विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

उनसे सीखें जो असफल हो गए हैं - डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

दुनिया भर में जो लोग असफल हुए हैं वे सारे के सारे किसी न किसी मामले में हुनरमंद जरूर हैं, जीवों और जगत के लिए उपयोगी भी हैं। इनसे भी बड़ी बात यह है कि ये असफल लोग सफलता दिलाने वाले कारक भी हैं। इन लोगों को किसी भी दृष्टि से कमजोर या हीन नहीं माना जा सकता क्योंकि ये वे ही लोग हैं जिन्होंने सफलता पाने के यत्न किए, खूब परिश्रम किया लेकिन भाग्य या सम सामयिक विषमताओं अथवा किसी न किसी प्रकार के अभावों की वजह से सफलता का वरण नहीं कर सके।

यह भी जरूरी नहीं है कि जिन लोगों को हम पूर्ण सफल मानते हैं वे सर्वथा योग्य हों ही। यह भी जरूरी नहीं कि जो लोग किसी न किसी कारणवश असफल हो गए हैं वे हुनरमंद न हों। असल में वे सारे लोग भी मेधावी और कर्मशील हैं, हुनरमंद हैं और इनकी प्रतिभाओं को नकारा नहीं जा सकता क्योंकि वे प्रतिस्पर्धा में शामिल थे।

भाग्य और दूसरे प्रकार के घोषित-अघोषित एवं गोपनीय कारणों की वजह से वंचित होकर असफलता हाथ लगी हो या अथवा आवश्यकता के अनुपात में आशार्थियों की संख्या अत्यधिक हो, यह स्वाभाविक है। बावजूद इन सबके प्रतिभाओं में न्यूनाधिक आंशिक अंतर ही रहता है और इसलिए जो लोग सफलता पा लेते हैं उन लोगों की अहमियत को स्वीकार किया जाना चाहिए और वंचित रह गए लोगों की भी प्रतिभाओं को खुले मन से स्वीकार किया जाना चाहिए।

कोई पद, प्रतिष्ठा या ऊँचा वेतनमान, गाड़ी-घोड़े और रुतबा किसी व्यक्ति की प्रतिभा का कोई मानदण्ड नहीं होता। एक सामान्य से सामान्य, ठेठ देहाती और अनपढ़ भी मेधावी होता है और उसकी प्रतिभा का कोई मुकाबला नहीं।

आजकल डिग्रियों की चर्चाएं जोरों पर हैं। आदमी कितना खरा सोना हो, वैश्विक कद रखता हो, करोड़ों लोगों के दिलों पर राज करता हो,  उसकी कद्र किसी को नहीं है पर डिग्री को लेकर बवाल मचाने वाले रोज कुछ न कुछ धींगामस्ती कर ही रहे हैं।

जरा उन लोगों की प्रतिभा भी देख लीजिएं जो बड़ी से बड़ी डिग्रियों को लटकाए और सजाये फिर रहे हैं, वे कौनसा समाज या देश का भला कर पाए हैं। बल्कि उन डिग्री वालों की कहानियां और समाज तथा देश के लिए उनके अवदान पर चिन्तन किया जाए तो शर्म के मारे रोने को जी चाहता है। 

ये ही लोग विराट व्यक्तित्वों को नीचा दिखाने और अपने वजूद को हमेशा किसी न किसी तरह कायम रखने के लिए देश को फिजूल की चर्चाओं का रसपान करने के अवसर देते रहते हैं और फिर चुप हो जाते हैं।

जो लोग किसी न किसी कारण से सफलता प्राप्त नहीं कर पाए हैं वे अपने आपको हीन न मानें बल्कि निरन्तर आगे बढ़ने के प्रयास करते रहें, एक न एक दिन सफलता प्राप्त होकर ही रहेगी।

देश में बहुत बड़ी संख्या में प्रतिभाएं हैं जो इस श्रेणी में शुमार हैं। इन लोगों की प्रतिभाएं किसी न किसी रूप में समाज और देश को मिल जाएं तो देश स्वर्ग हो जाए, विश्व गुरु बनने में भी देर न लगे।

जो लोग सफलता पाने के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं उन्हें चाहिए कि वे सफल हो चुके लोगों की अपेक्षा उन लोगों से सीखें जो असफल हो गए हैं। कारण साफ है कि जो असफल हो गए हैं उनके साथ कोई न कोई कारण जरूर रहा है तभी औरों से कम रहे।

इस कमी के कारणों को तलाशा जाना चाहिए। इनकी असफलताओं के पीछे छिपे कारणों को हम जान लें तो कोई कारण नहीं कि हम सफल न हो पाएं। असफलता के पीछे कई सारे कारण गिनाए जा सकते हैं। जैसे पढ़ाई-लिखाई में  पर्याप्त समय नहीं  देकर आलस्य और प्रमाद अपना लेना, आज का काम कल-परसों पर टालते रहना, शोर्ट कट तलाशने के फेर में ईमानदारी और निष्ठा को भुला देना, दूसरों के मुकाबले जरूरत से ज्यादा सोते रहना, असात्विक खान-पान-व्यवहार, नकारात्मकता और हताशा का ही चिन्तन करते रहना, आत्महीनता का भाव लाना, मन-शरीर और कर्म के प्रति मानवजनित लापरवाही, एकाग्रता, तल्लीनता और लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण का अभाव और इस जैसे खूब सारे कारणों को गिनाया जा सकता है।

असफल लोग जिन चीजों, कामों और स्वभाव को जानबूझकर या प्रमादवश छोड़ दिया करते हैं उन कारकों को अपनाने की कोशिश कर लेने वालों की कभी हार नहीं होती। इसलिए असफल लोगों से सीखें और उनके द्वारा छोड़ दी गई बातों को अपना लें तो आशातीत सफलता किसी का रास्ता नहीं रोक सकती। ऎसा करने वाला इंसान सफलता की गारंटी पा लेता है। 

जो असफल हो चुके हैं वे भी इस बात का चिन्तन करें और उन बातों को अपनाएं जो पिछले समय  छोड़ दी थीं और जिन्हें व्यक्तित्व विकास या सफलता के लिए नितान्त अनिवार्य माना गया था। 

संसार में कोई भी इंसान फेल नहीं होता, वह केवल अवसर चूक जाता है। सब कुछ समय सापेक्ष है।  हर इंसान का अपना समय होता है जिसमें वह यथेष्ट को प्राप्त कर सकता है। समय चूक जाने के बाद पछतावा ही शेष बचा रहता है।

असफलता कोई अभिशाप या स्थायी भाव नहीं है। वह यही बताती है कि प्यासा कूए तक तो पहुंच गया मगर तनिक सी कोई चूक हो गई इसलिए प्यासा ही रह गया। इस चूक को जानें और इसे छोड़ दें तो अपने आप सफलताओं के शिखर हमारे अधिकार में होंगे।

---000---

रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget