शुक्रवार, 27 मई 2016

एक्स्ट्रा हूँम ........ ? / व्यंग्य / सुशील यादव

अपने देश में इन दिनों कोई भी प्रोडक्ट 'एक्स्ट्रा हूँम 'के बिकता नहीं ।ग्राहको के दिलों को आजकल तूफानी ठंडा जब तक न मिले,उनको अपनी हलक में कुछ फंसा सा लगता है ।

एक पर एक फ्री ,बाय वन गेट वन ,अप टू फिफ्टी परसेंट आफ,......माल बेचने के इन नुस्खों को देखकर ,यूँ लगता है दूकानदार मानों खुद के लुटने के लिए दूकान सजाये हैं ।आओ हमें लूटो ।जिसमे जितनी कूबत है उतनी लूटे.... ।

वे "रमता जोगी बहता पानी ,माया महाठगनी हम जानी" जैसे वैराग्य भाव से’; मानो संसार को सब कुछ मिटटी के मोल बेच के चल देना चाहते हैं ।

अपना परलोक-सुधारने का नुस्खा उन्हें "अप टू फिफ्टी परसेंट आफ में" बखूबी नजर आता है ।वे ‘तत्व-ग्यानी’ जीव लगते हैं ।एक-बारगी सोचने में लगता है ‘बपुरा’ क्या बचा पायेगा ....?जितने में खरीदा है, उससे कम कीमत में ढकेल कर अपने बच्चो को किसी अनाथाश्रम के स्कूल में तो नहीं डालना चाहता ....?

ग्राहक चकराए रहता है ।उसको आफ और डिस्काउंट का गणित आज तक समझ नहीं आया । कभी सोचता है सेकंड का माल होगा ,कभी मेंयुफेक्च्रिन डिफेक्ट होने का डर सताता है । इन सब के बावजूद , वो अपने-पास पडौस को भी खींच लाता है।सेल है भाई चूको मत ।माल में कोई एब नहीं। खरा है एकदम .....। इस बहाने वो अपने भ्रम को भी परख लेता है चलो अगर अब ठगा रहे हैं तो मै किस खेत की मूली हूँ किसी के हाथ तो उखडूगा ही । कहीं बड़े बड़े शो –रूम में जा के ठगाने से तो अच्छा है, साल भर की जरूरत की इकट्ठी खरीद यहीं कर ले ।

ये तो दूकानदार हुए ,उधर प्रोडक्ट बनाने वाले भी बढ़- चढ़ के एक्स्ट्रा माल पकड़ा रहे हैं।टी- ट्वंटी के खेल में ट्वेंटी परसेंट एक्स्ट्रा ।यानी एक्स्ट्रा हूँम ....।मजे से खाइये ...

हमने इधर राजनीति में ‘तपास’ किया ,उधर भी यही सब लागू है ।सरकार बनाने और गिराने के खेल में एक विज्ञापन जो छपा नहीं होता, मगर सबके पढने में मजे-मजे आ जाता है वो है'हार्स ट्रेडिंग'का..... ।कौन सा घोड़ा कितने का बिकाऊ है ।कितना दौड़ेगा ...?चलते-चलते दचके तो नहीं मारेगा ।विश्वसनीय रहेगा या नहीं ,ये सब खरीद-फरोक्त करने वालो के दिमाग में आने वाली सामान्य सी बातें हैं ।

चुनावी-रैली में भीड़ जुटाने वाला ठेकेदार, जनता को 'एक्स्ट्रा हूँम 'के प्रलोभन में चुनावी-सभा तक खींच लाता है ।चुनावी-सभा का प्रचारक, वक्ता और खुद कैंडिडेट वादों का’ ‘एक्स्ट्रा मटेरियल’ बिखराने लग जाते हैं ।हम जीते तो ....ये कर देगे ....वो कर देगे, जैसा दिवा- स्वप्न जनता की जेहन में ठूस-ठूस कर बिठा दिया जाता है ।उनके गडाए इस ‘एक्स्ट्रा-कील’ को अपोजीशन पूरे पाच-साल कोस-कोस के निकालते रहता है ।

'एक्स्ट्रा-हूँम' का इंजेक्शन;मरीजों को कुछ हास्पिटल में एहतियात के तौर पर’ सख्ती से मगर बाकायदा लगाया जाता है ।आप एक के पास गये नहीं कि वो चार को दावत में बुला लेता है । डा.सा,ये ताजा मरीज हार्ट की शिकायत ले के आया है ।आप बी.पी. टेस्ट कर लो ,दवे जी एक्सरे ले लेंगे ,तिवारी जी शुगर खून पेशाब जांच लेंगे ,कार्डियोलाजिस्ट से अञ्जिओग्राफि करवा लेंगे ।सबके हिस्से में मरीज को बाँट के भरी भरकम फीस का जुगाड़ कर लेते हैं ।

