सोमवार, 30 मई 2016

व्यंग्य राग (९) बटन दबा – सीटी बजा / डा. सुरेन्द्र वर्मा

साहित्यकार तो थे ही, वे भाषण-वीर भी थे | पदानुसार भी वे व्याख्याता ही थे | कम्प्यूटर और इंटरनेट विषय पर उनका व्याख्यान चल रहा था | बोले, आज कम्प्यूटर ने आम आदमी को भी साहित्यकार बना दिया है | जिसे देखो कविता करने लगा है, किसी भी बात पर अपना विरोध दर्ज करने के लिए अपनी सटीक टिप्पणियाँ वाट्सएप और फेसबुक पर डालने लगा है | अभी तक सामान्य जन केवल मौखिक रूप से स्थितियों और लोगों पर तंज कसते थे, अब ‘ब्लोग’ पर व्यंग्य लिखने लगे हैं | ये एक बड़ी भारी साहित्यिक क्रान्ति हुई है | एक मनचला विद्यार्थी हाथ उठाकर खडा हो गया. कहने लगा सच तो यह है सर, आज कम्प्यूटर की दुनिया लम्बा चौड़ा भाषण देने और बड़े बड़े निबंध लिखने के लिए भी हतोत्साहित करती है. अपनी बात थोड़े में और सटीक कहिए और चलते बनिए| बात अच्छी लगे तो “लाइक” का बटन दबाइए और आगे बढ़ जाइए | न अच्छी लगे तो चुप रहिए | मन करे तो अपनी व्यंग्य की भड़ास निकालने के लिए उस पर भी “लाइक” का ही बटन दबा दीजिए | कौन देखता है !

इसमे संदेह नहीं, बड़ी विचित्र है कम्प्यूटर की दुनिया | इसमें कुछ भी आभासित हो सकता है | पूरी दुनिया ही आभासी है | सच झूठ लगता है और झूठ सच लग सकता है | फेस बुक पर डाली गई अपनी नागवार सेल्फी पर आपको ढेरों ‘लाइक’ मिल सकते हैं और आपकी ललितकविता के लालित्य पर अंगूठा दिखाया जा सकता है | कितना ही नियम-विरुद्ध लिख दें, कोई विह्सिल बजाने वाला नहीं है, मानो सबने “सकातात्मक सोच” की कसम खा रखी है. लेकिन कुछ नकचढे, जिनके खून में ही तिनिया निकालना होता है, “लाइक” की इस आभासी व्यवस्था से काफी नाराज़ और दुखी हैं | अरे, हमारी नापसंदगी के लिए भी तो कोई न कोई बटन होना चाहिए | यह क्या, पसंद है तो भी लाइक, नापसंद है तो भी लाइक | बटन दबाना है तो बस लाइक पर ही दबा सकते हैं | और कोई विकल्प है ही नहीं | अब तो इलेक्शन में भी ‘नाटो’ बटन स्वीकार कर लिया गया है | कम्प्यूटर में भी कुछ इसी प्रकार का नकारात्मक बटन ज़रूरी है. स्वनामधन्य प्रूफ-रीडर-नुमा आलोचक आखिर कहाँ जाएं ! बिना उनके यह दुनिया कितनी सूनी सूनी और सपाट हो जाएगी. ज़रा इस पर भी तो गौर कीजिए. जहां देखो स्माइली, हर तरफ लाइक – ये भी भला कोई बात हुई ! प्रजातंत्र के लिए विरोध ज़रूरी है. भारत में तो विरोध का नाम ही प्रजातंत्र है | और इंटरनेट पर विरोध के लिए कोई प्रतीकात्मक स्थान तक नहीं ! बड़ी ज्यादती है !

गूगल अब थोड़ा थोड़ा मन बना रहा है | सोचा जा रहा है कि लाइक के साथ साथ अब अब ‘डिसलाइक’ का विकल्प भी दिया जाए | नकचढो की नकारात्मकता की खुजली का भी कुछ न कुछ इलाज किया जाए. डिसलाइक के बटन की संभावना ने ही पैदाइशी आलोचकों के पेट में गुद्गुदी मचाना शुरू कर दी है. गूगल को वे एडवांस में धन्यवाद दे रहे हैं | कितना खुशगवार होगा वह दिन जब ‘डिसलाइक’ का विकल्प हाथ लग जाएगा | फेसबुक और वाट्सएप पर खुशी की लहर दौड़ गयी है | सुन्दर से सुन्दर सेल्फी पर ‘डिसलाइक’ बटन न दबाया तो कहना !

कहा गया है कि ‘लाइक’ का एक विकल्प सीटी बजाना (विह्सिल) भी हो सकता है. मुझे लगता है, यह ज्यादह अच्छा रहेगा क्योंकि सीटी बजने वाले बटन में हमेशा थोड़ी अस्पष्टता की गुंजाइश रहेगी | अपनी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में सुन्दर लड़की को देखकर लडके सीटी मारते हैं वहीं खेल (जैसे फुटबाल) में नियम विरुद्ध खेल होने पर भी सीटी बजा दी जाती है. विह्सिल का विकल्प हमेशा भ्रम में रखेगा कि यह खुशी का इज़हार है या फिर यह फाउल के लिए है. और इसी में सीटी बजाने वाले की सफलता का राज़ है. वैसे यह बात तय है कि सीटी हो या नापसंदगी, विह्सिल हो या डिसलाइक, दोनों ही असहमति के हथियार की तरह ही आभासी दुनिया मे प्रयोग होंगे | लाइक का एकछत्र राज ख़त्म हो जाएगा |

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