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अंक के लगाकर पंख , डिग्री मारे डंक / व्यंग्य / अमित शर्मा

अच्छी शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करना प्रत्येक नागरिक का संविधान प्रदत्त अधिकार हैं ,  हालांकि आज के माहौल में शिक्षा प्राप्त करने के प्रयासों और उन प्रयासों से प्राप्त सफलता को देखते हुए लगता हैं की संविधान निर्माताओं ने "राइट टू एजुकेशन" देकर संविधान को ना केवल नीरस होने से बचाया हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने हास्य बोध का भी परिचय दिया हैं। इस तरह से संविधान और इसके निर्माताओं ने ना केवल हमारे अधिकारों और कर्तव्यों को सुरक्षित रखा हैं बल्कि हमारे मनोरंजन का भी ख्याल रखा हैं। आज के समय में "मुंह में रजनीगंधा और कदमों में दुनिया" हो या ना हो लेकिन हाथ में डिग्री होना बहुत ज़रूरी हैं और हाथ में ड्रिग्री होने के लिए आपका हाथ "ढाई किलो" का होना भी ज़रूरी नहीं है, हाँ लेकिन हाथ में डिग्री के लिए थोड़ी "हाथ की सफाई" मददगार होती हैं. आज़ादी के बाद से ही हमने ज़्यादातर समय समाज और देश का भला करते हुए "हाथ" की सफाई देखी हैं।

डिग्री और मार्क्स को लेकर हम भारतीयों का दीवानापन, विजय माल्या और ललित मोदी की तरह किसी से छुपा हुआ नहीं हैं.  हर इंसान अंक के पंख लगाकर सफलता की उड़ान भरना चाहता हैं। हम बचपन से सुनते आये हैं की हर माँ-बाप का एक ही सपना होता हैं (जिसे वो खुली आँखों और कई बार खाली जेब से भी देखते है)  की उनके बच्चे पढ़-लिखकर,  कोई बड़ी डिग्री लेकर,  अच्छी नौकरी कर, उनका नाम  (ऋतिक)  रोशन करे ,  लेकिन हर प्रोफेशन में डिग्रियों की बंदरबाट ने प्रतिभा की वाट लगा दी हैं। वैसे डिग्री लेने का सबसे बड़ा फायदा ये हैं की अगर डिग्री लेकर अच्छी नौकरी मिले जाये तो पैसे मिलने लगते हैं और डिग्री लेकर नौकरी ना भी मिले तो घरवालों और रिश्तेदारों के ताने मिलना शुरू हो जाते हैं। मतलब कुछ ना कुछ तो मिलने ही लगता हैं और इस तरह डिग्री अगर बेस्ट ना भी निकले तो उसे बिलकुल वेस्ट तो नहीं कहाँ जा सकता हैं क्योंकि आजकल डिग्री बनाने में अच्छे कागज का इस्तेमाल हो रहा हैं जो समोसा से लेकर बड़ा -पाव तक, सबका तेल सोख सकता हैं।

शौक बड़ी चीज़ हैं इसीलिए हम सफलता को डिग्रियों से मापने के शौक़ीन हैं कोई इंसान भले ही बिना किसी डिग्री के मंगल ग्रह पर पहुँच कर पानी की खोज कर दे लेकिन शर्म से पानी पानी हुए बिना, हम भारतीय उसके मंगल की कामना उसकी दसवी और बारहवीं की मार्कशीट में विज्ञान और गणित के अंक खोजने के बाद ही करेंगे। भले ही कोई बंदा चंदा मामा तक पहुँच जाये लेकिन उसकी तारीफ करने से पहले हम ये ज़रूर जानना चाहेंगे की उस बन्दे ने कॉलेज में एडमिशन के लिए कितना चंदा दिया था। जहाँ चाह ,वहां राह इसीलिए जिनको पढ़ लिख कर डिग्री नहीं मिलती वो डिग्री खरीद लेते हैं , चूँकि पैसा बिना स्पीकर के ही बोलता हैं इसलिए डिग्री के साथ कभी कभी थर्ड डिग्री भी बोनस स्वरुप मिल सकती हैं। डिग्री खरीदने वाले लोग, खुद्दार होते हैं , वो अंको और डिग्री के लिए पढाई -लिखाई पर निर्भर नहीं रहते हैं, वो खुद तय करते हैं उन्हें कितने अंक, कौनसी डिग्री और कौनसी यूनिवर्सिटी से डिग्री चाहिए। देश का स्वाभिमान और खुद्दारी बचाए रखने में ऐसे लोग अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं।

