बुधवार, 18 मई 2016

जुड़े रहें जड़ों से - डॉ. दीपक आचार्य

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आधार बिना सब निराधार है चाहे वह जड़ हो अथवा जीवन्त। दुनिया में जिसका लौकिक अस्तित्व है वह सब कुछ किसी न किसी आधार से बंधा है।

जो शुद्ध, तात्विक और शाश्वत है उसका अपना सशक्त आधार है जिससे जुड़ा रह कर वह अपनी पूर्ण मौलिकता के साथ प्रभाव दिखाता है और उपयोगिता सिद्ध करता है।

हर पदार्थ, व्यक्ति, समुदाय और देश की अपनी जड़ें होती हैं जिन्हें सदियां सिंचती रहकर आगे बढ़ाती और व्यापकता देती रहती हैं। सहस्रार तक की यात्रा वही परिपूर्ण कर सकता है जिसका मूलाधार जागृत हो।

मूलाधार अपने आप में पदार्थ तत्व से ऊपर उठने का संकेत करता है और यह भी इंगित करता है कि सब कुछ होते हुए भी अनासक्त भाव से परम लक्ष्य की ओर ऊध्र्वगमन किया जा सकता है।

जड़ें ही बताती हैं अपने अतीत का वैभव, दिव्य वैचारिक और पारिवारिक भावभूमि, लोक से आलोक तक के सारे तंतुओं का पता  और इतिहास से लेकर वर्तमान और भविष्य तक का सटीक और खरा-खरा दिग्दर्शन।

जड़ों से जुड़े रहना भी अपने आप में साहस का काम है वरना वक्त का बहता दरिया बहुत कुछ कर सकता है। बड़े-बड़े वेग उखाड़ कर ले जाते हैं उन महावृक्षों को जो बाढ़ की चपेट में आ जाया करते हैं।

यह बाढ़ संस्कारहीनता की हो सकती है, लोभ-लालच, प्रलोभनों और दबाव की हो सकती है, कंचन और कामिनियों से लेकर उन सारे भोग-विलासी तीव्रतर और अदम्य वेगों की हो सकती है जो इंसान की कमजोरियों का सदियों से पर्याय रहे हैं।

बाढ़ भी न हो तो जमाने की हवाएँ उखाड़ कर धराशायी कर सकती हैं। हवाओं का जोर किसी को नहीं बख्शता। जब समय अच्छा आता है तब हवाएं सुगंध के कतरों के साथ यश का आनंद देती हैं और जब कभी समय ठीक न  हो तब कभी लू के थपेड़े मार-मार कर बदहवास कर देती हैं, कभी हाड़ कँपाती शीत से हड््िडयों के पार होने की कोशिश में जी तोड़ लगी रहती हैं और उड़ा ले जाती हैं उन गुमनाम क्षितिजों की ओर जहाँ जाकर कोई वापस नहीं लौट सका है।

कभी किसी ढपोड़शंख के चक्कर में आकर हम खुद हवाओं में उड़ने लगते हैं और यह सोचकर दंभ का दामन थाम लिया करते हैं कि अब आयन्दा हमें जमीन से कोई सरोकार हीं नहीं रहने वाला हो।

कभी हथेली में दिल्ली बताने वाले बहुत बड़े कहे जाने वाले आदमियों के चक्कर में आकर स्वधर्म, स्वकर्म और स्व वर्चस्व छोड़कर उन धाराओं में शामिल हो जाते हैं जिनसे हमारे पुरखों ने भी खूब परहेज किया और दूर से दूर ही रहे, लाख लोभ-लालच और दबाव सामने आए, पर नहीं झुके, न वैसा कुछ स्वीकारा जो आत्मा को गँवारा नहीं था।

यही कारण है कि हम किसी न किसी ऎसे अदृृश्य तंतु से जुड़े रहते हुए सदियों और युगों का सफर तय करते गए और आज भी पूरी मजबूती से अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। पर अब सब तरफ हवाओं का असर होने लगा है।

अच्छे-अच्छे संस्कारवान लोग किसी न किसी लालच में सब कुछ गंवा कर अंधानुचरी करने लगे हैं, भिखारियों की तरह हाथ पसारे आगे बढ़ रहे हैं। अपना सब कुछ छोड़ छुड़ा कर ये सारे त्रिशंकु बने हुए जाने कहां-कहां डोल रहे हैं।

अब कोई नहीं रहा जो इन्हें संभाल सके। एक बार जो जड़ों से टूटे तो फिर कहीं के नहीं रहे। तिनकों की तरह प्रदूषित वेगों के साथ बहते ही चले गए और उन मुकामों पर पहुंच गए जहां जाकर सब कुछ भूल गए कि हम कौन थे, कहाँ थे और कहाँ आ गए। 

हमें पता ही नहीं रहा कि हम क्या करने आए थे और क्या कुछ कर रहे हैं। बात साधना की हो तब भी वे लोग मतिभ्रम और मूर्खताओं के शिकार होकर अवसाद में आ जाते हैं जिनका अर्थिंग पॉवर मजबूत नहीं है अर्थात अपनी परंपरागत दैवी ऊर्जा को बरकरार रखने में विफल हैं। 

एक बार अर्थिंग न रहा तो फिर करोड़ों के संसाधन किस काम के, एक झटके में सारे उड़ जाने वाले हैं। हमारी यही स्थिति आजकल हो रही है। अर्थिंग पॉवर खोते जा रहे हैं या उसमें हमारा विश्वास नहीं रहा। और यही वजह है कि हम भटकाव के उस दौर से गुजर रहे हैं जहाँ हमारा कोई ठौर नहीं है।

खुद की जड़ों का तिरस्कार करने के बाद हमारा कोई नहीं रहा। न वंश परंपरा से नाता रहा, न जमीन से, न संस्कारों से। हर तरह से हम स्वच्छन्द हो गए है। जो सामने मिलता है, अपने काम का लगता है उसे अपना मान लेते हैं, फिर थोड़ी खटपट हो जाने पर छोड़ देते हैं।

इसी तरह पेण्डुलम जैसी जिन्दगी जीते हुए हम कहीं के नहीं रहे हैं।  वे लोग धन्य हैं जो अब भी जड़ों से जुडे हुए हैं। असल में ये ही लोग सौभाग्यशाली हैं।

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