गुरुवार, 5 मई 2016

ईश्वर से न करें कामनापूर्ति की जिद - डॉ. दीपक आचार्य

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ईश्वर परम दयालु है। वह अपनी इच्छाओं से भी आगे बढ़कर इतना कुछ अधिक देना चाहता है कि हम परम संतृप्त रहें, आत्मतुष्ट और समत्व भाव से परिपूर्ण रहें और किसी भी वस्तु या व्यक्ति की कामना कभी न रहें।

जो लोग हमारे आस-पास रहें वे सारे के सारे आनंद देने वाले हों तथा जीवन का हरेक भोग प्राप्त होता रहे। और इन्हीं सब बातों के लिए हम लोग भगवान से हर दिन याचना करते रहते हैं।

यह याचना हम दो मामलों में करते हैं। एक तो संसार का बहुत कुछ वैभव पाने के लिए और दूसरा अपनी समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए। हम औरों से अपेक्षा करते हैं और उसी तरह भगवान से भी कोई न कोई अपेक्षा रखते हैं।

इन दोनों ही विषयों पर चिन्तन या याचना करते हुए अधिकांश लोग भगवान से यही कहते हैं कि इस बार काम कर दे, इसके बाद किसी दूसरे काम के लिए कभी नहीं कहेंगे। मगर इंसान अपने विचार पर कभी दृढ़ प्रतिज्ञ नहीं रह सकता।उसे अंतिम समय तक कोई न कोई याचना बनी ही रहती है।

यदि श्मशान में चिता पर रखते समय भी दो क्षण के लिए इंसान को कुछ कहने का मौका दिया जाए तब भी वह कुछ न कुछ मांगता ही नज़र आएगा।  भगवान इंसान को बहुत कुछ देना चाहता है और इतना अधिक देना चाहता है कि जो इंसान की कल्पनाओं में भी नहीं होता।

मानव की बुद्धि और कल्पनाएं अत्यन्त सीमित होती हैं इसलिए उसकी मांग और याचनाओं में भी अत्यन्त संकीर्णताओं का समावेश होता है। अधिकांश मामलों में होता यही है कि हम सभी लोग भगवान से कुछ न कुछ माँगते रहते हैं और वह देता भी है लेकिन  हमारी इच्छाएं सीमित होती हैं और वह देना अधिक चाहता है।

इस कारण से हमारा पूरा जीवन दायरों में बँध जाता है इसलिए उन दायरों से अधिक कल्पनाओं का अभाव हरदम बना रहता है। हमारी कई समस्याओं का कारण यह भी है कि हम सीमित हो जाते हैं और यह भूल जाते हैं कि ईश्वर असीमित देने वाला है।

भगवान से प्रार्थना और याचना करते हुए अपनी ओर से कोई सीमा न बाँधे बल्कि भगवान से यह कहें कि वह जो ठीक समझता है, वही करे। लेकिन इस स्थिति में यह भी जरूरी है कि हम भगवान पर अनन्य श्रद्धा और विश्वास रखें और सब कुछ उसी पर छोड़ दें।

सच्चे भक्त और साधक के लिए यह घनीभूत भावना अनिवार्य है तभी भगवान की कृपा पायी जा सकती है। जो लोग जिद करते हैं उन्हें भगवान बहुत कुछ देने की इच्छा होते हुए भी उतना ही देता है जितना मांगा गया है क्योंकि भक्त की बात पहले रखता है।

इसी जिद की वजह से बहुत से लोग ईश्वर से वह सब पाने में वंचित रह गये जो ईश्वर अपार परिमाण में देना चाहता था। एक बार सब कुछ भगवान पर छोड़ दें फिर देखें। इतना अधिक प्राप्त कर पाएंगे कि खुद को भी आश्चर्य होगा और जमाने भर को भी।

कई बार हम किसी एक कामना के लिए इतने अधिक वशीभूत हो जाते हैं कि बाबाओं और दूसरे भौंपों, पाखण्डियों, धूर्त बाबाओं, अघोरियों, पण्डतों और ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ते हैं, जाने किन-किन देवरों, स्थानकों, भूत-प्रेतों के डेरों आदि में भटकते रहते हैं, तंत्र-मंत्र और यंत्र, मैली विद्याओं, टोनों-टोटकों आदि के फेर में भ्रमित होकर भिखारियों की तरह चक्कर काटते रहते हैं। बावजूद इसके हालात वहीं के वहीं रहा करते हैं।

कई लोगों के जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं होने का कारण भी यही है। लोग अपने लिए पैसा, पद, प्रतिष्ठा और वैभव चाहते हैं लेकिन उसे अपनी सीमाओं में बाँध देते हैं इस वजह से उन्हें अपेक्षित सफलता के मुकाबले काफी कम फीसदी में ही संतोष करना पड़ जाता है।

ये सारे लोग यदि ईश्वर की इच्छा का सम्मान करते तो शायद अप्रत्याशित बेहतर स्थिति में होते। लेकिन अपनी इच्छाओं को सीमाओं के घेरे में बाँध  देने की वजह से पिछड़ कर रह गए और ईश्वरीय अनुकंपा का पूरा लाभ प्राप्त नहीं कर पाए।

कई बार हमारे मन के अनुकूल स्थिति नहीं होती। ऎसे में हम बार-बार जिद करते हैं कि जो हमारी इच्छा या मांग है उसे भगवान पूरी कर दे। इसके लिए हम धार्मिक कर्मकाण्ड और तंत्र-मंत्र का सहारा भी लेते हैं मगर इच्छा पूरी नहीं हो पाती।

इस स्थिति में यह जान लेना चाहिए कि भगवान इससे और अधिक अच्छी स्थिति देना चाहता है। फिर भी ज्यादा कारुण्य भाव और तीव्रता से जिद कर लें तो भगवान सुन जरूर लेगा लेकिन बाद में पछतावा हमें ही होगा। 

इसलिए जीवन का कोई सा काम हो, इच्छा या कल्पनाएं हों, अपनी ही अपनी न हाँकें, भगवान को अपनी करने दें, इससे हमेशा फायदे में रहेंगे और जीवन का आनंद भी प्राप्त करेंगे।

 

 

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