चुनाव के समय बुद्धिजीवी और जातिवाद विरोधी पत्रकार भले ही गाँव -गाँव जाकर लोगों की जाति पूछते हो लेकिन लड़की वाले तो सदियों से लड़के के घर का पता और लड़के की डिग्री ही पूछते आ रहे हैं। वैसे ज़माना भी पूछ -पूछ कर पूँछ हिलाने वालों का ही हैं । लड़की वाले पहले डिग्री मांगते हैं और उसके जवाब में फिर लड़के वाले दहेज़ मांगते हैं और बाद में लड़की वाले पनाह मांगते हैं । ये माँगने का सिलसिला मंगनी तक चलता रहता हैं। डिग्री का दीवानापन ऐसा, मानो लड़का शादी के समय लड़की के गले में वरमाला नहीं डिग्री पहनाएगा और लड़की,  लड़के के बदले डिग्री के साथ  7फेरे लेगी । हमारे यहाँ शादियों में काली मेहँदी से लेकर दलेर मेंहदी और डिग्रियों का प्रयोग भूतकाल से प्रचलित हैं।

हमारे देश में मांगने वाले हमेशा से ग़लतफ़हमी और चर्चा में रहते हैं. मांगने वालों ने काले धन वाले  15 लाख, आज़ाद देश में आज़ादी , फ्री वाई-फाई और क्या क्या नहीं माँगा, लेकिन मांग कभी पूरी नहीं होती , हाँ भर ज़रूर दी जाती हैं । अब तो अपने झूठे वादों से जनता को पानी पिलाने वाले लोग भी चाय पिलाने वालो की डिग्री मांग रहे हैं। अपने राज्य की सारी समस्याओं और उनके समाधानों से कोसो दूर , सबको कोसते हुए ,  एक आई. आई. टी. पास आउट ,  पूर्व इनकम टैक्स कमिश्नर, मुख्यमंत्री ,  एम.ए.  पास प्रधानमंत्री की डिग्री चेक करना चाहता हैं यहीं हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती हैं , इससे हमारा संघीय ढांचा मजबूत होता हैं और केंद्र और राज्यों के बीच संबंध मधुर होते हैं जो जनता से किये हुए वादे पूरे करने से कभी नहीं हो सकते हैं।

प्रधानमंत्री की डिग्री प्रामाणिक निकलने से ना केवल देश का निर्यात और विदेशी मुद्रा कोष बढ़ेगा बल्कि डॉलर के मुकाबले रूपया भी मजबूत होगा। साथ ही साथ गरीबी और भ्रष्टाचार पर भी ठीक उसी तरह से लगाम लगेगी जिस तरह से पावर प्ले ख़त्म होने पर चौके -छक्कों पर लगती हैं। इसके ठीक उलट, डिग्री फ़र्ज़ी निकलने पर देश में अराजकता फ़ैल सकती हैं और आपातकाल जैसा माहौल बन सकता हैं।

समय के साथ हमारे राजनेता के विचारों ने भी करवट ली हैं पहले वो सीधा इस्तीफा मांगते थे लेकिन अब पहले डिग्री मांगते हैं फिर इस्तीफा , मतलब उन्होंने ना केवल अपने विचारों को ऊपर उठाया हैं बल्कि इस्तीफे का मूल्य भी बढ़ा दिया हैं। लोकतंत्र में 5 साल का समय बहुत लंबा होता हैं लेकिन अगर इसी तरह से सत्तापक्ष और विपक्ष के लोग एक दूसरे की डिग्री चेक करते रहे तो 5 साल का समय हँसते -खेलते हुए सौहार्दपूर्ण वातावरण में बीत जाएगा और डिग्रियों की प्रामाणिकता भी बढ़ेगी।

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