रविवार, 29 मई 2016

व्यंग्य / रूठे-रूठे पिया, मनाऊँ कैसे ? / गोविन्द सेन

मुझे रूठना आता है, लेकिन मनाने की कला नहीं जानता। जबसे कम्प्यूटर देवता मेरे जीवन में आये हैं, उनका संग-साथ पसंद करने लगा हूँ। कम्प्यूटर देवता मेरे पिया बन गए हैं। इनका और मेरा सम्बन्ध दिन-ब-दिन प्रगाढ़ होता जा रहा है । इनके बिना मेरा जिया नहीं लगता। इनके बिना जीने की कल्पना से ही मैं सिहर जाता हूँ ।

हफ्ते भर से कम्प्यूटर देवता रूठे हुए हैं, आप कल्पना कर सकते हैं कि मुझ पर क्या गुजर रही होगी। मेरी बेचैनी चरम बिन्दु पर है। चिंता के सागर में डूबा हुआ हूँ । कम्प्यूटर देवता को कैसे मनाऊँ? सूझ नहीं रहा । झुँझलाता हूँ । श्रीमती जी हौसला देते हुए कह रही हैं-‘रूठा है तो मना लेंगे । इसमें अपसेट होने की जरूरत क्या है।’

अब श्रीमती जी को क्या बताऊँ कि कम्प्यूटर देवता का रूठना मेरे लिए प्राणघातक है । अपसेट क्यों न होऊँ । कम्प्यूटर देवता ने मुझे गुलाम बनाकर कितना बड़ा धोखा दिया है । अब हाथ से लिखना छूट गया है । यदि ये ऐसे ही रूठे रहे तो मेरे तो प्राण ही निकल जायेंगे।

छह महीने का कड़ा परिश्रम करके टाइप करना सिखा था। एक-एक करके अपना सारा साहित्य टाइप करके कम्प्यूटर देवता पर भरोसा कर उनके हवाले कर दिया था । वही साहित्य जो नाचीज की जन्म भर की कमाई थी । ये अलग बात है कि सुधी पाठक इसे पढ़ना गवारा नहीं करते । दूसरों के लिए वह भले ही कूड़ा-करकट था, लेकिन नाचीज के लिए अनमोल धन था।

हमने सुना था कि दुनिया पेपरलेस होने जा रही है। हमने सोचा कि कम्प्यूटर देवता के पास हमारा साहित्य सुरक्षित रहेगा । हम झाँसे में आ गए। हमारी मति मारी गई। हमने सुन्दर और सुवाच्य, हाथ से कागज पर लिखा अपना सारा साहित्य ठण्ड में अग्नि देवता को समर्पित कर दिया।

एक साहित्यिक मित्र ने बताया कि कृतिदेव की बजाय यूनिकोड पर लिखना आसान है। बस रोमन में लिखते जाओ, देवनागरी में कन्वर्ट होता जाएगा । जब प्रयोग किया तो वाकई इसे बेहद आसान पाया । हमें बात जम गई। सोचा, क्यों न कृतिदेव में टाइप किया हुआ सारा यूनिकोड में कन्वर्ट कर लूँ । फिर क्या था। इस मिशन में मैं जी जान से जुट गया ।

क्लिक पर क्लिक करता गया । कम्प्यूटर देवता को मेरी यह छेड़खानी पसंद नहीं आयी। नाराज होकर उन्होंने मेरे सारे साहित्य को एक अज्ञात लिपि में बदल दिया । जब मैं छेड़खानी से बाज नहीं आया तो उन्होंने मेरा साहित्य ही गायब कर दिया । अनजाने में मैंने अपने ही हाथ से अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । लगा मेरे जन्म भर की पूँजी एकाएक खो गई हो ।

साहित्यिक मित्रों के अलावा मेरे कुछ धार्मिक मित्र भी हैं जो अक्सर मुझसे रूठे रहते हैं । हमने अपने एक धार्मिक मित्र को अपने पिया [कम्प्यूटर देवता] के रूठने की समस्या बताई । उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा-‘धर्म-वर्म कुछ मानते नहीं । पूजा-पाठ करते नहीं । मुहूर्त देखकर कम्प्यूटर देवता की स्थापना की नहीं । रक्षा सूत्र भी बाँधा नहीं । कम्प्यूटर देवता रूठेंगे नहीं तो क्या खुश होंगे । यह तो होना ही था ।’ मैं खामोशी से उनकी लताड़ सुनता रहा । आखिर में शायद उन्हें मेरा दयनीय चेहरा देख दया आ गई । बोले-‘चल टेंशन मत ले । एक देवतुल्य सुधारक को भेजता हूँ ।’

पलक पावड़े बिछाकर हमने देवतुल्य सुधारक की प्रतीक्षा की । आकर उन्होंने रूठे हुए कम्प्यूटर देवता का निरीक्षण करके कहा-‘सर! आपने तो कम्प्यूटर देवता को कुछ अधिक ही नाराज कर दिया है । पूरा फार्मेट करना पड़ेगा । सभी फ़ाइलें करप्ट हो गई हैं । अच्छा वाला एंटी वायरस डालना होगा ।आपका साहित्य कम्प्यूटर देवता वापस कर देंगे, इसकी गारंटी तो नहीं दे सकता । हाँ, पूरी कोशिश जरूर करूँगा ।’ उनकी बहुत सारी बातें मुझ मतिमंद की समझ में नहीं आ रही थी । आज तक सुना था कि अफसर और बाबू ही करप्ट होते हैं । लेकिन सुधारक जी बता रहे थे कि फ़ाइलें करप्ट हो गई हैं ।

खैर ! अब हमने सब देवतुल्य सुधारक पर छोड़ दिया है । सच्चे मन से प्रार्थना कर रहे हैं कि कम्प्यूटर देवता मान जाएँ और हमें हमारा साहित्य यथावत लौटा दें ताकि हम सुख से मर तो सकें।

-राधारमण कालोनी, मनावर, जिला-धार [म.प्र.] पिन-454446 मोब.09893010439

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