कलकत्ता में, पुल-हादसा कंस्ट्रकशन कम्पनी और सरकारी विभाग में लेन-देन या हिस्सा-बटवारे का दिल दहलाने वाला सीन, अत्याचार से कम अगर लगता हो तो कहो ...?'एक्स्ट्रा हूँम' पाने के चक्कर में आरक्षण भर्ती इंजीनियर ने जाने क्या दिमाग चलाया कि, पुल को बिठा डाले ।‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाला किस्सा तो याद है न ......अब देखे इल्जाम किसके सर जाता है ?

अपनी सरकार के दिमाग में ‘देश-भक्ति, जनसेवा ‘ वाली पुलिसिया उक्ति ‘थानेदार के उसूलो’, की तरह जम के बैठ गई है । थानेदार नए शहर का चार्ज लेता है तो हप्ते दो हप्ते रात्री-कालीन गश्त या राउंड में निकलता है । रास्ते में जो भी मिल जाता है, उसे अनाचारी,दुराचारी अत्याचारी समझने की भूल कर ही बैठता है । इस कृत्य में उसके गाँठ का कुछ जाता भी नहीं उलटे, सेटलमेंट फीस के नाम पर कुछ कमाई हो जाती है ।

यहाँ आरक्षण की मांग करने वाला सत्याग्रही, और कालेज-स्टूडेंट आतंक वादी चेहरे नजर आते हैं., तो इसमें नजरिये का दोष नहीं वरन व्यवस्था का है । कहने वाले डार्विन-थ्योरी ‘स्ट्रगल फार को ऐक्सिसटेंस’ को भी याद कर लेते हैं । जो नारा कल तक ‘हक’ मागने वालों का होता था ,कि जो ‘हमसे टकराएगा चूर चूर हो जाएगा’ ,अब यही सरकारी नारा सा लगता है । इसे चाहे सत्ता की तरफ से समझे, या वर्दी की तरफ से जाने । नारा अपने आप में सब कुछ कहने के काबिल है ।

इस देश की विडंबना है कि आर्थिक-अपराधों को फलने-फूलने देने के लिए बैंक ,उसके अधिकारी ,नेता का दबाव सब कुछ एक साथ काम करते हैं । फंसने पर अपराधी को नेताओं का संरक्षण मिलना या दिया जाना,जैसे एक परंपरा की तरह निर्वाह किया जता है । अपराधी द्वारा , लोन में लिए नान-रिफंडेबल मनी की बंदर-बाट,उस मनी से दी गई पार्टी और पार्टी फंड में दिए चंदे कि बदौलत ‘एक्स्ट्रा-सपोर्ट’ की नीव रखी जाती है । इस बुनियाद की ‘एक्स्ट्रा अंडर हैण्ड डीलिंग ‘भी आप ही आप निर्धारित हो जाती है ।

मेरे गाव में नत्थू नाम का मेरा पडौसी है । वो अपने निजी काम से दो चार दिन के लिए आने की खबर भिजवाया था । पडौसी धर्म के नाते उसे स्टेशन में लिवाने पहुचा ।सामान्य औपचारिकता बाद शिष्टाचार-वश मैंने उससे पूछा ....और उधर गाव में क्या चल रहा है ...?उसने तपाक से कहा ....’फ़ाग’ चल रहा है .....?मुझे उससे यूँ मजाक की अपेक्षा नहीं थी,वो भी उस वक्त जब मैं देश और देश की हालत पर ट्रेन आने के इंतिजार में गंभीरता से जाने क्या-कुछ सोच रहा था , लिहाजा उसे मेरी मुद्रा कुछ सख्त होते देखी। वो तुरन्त समझ के बोला गुरुजी ...कन्फुज मत होइए फाग इधर शहरों वाला नहीं, जो टी-वी विज्ञापन में आजकल छाया है । हमारे गाँव देहात में .होली है न ...सब ‘फाग’ में मस्त हैं ।वो वाला फाग...... । गुरुजी क्या बताएं ,आप की कमी फाग गाते समय सबको शिद्दत से खलती है, क्या गाते थे “पहिरे हरा रंग के साडी ,वो लोटा वाले दुनो बहिनी”...... ।मजा आ जाता था ।

मै 'एक्स्ट्रा हूँम ' वाला टेस्ट, नत्थू की बातों में पा के अपनी फाग वाली धुन में मानो खो सा गया ।

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

०९४०८८०७४२० susyadav7@gmail.com

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