रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

शबनम शर्मा की ताज़ा कविताएँ

image

नए ख्वाब

आज मैं गुजरी उस सड़क से
कराहती सी आवाज़ थी आई
मैदान वो रोया, पीपल चीखा
‘‘बोलो मेरे बच्चे कहाँ है भाई?’’
    इक्के-दुक्के बच्चे बैठे हाथों में
    मोबाइल था भाई,
    मैदानों की सारी खुशियाँ इस
    डिबिया ने बेचकर खाई।
घास उग आई, कूड़ा भर गया
कहाँ रह गई अब वो माँ जाई
जो कहती थी अपने लल्ला को
पल भर जा क्यूं न हवा मैदान की खाई?
    खड़ी रही मैं मूक सी मूर्त
    देती क्या मैं उसे जवाब
    पूछते हैं जब मेरे ही बच्चे
    खेल मैदान के, उनका ख्वाब
    टी.वी., मोबाइल आज के खेल
    रुक गई भईया बच्चों की रेल।


 


दरवाज़े पर खड़ी लड़की
ससुराल से प्रताड़ित,
मन से बेचैन,
शरीर से शिथिल,
काम की मारी,
घर से निकाली गई,
इक म़द़म सी आस,
दिल में दबाए,
भारी कदमों से मायके
के दरवाजे पर खड़ी
इन्तज़ार करती
उसे अन्दर बुलाए जाने का
देखकर भाँप लिए गए हालात,
शुरु हो गई सबकी दलीलें
भाई, भाभी के डर से,
माँ, पिता के डर से,
कोने में खड़ी ताकती रही,
गूंगी, बहरी व मूक सी,
याद आया उसे वो ज़माना,
जब वो आई थी ब्याही
इस चौखट में,
परीक्षा की घड़ियाँ समाप्त
होने का नाम ही न ले रही थी,
हर नज़र वक्त ये ही चीखता,
‘‘देखते हैं कैसे कर पाएगी?’’
चुपचाप अंधेरे मुँह उठना,
देर को सोना, हर किसी
की ज़रूरतों को पूरा करना
फिर भी यही सुनना, ‘‘चार
रोटी खायेगी, तो कुछ काम तो करे।’’
अविरल आँसू बहे हैं उसके।
धीरे-धीरे, विश्वास की चाल,
माँ ने बेटी का हाथ पकड़ा,
अन्दर लाई, बिठाया और कुछ समझाया
भारत की नारी जब लाँघती चौखट
तो नहीं आती लौटकर कभी,
उसे बनानी है अपनी वह दहलीज़,
चली गई वापस बटोर कर आँसू,
लेकर हिदायतें वह अपने घर,
देखते रह गये भाई, बापू व
उस मकान की दिवारें।

 


वो खेल का मैदान
खेलते थे हम कभी,
कबड्डी, फुटबाल,
लम्बी दौड़ व लंगड़ी टाँग,
बैठते थे घंटो, बतियाते
थे सब बातें,
कभी लड़ पड़ते, तो कभी
सुलझे से मुस्कुराते।
    होते ही शाम, निकल पड़ते, सब
    एक-दूसरे को बुला-बुलाकर,
    पहुँच जाते इस मैदान में
    व देखते कौन नहीं आया,
    भेजते छुटकू को उसे घर से बुलाने
    ग़र बीमार होता तो पूछने जाते,
    वरन् पकड़ ले ही आते।
सारा मैदान खुशी के मारे,
ठहाके भरता, गिर जाता कोई
तो उसे मरह़म भी करता
हो जाता अंधेरा, पर खत्म
न होता खेल, बनाते रहते
चलाते रहते वो नन्हें अपनी रेल।
    घर से कई संदेशे आते
    अंधेरा घिर आया, घर वापस आओ
    ‘‘बस 2 मिनट और, अभी आता हूँ।’’
    कह लौटा देते, भईया वापस जाओ।

 

 

मैं क्या हूँ?
ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव में,
नज़र आईं, ज़िन्दगी की संकरी
गलियाँ, पथरीले रास्ते,
भीगी छत और गरम लू से
कई हादसे।
क्यूँ आखिर क्यूँ, सबकी उम्मीदें
टिक जातीं इक औरत पर,
चाहते, वह वही करे, जो वो चाहें,
बोले सिर्फ वो शब्द, जो उन्हें भाएं,
पहने वो कपड़े, खाये वो खाना,
जाए उस जगह, सोचे वो सोच,
जो सदैव उनके हक में हो,
नहीं उसका हँसना-रोना-सोना
भी प्रतिबंधित है, कुछ भी तो
अपना नहीं, टटोलती हूँ खुद को,
अनगिनत सवाल खड़े हो जाते
मेरे सामने लगता इस जन्म में
तो खुद से मुलाकात न होगी
क्योंकि मैं एक औरत हूँ
फिर भी कभी वक्त मिला
तो बताऊँगी, सोचूँगी कि
‘‘मैं क्या हूँ?’’

 

 

 

 

माँ का घर
दूर अति दूर से
आई बेटी,
घर के आँगन में आते ही,
बन जाती नन्हीं चिड़िया।
माँ आज भी पुकारती उसे,
उसी नाम से, जो सहेजा था
उसके पैदा होने से पहले।
पुकार माँ की
ले आती अपने संग
अनगिनत यादें,
जिन्हें रखा है उसने
संभालकर दिल के तहखाने में,
भाई का उसका नाम बिगाड़कर
बुलाना,
मुहल्ले वालों का उस नाम
को छोटा करना
और बापू का साथ में
‘बेटा’ लगाकर बुलाना।
कितनी चिढ़ जाती थी
जब पता चला था
कॉलेज में दोस्तों को
उसका वो नाम।
क्यूँ तड़पी है आज
जब पुकारा माँ ने
ले उसका वो बचपन
का नाम,
क्यूँ सुनना चाहती है
बार-बार वो
बचपन का उसका वो नाम।

शबनम शर्मा ] अनमोल कंुज, पुलिस चैकी के पीछे, मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.
मोब. – ०९८१६८३८९०९, ०९६३८५६९२३

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]
[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget