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रिश्तेदार / कहानी / डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा,

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यूँ तो दुबेजी का पूरा परिवार ही धार्मिक वृत्ति और सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाला है। पर उनकी माताजी की तो धर्म में विशेष आस्था है। वर्ष में दो-तीन धार्मिक आयोजन कर लेती हैं। उन्हीं की प्रेरणा है जो पूरे परिवार का आयोजनों में सहयोग रहता है। बहुएं भी सास से कम नहीं। पूजा-पाठ, व्रत त्यौहार सब पूरे मन से निभाती हैं।

उस रोज उनके घर देवी पूजन था। यह केवल महिलाओं का ही छोटा सा आयोजन था। कालोनी की 15-20 महिलाएँ एकत्र थी। पूजन के बाद महिलाएँ उठने लगी तो रीना भाभी ने एक का हाथ पकड़कर बैठा लिया - “अरे ऐसी भी क्या जल्दी है घर जाने की। कौन सा चूल्हे पर दूध चढ़ाकर आई हो। किसी बहाने तो घर से निकलना हुआ है। जरा देर बैठो तो सही।” इसी के साथ बाकी सबको भी बैठने का आग्रह करते हुए उन्होंने बहुओं को चाय बनाने का आदेश दे दिया।

लगभग सभी यथास्थान बैठ गई। एक-दो जो जाना चाहती थी, को भी उनके बगल वालियों ने बैठा लिया। शोभा बोली- “अरे जब चाय बन ही रही है तो सब पीकर ही जाओ। कितनी देर लगनी है?”

दो-चार मिनट के सामूहिक वार्तालाप के बाद वहाँ दो-दो, चार-चार के अलग-अलग समूह बन गए। जो स्वचालित थे। उन्हें बातों के मुद्दो का चुनाव करने, एक मुद्दे को छोड़ दूसरा उठा लेने, लगातार बोलते रहने या चुप दूसरे को सुनते रहने की आजादी थी। वहाँ न किसी संचालक की आवश्यकता थी न परीक्षक की। अपनी बातों और निष्कर्षों को सही गलत ठहराने के लिए ये समूह पूर्ण स्वतंत्र थे। कहीं बाल गोपालों की खबर सुद ली जा रही थी तो कहीं देश दुनियाँ के मुद्दे गरम थे। कोई अपने घर की चिंता में थी तो कोई मोहल्ले पड़ौस की चिंता में। अल्पज्ञानी मुस्कुराते और सिर हिलाते हुए दूसरों की बात से सहमति जता रही थी और ज्ञानवान अपनी चलाई हर बात को विविध तर्कों से सजा कर साथ बैठियों से हामी भरवा रही थी। इसी बीच निर्मला भाभी की आवाज़ उभरने लगी। वे अपने किसी रिश्तेदार की चर्चा कर रही थीं। बात थोड़ी दिलचस्प थी और उनकी आवाज़ भी ऊँची व भावुक। सो धीरे-धीरे लगभग सभी का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो गया और वे तन्मयता से किस्सा सुनाने लगी। जो किस्से में बाद में शामिल हुई थीं उन्होंने बगलवालियों से आहिस्ता से पृष्ठभूमि जान ली और उनकी बातें सुनने लगी।

