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जरूरत नहीं घण्टों की भक्ति - डॉ. दीपक आचार्य

- डॉ. दीपक आचार्य

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भगवान या सिद्धि पाने के लिए तरह-तरह के भ्रम हमेशा हर इंसान के सामने उपस्थित रहते हैं। कोई मानते हैं कि सत्, त्रेता और द्वापर की तरह अब न भक्ति हो पाती है न संभव है क्योंकि इंसान की आयु अल्प है और इस छोटी सी आयु में वह कुछ भी हासिल नहीं कर पाता।

शेष अधिकांश मानते हैं कि घोर कलियुग है और इसलिए इसमें भगवान को प्रसन्न करने अथवा किसी भी प्रकार की सिद्धि पाने के लिए खूब कठोर तप एवं रोजाना घण्टों की साधना जरूरी होती है। बावजूद इसके इस बात की कोई गारंटी नहीं कि हम अपने उद्देश्यों में सफल हो ही जाएं।

शास्त्रों में भी किसी भी अनुष्ठान, मंत्र जाप या सिद्धि पाने के साधनों के साथ कहा गया है कि कलियुग में चार गुना होना चाहिए तभी इसका फल प्राप्त होता है।  सभी प्रकार के विद्वानों और धर्माधिकारियों के इस बारे में विभिन्न मत हैं और इसी के अनुरूप उनके अनुयायियों, अनुचरों, अंधानुचरों और शुभचिन्तकों, फाईनेंसरों, प्रचारकों और प्रशंसकों की भीड़ भी चलती रहती है।

बहुत सारे लोग भ्रमों में जीते हुए स्वर्ग सिधार जाते हैं, खूब सारे जिन्दगी भर भेड़ों की मानिन्द चलते रहते हैं और जब-जब निराशा हाथ लगती है तब-तब पाला बदल-बदल कर गुरुओं को बदलते रहते हैं या विभिन्न रूपाकारों वाले अपनी श्रद्धा के पाषाणों को  परिवर्तित करते रहते हैं, फिर भी वहीं रहते हैं जहां बरसों पहले से अड़े हुए हैं।

दुनिया में जितने लोग उल्लू बनाने वाले हैं, गुमराह करने वाले हैं उनसे हजार गुना वे हैं जो गुमराह होकर भी अंध श्रद्धा के प्रकटीकरण को भगवान का प्रसाद मानकर चलते रहते हैं। बहुत से हैं जो भूत-प्रेतों, जिन्दा आदमियों और पितरों के पीछे पड़े रहकर अपने आपको भी भूत-पलीत की तरह बना लेते हैं और मरने के बाद भूत-प्रेतों की संख्या में बढ़ोतरी करते हुए उनकी महफिल में शामिल हो जाते हैं।

किसी को कोई निश्चित ठौर नहीं मिल पा रहा है। मिले भी कैसे, अब वो घाट रहे ही कहाँ जो गंगा-यमुना की सैर कराते हुए दिव्य दर्शनों और धाराओं से नहलाकर पावन किया करते थे। ज्ञान की गंगा बहाते हुए धर्म-दर्शन और जीवन के सभी पक्षों का सटीक और सही-सही ज्ञान देकर जीवन और आत्मा के धर्म को समझाते थे। अब न उनका कोई संबंध रहा है, न हमारी रुचि।

इन सभी तर्क-वितर्कों और समाज में व्याप्त कुतर्कों-भ्रमों और भटकाव के हालातों के बावजूद इस भ्रम को सदा-सदा के लिए बाहर निकाल फेंकने की जरूरत है कि कलियुग में सिद्धि या भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। सच तो यह है कि कलियुग में भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं, मंत्र सिद्धि त्वरित होती है और अपने कामों या इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्यादा मेहनत की आवश्यकता नहीं पड़ती।

