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मन्दिरों की मर्यादा पालें - डॉ. दीपक आचार्य

- डॉ.  दीपक आचार्य

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मन्दिर भगवान के धाम हैं जहाँ चरम शांति, सुकून और आत्मतोष प्राप्त होता है। संसार की सारी विषमताओं, समस्याओं और पीड़ाओं से परेशान होकर जो मन्दिर आता है उसे आत्म आनंद की अनुभूति प्राप्त होती है और नई रोशनी एवं राहत पाकर ही लौटता है।

लेकिन मन्दिर वही असली हैं जो वास्तविक हैं, मन्दिर निर्माण के वास्तु, शास्त्रों की मर्यादाओं और जागृत दैव प्रतिमाओं से युक्त हैं। जिनमें असीम शांति, सुकून  और आनंद है। जिनमें परिक्रमा स्थल है, पास में जलाशय, हरीतिमा से भरे पेड़ और खुले परिसर हैं।

भगवान को पंच तत्वों का पूरा आभामण्डल चाहिए। कोई देवी-देवता अकेले नहीं रहते बल्कि अपने यंत्र के अनुरूप सभी उपदेव-उप देवियां, गण आदि पूरा परिवार रहता है। जहां भगवान की मूर्ति तो है लेकिन दैव परिवार के लिए कोई स्थान नहीं है वहाँ प्रधान देवता या प्रधान देवी भी नहीं रहते।

इन मन्दिरों में केवल पत्थर की मूर्तियां निष्प्राण पड़ी रहती हैं और किसी काम की नहीं होती चाहे कितना ही भजन-पूजन और अनुष्ठान कर लिया जाए, घण्टों सत्संग होता रहे, हजारों लोग रोजाना क्यों न आते-जाते रहें।

ये केवल दर्शनीय हो सकते हैं, श्रद्धा प्रवाह के अंग नहीं। आजकल मन्दिरों के अधिकांश हिस्से दुकानों, किराये के स्थलों और व्यवसायिक परिसरों में तब्दील होते जा रहे हैं। कई मूर्ख पुजारी और धर्म के धंधेबाज मंत्र-श्लोक और स्तुतियां बजाते रहते हैं, उससे भी मन्दिर की शांति भंग हुई है।

ऎसे में शांति भंग होने और भगवान के लायक अनुकूल वातावरण नहीं होने से अधिकांश देवालयों को ओज भंग हो गया है और ये केवल दिखावे मात्र के मन्दिर होकर रह गए हैं। इन मन्दिरों में भगवान की सेवा-पूजा के नाम पर जो कुछ होता है, जितने प्रकार के उत्सव मनाए जाते हैं वे सब भगवान की कमायी से मनाए जाते हैं।

घोर कलियुग देखियें कि इन मन्दिरों में धर्म के नाम पर जो कुछ होता है वह सब कुछ भगवान की कमाई पर। मन्दिरों की दुकानों और व्यवसायिक-आवासीय परिसरों से प्राप्त किराये पर।

ये न हो तो भगवान भोग को तरस जाएं क्योंकि धर्म के नाम पर हम सभी परंपरागत गरीब लोग आखिर कितना कुछ करें। धर्म को हमने केवल मूर्तियों और मन्दिरों की स्थापना तक ही सीमित कर दिया है, बाकी सारे काम गौण हो गए हैं।

हम मन्दिर भी बनाते हैं तो पुराने मन्दिर के परिसरों में ही पड़ी जमीन पर। हम मूर्तियां भी स्थापित करते हैं तो पहले से बने मन्दिरों में किसी कोने में या पास ही। जबकि मन्दिर निर्माण और मूर्ति स्थापना का कार्य खुद की जमीन खरीद कर भूमि पूजन होने के बाद होना चाहिए।

पहले से बने मन्दिरों में अन्य मूर्तियों की स्थापना  मन्दिरों के वास्तु भंग और मर्यादाहीनता की श्रेणी में आती है। आजकल धर्म के नाम पर ढोंग-पाखण्ड करने वाले बहुत सारे धार्मिक लोग मन्दिरों में प्रधान देवता के साथ-साथ सांई और दूसरे देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित कर देते हैं या तस्वीरें लटका देते हैं।

यह गलत परंपरा है और उस प्रधान देवता का अपमान है जिसके नाम पर मन्दिर को प्राचीनकाल से जाना जाता रहा है। हमारे किसी पड़ोसी का फोटो कोई आकर हमारे ड्राईंग रूम, बैड़ रूम, कीचन या परिसरों में कहीं लगा जाए तो हम बर्दाश्त करेंगे कभी? यह प्रश्न हम सभी श्रद्धावानों को अपने आप से पूछना चाहिए।

आजकल पुजारियों और धर्म के धंधेबाजों ने मन्दिरों को भी धंधा बना रखा है। कोई शिवालय है तो उसकी विशेष पूजा और चढ़ावे की आवक सोमवार, श्रावण मास या शिवरात्रि के दिनों में ही होगी। शेष दिनों में मंदी का दौर रहता है।

इसे देखते हुए अब पुजारियों और धर्म के धंधेबाजों ने शिवालयों में देवियों की मूर्तियां लगवा दी हैं, गणेशात्सव के दिनों में गणपति प्रतिमा भी स्थापित कर दी जाती है, सांई की मूर्ति भी लगवा दी है।

और तो और जब से शनि का भय पांव पसारने लगा है तब से कई सारे मन्दिरों में शनि की मूर्तियां लग गई हैं। यानि की मन्दिर किसी भी देवी-देवता का हो, उसमें अब मिक्चर कल्चर देखने में आ रही है।

और यह सब केवल इसीलिए कि मन्दिर की आवक हमेशा बनी रहे। बहाना कोई सा क्यों न हो।  कई मन्दिरों में प्रधान देवी-देवता की मूर्तियों के साथ किसी बाबाजी, गुरुजी के नाम से प्रसिद्ध किसी न किसी संत-महात्मा की या पितरों की मूर्तियां या तस्वीरें भी सुशोभित होने लगी हैं।

आखिर हम धर्म को कहां ले जा रहे हैं। भगवान का मुकाबला किससे हो सकता है, वह सर्वशक्तिमान है। मरणधर्मा जीवित इंसानों की तस्वीरें साथ लगाकर हम भगवान का अपमान ही कर रहे हैं। और मरे हुए लोगों की तस्वीरें भी साथ नहीं लगनी चाहिएं।

कई सारे ढोंगी और धूर्त बाबा लोग अपनी फोटो बनवाकर मन्दिरों में रखवाने में आनंद महसूस करते हैं। अपने आपको भगवान के बराबर देखना और दिखाना चाहते हैं। 

इन सभी धर्म विरूद्ध हालातों में भगवान हमसे नाराज रहने लगा है। सारी प्राकृतिक आपदाओं, बीमारियों और समस्याओं का एक मुख्य कारण यह भी है। मन्दिरों में प्रसाद, देवी-देवता को चढ़ा श्रृृंगार का सामान आदि सब कुछ बिक रहा है। निर्माल्य तक बिकने लगा है। जिस मन्दिर में प्रसार बिकता है वह मन्दिर नहीं कहा जा सकता।

धर्म के नाम पर अपने आपको विद्वान बताने वाले आचार्यों, पण्डितों, यजमानों को मुण्डने वाले सभी लोगों को चाहिए कि वे अपने स्वार्थ में ही नहीं रमे रहें, धर्म ही सही-सही व्याख्या करें, लोगों का मार्गदर्शन करें और खुद भी धर्माचरण करते हुए उन धूर्तताओं से समाज को बचाएं जो कि इन दिनों मन्दिरों में हो रही है।

यही वजह है कि नई पीढ़ी धर्म के मूल संस्कारों से हीन हो गई है क्योंकि उसे ये पाखण्डी बाबा और पैसों के पीछे भागते हुए धर्म के धंधेबाज ही दिखते हैं जो सब कुछ जानते हुए भी चुपचाप बैठे हुए हैं।

इनमें न सच सुनने का साहस है न सच कह पाने का। जहां इनके कुकर्मों पर अंगुली उठाओ, सारे एक साथ जमा होकर भौं-भौं करने लगते हैं।  धर्म के मूल मर्म को जानें, ईश्वर को साक्षी रखकर कर्म करें और लोभ-लालच तथा धंधेबाजी मानसिकता को त्याग कर समाज का मार्गदर्शन करें।

ऎसा आज नहीं हुआ तो हमारे मन्दिरों से भगवान का रिश्ता टूट जाएगा और हम सारे खुद भी त्रिशंकु बने रहेंगे और आने वाली पीढ़ियां हमें कोसती रहेंगी। पर हम निर्लज्जों को क्या फरक पड़ता है, हम तो धर्म को धंधा मानते हुए ही आगे बढ़ रहे हैं। भगवान और धर्म के नाम पर किसी को भी उल्लू बनाया जा सकता है, यह अचूक मंत्र सारे शातिरों के जीवन का मूल मंत्र हो चला है। इनमें सांसारिक भी हैं और संसार को त्याग कर बैठे वैभवशाली, ऎशोआरामी बाबा लोग भी।

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