निर्मला भाभी बता रही थीं - उनके पति ने सेवानिवृत्ति से पन्द्रह वर्ष पूर्व अपने ही शहर में घर बनवाया था। यह सोचकर कि घर की देख-भाल बनी रहेगी, अपने एक कुटुम्बी भाई को उसमें रख दिया। अपनी तो बदली जहाँ-तहाँ हो रही थी। वह मकान बनाने की स्थिति में नहीं था। किराए के घर में रह रहा था। सात आठ साल बाद उन्होंने घर खाली करने को कहा। घर में जगह-जगह टूट-फूट हो रही थी। मरम्मत व रंगाई कराना जरूरी हो गया था। पर उसने खुशामद कर एक साल और निकाल दिया। इसी बीच किसी मित्र से बात हुई तो मित्र ने बताया - “यदि कोई दस वर्ष तक घर में रह ले और उसके लिए पर्याप्त साक्ष्य भी एकत्र कर ले तब घर उसी का हो जाता है। सरकार ने ऐसा नियम बनाया है।” हमें लगा कि हमारे साथ तो ऐसा नहीं होगा क्योंकि हमारे संबंध काफी अच्छे हैं। परन्तु वह दो तीन वादे कर मुकर गया और फिर साफ कह दिया - “मेरे बच्चे यहाँ पढ़ रहे हैं। मैं कहाँ जाऊंगा? आप मेरे रहते ही मरम्मत करा दो।” अब तो जी हमें थोड़ा संदेह हुआ। दाल में कुछ काला नजर आने लगा। इसीलिए उस पर जोर डाला तो वह तो मुकाबले पर उतर आया। दो चार मौहल्ले वाले और रिश्तेदार भी उसकी तरफदारी करने लगे। हमें लगा कि जिंदगी भर की कमाई गई हाथ से। हमने भी अपनी बात रिश्तेदारों और मौहल्ले वालों के सामने रखी। हमें बहुतों को तो यह समझाना कठिन हो गया कि हम मकान मालिक हैं क्योंकि उसने सबसे खुद को ही मालिक बताया हुआ था। जो पुराने लोग थे वे तो हमें जानते थे। पर नए तो शक्ल भी नहीं पहचानते थे। वे हमें ही गलत समझ रहे थे। दो चार बार कहा सुनी हुई। हाथापाई तक नौबत आ गई। पर हम भी अड़ गए कि अब घर खाली करा कर ही दम लेंगे, भले ही पुलिस और कोर्ट कचहरी करनी पड़े। बड़ा कष्ट होता था जी। कितनी मुसीबतों से घर बनाया और दूसरा कब्जा बैठा। खैर देवी माँ की कृपा हुई। घर खाली हो गया। अब कसम खा ली है भले ही खाली पड़ा रहे किसी को रखना नहीं है। एक ने सवाल किया- “किराया देता था या नहीं?”

“अजी, कैसा किराया। किराया देना पड़ता तो इतना लालच न होता। मुफ्त का माल हाथ लग रहा था। तभी तो।”

दूसरी ने कहा- “अजी बगैर कुछ लिए खाली कर दिया। यही गनीमत समझें। वरना बहुत से तो उल्टा चपत लगा जाते हैं। अपनी गरज को लाख दो लाख देना पड़ जाता है।”

एक सखी जो अभी कम उम्र की थी व दुनियाँ के कटु अनुभवों से अनभिज्ञ थी थोड़े आश्चर्य से बोली- “ऐसे भी रिश्तेदार होते हैं?” निर्मला भाभी दुःखी हो कहने लगी- “अजी, हमीं क्या जानते थे, ऐसे भी रिश्तेदार होते हैं। वरना पहले ही किनारा कर लेते। इतने दिनों मुफ्त रह गए उसका गुन एहसान तो दूर उल्टे दुश्मनी बंध गई।” रीना भाभी ने उनका दुःख बाँटने के लिहाज से कहा- “अब भलाई का जमाना नहीं रहा बहन। अपनी कॉलोनी में ही देख लो। बेचारे गुप्ता जी अपना घर होते हुए भी कितने सालों तक किराए के घर में रहे। लाला ऐसा घेर के बैठा कि खाली की सारी उम्मीद खत्म हो गई। वो तो मिसेज गुप्ता के भाई ने हिम्मत कर खाली करा लिया वरना बेचारे गुप्ता जी तो हिम्मत हार गए थे।” शोभा जी बोल पड़ी- “अरे भाभी हमारे एक रिश्तेदार को तो इस चक्कर में घर बेकना ही पड़ गया। किराएदार ने उनके बाहर रहते मकान में फेर बदल भी खूब कराए और आखिर में घर कब्जा ही लिया। आधे-अधूरे दामों पर ही घर छोड़ना पड़ा।” रीता बोली- “ये सब किस्से सुनकर मुझे तो डर लग रहा है। चार साल से हमारे यहाँ भी किराएदार हैं।” शोभाजी ने समझाया- “अजी फौरन खाली कराओ। चार साल बहुत होते हैं। घर सलामत रहे तो किराएदारों की कमी नहीं। पर घर ही हाथ से निकल जाए तो क्या करिएगा ?” तीन चार ने एक साथ हामी भरी। एक ने बात आगे बढ़ाई - “एकदम ठीक कहा जी आपने। पहले ही सावधान रहने में भलाई है। वरना बाद में पछताना ही पड़ता है।” देर से चुप बैठी मिसेज शर्मा बोल पड़ी- “नहीं जी, अभी पूरी दुनियाँ बेइमान नहीं हो गई है। संसार में भले लोग भी मौजूद हैं।”