इसे हम साधारण सी गणित के माध्यम से समझ सकते हैं। मांग और आपूर्ति के सिद्धान्त का मामला है। सतयुग, त्रेता युग और द्वापर युग में सात्विकता का बोलबाला था और भक्ति का प्रभाव अधिक था इसलिए भगवान से कुछ न कुछ चाहने वालों की संख्या अपार थी। इस कारण से प्रतिस्पर्धा अधिक थी और ऎसे में भगवान को पाने या भगवान से कुछ पाने के लिए हजारों वर्ष तक कठोर तक करने की जरूरत थी।

कलियुग में भगवान को पाने की कामना रखने वाले नगण्य हो गए हैं। अधिकांश लोग भगवान को अपनी कामनाओं की पूर्ति करने वाला नौकर-चाकर मानते हैं और इसलिए कोई सा काम आ पड़े, कोई सी समस्या आ जाए, किसी भी प्रकार की इच्छा जग जाए, भगवान के दर पहुंच जाते हैं या भगवान का नाम लेकर याचना कर ही डालते हैं।

अधिकांश लोग नकारात्मकता से ग्रस्त हैं इसलिए भगवान के पास देने को बहुत कुछ है लेकिन सच्चे मन से पाने वाले कम पड़ गए हैं। बहुत कम फीसदी लोग हैं जो ईमानदारी से भजन-पूजन और नैष्ठिक साधना करते हैं अन्यथा अधिकांश लोग दिखावा ही कर रहे हैं। 

देने को बहुत कुछ है लेकिन पाने वाले पात्र लोगों की कमी है। इस स्थिति में भगवान तो चाहते हैं कि सच्चे और पात्र लोगों को वह सब कुछ मिलता रहे, जो वे चाहते हैं। इसलिए आजकल थोड़ी-बहुत साधना और भजन-पूजन कर लेने वाले लोगों को भी बहुत कुछ मिलने में ज्यादा दिक्कतें नहीं आती हैं।

यहां यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि जब ऎसा है तो फिर वे लोग दुःखी या अभावग्रस्त क्यों हैं जो घण्टों पूजा-पाठ और कर्मकाण्ड करते रहते हैं, घण्टियां हिला-हिला कर भगवान को जगाते रहते हैं और धर्म के नाम पर जाने कैसे-कैसे आयोजन साल भर करते ही रहते हैं।

इसका सीधा सा उत्तर है कि कलियुग में मामूली नाम स्मरण और भजन-पूजन से भगवान रीझ जाते हैं मगर यह तभी संभव हो पाएगा जबकि हम पापों से बचे रहें, पवित्रता और दिव्यता का आचरण अपनाए रखें, तभी हमारी ऊर्जा भगवान या भगवान से कामना पूर्ति की क्षमता पा सकती है।

एक तरफ हम पाप करते रहें और दूसरी तरफ भजन-पूजन या जप-तप। इसका कोई फायदा नहीं है क्योंकि जो ऊर्जा हम संचित करते हैं वह पापों का उन्मूलन करने में खर्च हो जाती है। इसलिए कलियुग में यदि भगवान या उनकी कृपा को पाना चाहें तो यह तय कर लें कि पाप के आचरण से मुक्त रहकर साधना या भजन-भक्ति करें, तभी कम समय और कम मेहनत में ईश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है।

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धर्म के ठेकेदारों ने यह भ्रम फैला कर रखा है की पूजा पाठ ,कर्मकाण्ड से ईश्वर मिलता है या मनोवांछित फल मिलता है | ईश्वर का स्वरुप क्या है ,ईश्वर एक व्यक्ति है या शक्ति है ,कहाँ स्थित है ,संसार की उत्पत्ति में उनका क्या योगदान है ,आत्मा परमात्मा की अवधारणा कितना सच है, मोक्ष क्या है, ये सब आध्यात्मिकता का विषय है ,इन चीजों का कर्म काण्ड से कोई सम्बन्ध नहीं है |ये तो पण्डे पुजरिओं के रोजी रोटी का साधन हैं |अगर कोई पण्डे पुजारी सही पूजा विधि जानते है तो उनको अभी तक ईश्वर क्यों नहीं मिला ? ऐसे असफल पंडितों में विश्वासकरना कोई अर्थ ही नहीं है |

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