं है।  माल बनाने वाले भी धंधेबाज हैं और बेचने वाले भी।

हम सभी ने जैसे ठान ही रखा कि मरकर ही मानेंगे और इसके लिए हर दिन मौत का सामान उपयोग में लाते हैं, वह हर हरकत करते हैं जिससे मौत हमारे निकट जल्दी आए। जो लोग रात को देर तक जगते हैं और सवेरे देर तक सोये रहते हैं, दिन में सोते रहते हैं, न नहाने का समय है, न खाने का।

ऎसे लोगों का त्रिदोष से ग्रसित हो जाते हैं वात, पित्त और कफ असंतुलित हो जाता है और इस वजह से  ये लोग बीमार हो जाते हैं, असाध्य बीमारियां घेर लेती हैं, और अन्ततः ऎसे लोगों और इनके परिवार वालों का पैसा इन्हीं पर खर्च होता रहता है लेकिन सब कुछ करने के बावजूद कोई इन्हें बचा नहीं पाता।

कुछ दैवीय, ज्योतिषीय और पूर्वजन्मार्जित दोषों व पापों या वास्तविक शारीरिक और मानसिक समस्याओं को छोड़ दिया जाए तो शेष सारी की सारी बीमारियों और विपदाओं के लिए हम ही दोषी हैं, इसे विनम्रतापूर्वक स्वीकारने में हमें पीछे नहीं रहना चाहिए।

जब तक हमारी दिनचर्या हमारी संस्कृति, शास्त्रों और परंपराओं के अनुकूल नहीं होगी तब तक हमें दीर्घायु, यशस्वी और लोक प्रतिष्ठ होने की कल्पना को छोड़ देना चाहिए।  आज हम सब कुछ होते हुए भी न मनचाहा खा- पी सकते हैं, न बिना दवाइयों, चश्मों और मशीनों से रह सकते हैं।

ये हमारे लिए वेन्टीलेटर ही हैं, जो हमसे दूर हो जाएं तो हम कहीं के नहीं रहें, सीधे ऊपर पहुंच जाएं या निःशक्तों की तरह बैठे रहें। भारतीय संस्कृति का अनुगमन ही हमें इन हालातों से बचा सकता है। इस बात को स्वीकार कर अपने आप में बदलाव लाएं या तैयार रहें कभी भी ऊपर जाने के लिए। ईश्वर हमारी रक्षा करे।

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