शर्मा परिवार इस शहर में कुछ वर्षों पहले ही आया था। मिसेज शर्मा घर से कम ही निकलती थी और निकली भी तो बोलती बहुत कम थीं। क्योंकि नई जगह के रीति रिवाजों और व्यवहार को समझने में समय लगता है और इसका सबसे बेहतर तरीका यही है कि चुपचाप सबकी सुनते रहो। कुछ समय बाद बातें स्वतः स्पष्ट होने लगती हैं।

चाय का दौर चल रहा था। कुछ मिसेज शर्मा की ओर मुखातिब हुई और कुछ चाय की चुस्की लेते हुए अपने झमेलों में उलझ गई। मिसेज शर्मा ने अपने एक रिश्तेदार का किस्सा सुनाया- “यह बात हमारे एकदम करीब के रिश्तेदार की है। उनके दादा शहर में आकर बसे थे। दादा ने बारह साल की उम्र में गाँव छोड़ दिया था। खुद अपने दम पर दुमंजला घर शहर में बनाया। बेटों में अपने घर का बंटवारा कर दिया परन्तु अपने भाई से बंटवारा नहीं किया।” एक बहन ने जिज्ञासा जताई- “किसी अच्छे पद पर रहे होंगे।” मिसेज शर्मा- “नहीं कोई पद नहीं था। मन में गुंजाइश थी। वैद्य थे थोड़ा बहुत ज्योतिष जानते थे बस।”

आजादी के बाद जब गाँवों से शहरों की ओर पलायन आरंभ हुआ तो शहरों में निजी रोजगार, दुकान या कारखानों में कार्य करने की नीयत से लोग शहर की ओर आए। इन सभी में पैसा लगाने की आवश्यकता थी जो कि ब्राह्मण के पास न तब था न आज है। उसका स्वरोजगार वैद्यक बना। गाँव में दो-चार दर्जे पास कर लिए फिर किसी गुरूकुल में संस्कृत का आठ-दस साल ज्ञान पा लिया। बुद्धि ठीक चली तो वैद्यक और शास्त्रार्थ दोनों सध गए और यदि मंद बुद्धि रहे तो पूजा-पाठ से ही जीवन-यापन कर लिया। गाँव में किसान था जो उस समय स्वयं दरिद्र नारायण था। वह पैसा क्या देता ? बहुत मजबूरी में दवा ली भी तो वह भी अनाज के बदले और उसे भी छमाही फसल आने तक के लिए उधार कर लिया। थोड़ी पढ़ाई कर लेने पर शहर में बसना लाभ का सौदा था। यहाँ नए-नए रोजगार पनप रहे थे। वस्तु विनिमय के स्थान पर लोग मुद्रा विनिमय करने लगे थे पण्डित, वैद्य और शास्त्री भी कुछ नकद पा जाते थे। इसी आय से रघुवीर जी के दादा ने शहर में मकान बनाया था। दादा का भाई अनपढ़ रहा। गाँव का कच्चा घर और पचास बीघा जमीन ही उस अनपढ़ के जीवन-यापन का सहारा था। इसी को सोचकर दादा जी ने न स्वयं भाई से हिस्सा मांगा न ही उनके बेटों, पोतों ने लोभ किया। शहर में पढ़ाई के साधन ठीक थे। नौकरियाँ भी बढ़ने लगी थीं। उनके परिवार के सब सरकारी नौकरियों में अच्छे-अच्छे पदों पर लग गए।

