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व्यंग्य राग (२) सोने का अर्थ-शास्त्र / डा. सुरेन्द्र वर्मा

सोने का अर्थ-शास्त्र मुझे आजतक समझ में नहीं आया, फिर वह सोना चाहे धातु वाला सोना हो चाहे जाग्रत अवस्था का विलोम हो. सोना दिन ब दिन मंहगा होता चला जा रहा है. सत्ताईस -अट्ठाईस हज़ार तक पहुँच गया . फिर लुढ़का तो लुढ़कता ही चला गया. चार-पांच दिन में चार पांच हज़ार लुढ़क गया. अजब तमाशा है ! यही हाल जाग्रत अवस्था के विलोम, सोने, का है. कभी नींद आ जाती है, कभी नहीं आती. आती तो खूब आती है, नहीं आती तो आने का नाम ही नहीं लेती.

जब आती है तो व्यक्ति के पूरे वजूद पर छा जाती है. लबादे की तरह उसके व्यक्तित्व को ढँक लेती है. बड़ी रहम दिल है. भूखे के लिए भोजन बन जाती है, प्यासे के लिए पानी; ठण्ड में गर्माहट और गरमी में ठंडक देती है. नींद में अनिकेतन को घर मिल जाता है, मित्र-विहीनों को मित्र मिल जाते हैं. थके हुओं को आराम मिलता है और चोट खाए लोगों के लिए नीद मलहम का काम करती है. सोते वक्त बदकिस्मत, खुशकिस्मत हो जाते हैं. नींद के आगोश में सब बराबर हो जाते हैं. प्रजातंत्र के तीन मूल्यों में से एक मूल्य समानता का है. सोते समय नींद के आगोश में सभी बराबर हैं. राजा और रंक का, अमीर और गरीब का, भेद मिट जाता है. सोते में मूर्ख विद्वत्ता,और विद्वान मूर्खता दिखाने लगता है. समानता के अतिरिक्त प्रजातंत्र की एक और कद्र, स्वतंत्रता, का भी नींद में समावेश रहता है. जिस तरह मुर्दे की आत्मा मरने के बाद शरीर छोड़ देती है और भटकने के लिए स्वतन्त्र हो जाती है, सोते आदमी की आत्मा भी पूरी तरह स्वच्छंद हो जाती है. वह कहीं भी भटक सकती है. मौत हमें परलोक ले जाती है, नींद हमें इह-लोक में ही मौत का मज़ा देती है. नींद की तुलना जो अक्सर मौत से की जाती है, बिल्कुल सही है. सोते हुए आदमी और मरे हुए आदमी में कोई अंतर नहीं रहता. बस, मरा हुआ आदमी कभी जगता नहीं.

सोने का कोई समय निश्चित नहीं होता. समय-असमय आप कभी भी सो सकते हैं नींद भला कब बुरी लगती है ? रात तो सोने के लिए है ही सुबह की एक झपकी भी थोड़ा और तरोताजा कर देती है. भोजनोपरांत दोपहर का अल्प विश्राम आदमी को स्फूर्ति देता है. दफ्तर से लौट कर एक नींद निकालना किसे नापसंद हो सकता है ? शांत वातावरण सोने के लिए सहायक है, माना. पर नींद का मारा शोरगुल में भी आसानी से सो सकता है. भाषण सुनते समय न जाने कितने श्रोता, श्रोता नहीं रह पाते- 'सोता' हो जाते हैं. नेता जी भाषण देते रहते हैं, श्रोता सोते रहते हैं. संसद की कार्यवाही चलती रहती है, सांसद झपकियाँ लेते रहते हैं. आजकल वे मुख्यत: दो ही काम करते हैं - या तो सोते हैं या चिल्लाते हैं. संगीत की महफिलों में संगीत-प्रेमी संगीत सुनते-न -सुनते नींद में डूब जाते हैं. संगीत उन्हें थपकियाँ देकर सुलाने का काम करता है. छात्र अपनी कक्षाओं में अक्सर सोते हुए देखे जा सकते हैं. अध्यापक द्वारा पढ़ाया जाना उन्हें सोने से पहले दादी माँ की कहानी सुनना जैसा लगता है. धर्म भीरु लोग धार्मिक प्रवचन सुनने जाते हैं, घर में इन बड़े-बूढों को नींद नहीं आती. सो प्रवचन सुनते सुनते सो जाते हैं.

मुबारक हैं वे जिन्हें नींद आती है. हम हैं की रात रात भर जागते रहते हैं. तारे गिनते रहते हैं. मन्त्र पढ़ते रहते हैं. अनुलोम-विलोम करते रहते हैं. करबटें बदलते रहते हैं, और नींद नहीं आती. आज के इस तनाव भरे माहौल में नींद आ जाना, सोना खरीदना जैसा हो गया है. पच्चीस-तीस हज़ार खर्च करके दस ग्राम सोना तो शायद आप खरीद भी लें, लेकिन नींद खरीद पाना संभव नहीं है. हाँ, आप चाहें तो जागते रह कर भी सो सकते हैं. ऐसे में भला आपको कौन जगा सकता है? कितनी ही ऐसी समस्याएँ हैं की जिन्हें जानते हुए भी उनपर सरकार सोती रहती है/ सो जाती है. आप उसे जगाने के लिए फिर कितना ही हल्ला क्यों न मचाएं, हल्ला बोल ही क्यों न दें, सरकार जागती नहीं. आप भले ही हल्ला मचाते मचाते थक कर सो जाएं.

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी,/ १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१ मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग surendraverma389.blogspot.in

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