निर्मला जी गहरी सांस खींचकर बोली- “ऐसे रिश्तेदार तो नसीब से मिलते हैं जी। हमारे ऐसे भाग्य कहाँ।” मिसेज शर्मा ने कहा- “उन्होंने जो किया सो भाई-भाभी के व्यवहार से भी किया।”

“हाँ सो तो है ताली दोनों हाथों बजती है।” रीता ने समर्थन किया।

निर्मला फिर गहरी सांस लेकर बोली- “जी व्यवहार तो हमारे का भी ठीक था। इसी से यकीन जमता चला गया और इतने साल रह लिया। पर असली चेहरा तो बाद के सालों में सामने आया।”

रीना भाभी बोली- “बहन ये भी ठीक ही हुआ जो असलियत पता लग गई। वरना बड़ा नुकसान उठाना पड़ता।”

निर्मला- “सब ऊपर वाले की मेहरबानी समझो वरना हमारे हाथ से बात निकल ही रही थी।”

इधर ये सुनाई गई कहानी पर चर्चा कर रही थी और उधर मिसेज शर्मा नई कहानी को आगे बढ़ा रही थीं और कई बहनें धीरे-धीरे उनकी कहानी की ओर आकर्षित हो रही थीं। अब इनका भी ध्यान उधर गया। मिसेज शर्मा बता रही थीं- “उनका बंटवारा चौथी पीढ़ी में जाकर हुआ। भाई लोग तो जानते ही नहीं थे कि गाँव में उनका कोई हिस्सा भी बाकी है। मेहमान बतौर बचपन में कभी गाँव में गए होंगे। छोटे दो तो हॉस्टल में पढ़े। घर ही मुश्किल से आते थे, गाँव का नाम भर सुना था। कभी शक्ल भी नहीं देखी थी। परन्तु जब गाँव वाली ताई के तीन-चार फोन आए और उन्होंने कहा- “भैया अपना हिस्सा-बाँट ले लो। मैंने बहुत दिन सबका खाया। मुझे मेरे जीते जी मुक्त कर दो।” तब गाँव की जमीन की चर्चा भाइयों में हुई। पिता और चाचा से पूछताछ की गई तो वे बात टालते रहे- “अरे कितना होगा? क्या मिलेगा? यहाँ सब तो है।” ऐसे वाक्य सुनने को मिलते। परन्तु गाँव वाली ताई लगातार फोन कर रही थी। सबकी ओर से एक दिन बड़े भाई ने ताई से बात की- “ताई जी आपके आशीर्वाद से यहाँ सब ठीक है। अब वहाँ जो है उसे आप ही सम्भालो। पिताजी और चाचाजी का मन कुछ लेने का नहीं है फिर थोड़े से के लिए उनके दिल को दुःखाना ठीक नहीं है।” परन्तु ताई सच्चे दिल से हिस्सा देने की बात कह रही थी। यूँ ही टोकने की बात नहीं थी। उन्होंने सबके हिस्सों की नपत कराकर हिसाब लगवाया हुआ था। तुरंत बोल पड़ी- “बात तुम्हारी सच है भैया। आज दुमंजला मकान दिख रहा है पिताजी का बनाया। पर कल की सोचो जब चारों भाई हिस्सा करोगे तो कितना मिलेगा? दो इसमें रहे भी तो दो को तो अलग बनाना ही पड़ेगा। जब से रोहण शहर गया है मैं खूब जान गई हूँ शहर के खर्चों और आमदनी को और जिसे तुम कम समझ रहे हो यह भी एक करोड़ से कम की जायदाद नहीं है। कुछ तो चारों के हिस्से में आएगा ही। घर भी न बने तो जमीन तो खरीद लोगे। नहीं भैया चार पीढ़ी से हमने खाया। प्रभु के आशीर्वाद से रोहण भी अब अफसर है। मैं तो चाहती हूँ उसे उतना ही मिले जितना उसका हिस्सा है। जैसे तुम अपने काम साधोगे वैसे वो भी साधे। मैंने सब नाप नपत करा ली है। तुम भाई इकट्ठा किसी दिन आ जाओ और लिखा पढ़ी कर लो। मेरे देवरों को कह देना यह मेरा आदेश है। जैसे आज तक मेरी बात रखते आए हैं इसे भी मानना है।”

कहानी समाप्त हो गई थी। बहनें, “सही है … ठीक है … ऐसा सब कहीं कहाँ होता है?” जैसे वाक्य बीच-बीच में बोलते हुए सुन रही थीं। रीना भाभी बोली- “ऐसा सब कोई सोचे तो सारे झगड़े-झंझट ही मिट जाएं।” रीता ने प्रतिकार किया- “पर अधिकतर तो माल हड़पने वाले हैं।” निर्मला बोली- “जी सभी तरह के लोग संसार में मौजूद। पर मिलते अपने भाग्य से हैं। हमारे नसीब में जो था वही मिला।” रीना ने बात पूरी की- “सही कहा। नसीब की सारी बात है। अच्छा मिला भी बुरा और बुरा भी अच्छा होते देर नहीं लगती।” इसी के साथ बहनें उठ गई। आयोजन समाप्त हुआ।

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लेखिका परिचय:

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा ने मेरठ विश्वविद्यालय, मेरठ से एम.फिल. की उपाधि 1984 में, तत्पश्चात् पी-एच.डी. की उपाधि 1991 में प्राप्त की। आप निरंतर लेखन कार्य में रत् हैं। डॉ. शर्मा की एक शोध पुस्तक - भारतीय संवतों का इतिहास (1994), एक कहानी संग्रह खो गया गाँव (2010), एक कविता संग्रह जल धारा बहती रहे (2014), एक बाल उपन्यास चतुर राजकुमार (2014), तीन बाल कविता संग्रह, एक बाल लोक कथा संग्रह आदि दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। साथ ही इनके शोध पत्र, पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं, कहानियाँ, लोक कथाएं एवं समसामयिक विषयों पर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपकी बाल कविताओं, परिचर्चाओं एवं वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी, इलाहाबाद एवं इलाहाबाद दूरदर्शन से हुआ है। साथ ही कवि सम्मेलनों व काव्यगोष्ठियों में भागेदारी बनी रही है।

शिक्षा - एम. ए. (प्राचीन इतिहास व हिंदी), बी. एड., एम. फिल., (इतिहास), पी-एच. डी. (इतिहास)

प्रकाशित रचनाएं - भारतीय संवतो का इतिहास (शोध ग्रंथ), एस. एस. पब्लिशर्स, दिल्ली, 1994

खो गया गाँव (कहानी संग्रह), माउण्ट बुक्स, दिल्ली, 2010

पढो-बढो (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

सरोज ने सम्भाला घर (नवसाक्षरों के लिए), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2012

जल धारा बहती रहे (कविता संग्रह), साहित्य संगम, इलाहाबाद, 2014

चतुर राजकुमार (बाल उपन्यास), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विरासत में मिली कहानियाँ (कहानी संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

मैं किशोर हूँ (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

नीड़ सभी का प्यारा है (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

जागो बच्चो (बाल कविता संग्रह), सस्ता साहित्य मण्डल, नई दिल्ली, 2014

विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख पुस्तक समीक्षाएं, कविताएं एवं कहानियाँ प्रकाशित । लगभग 100 बाल कविताएं भी प्रकाशित । दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं काव्यगोष्ठियों में भागीदार।

सम्पर्क -

डॉ. (श्रीमती) अपर्णा शर्मा, “विश्रुत”, 5, एम. आई .जी., गोविंदपुर, निकट अपट्रान चौराहा, इलाहाबाद (उ. प्र.), पिनः 211004, दूरभाषः + 91-0532-2542514 दूरध्वनिः + 91-08005313626 ई-मेलः <draparna85@gmail.com>

(अपर्णा शर्मा)

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