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व्यंग्य-राग (८) बयानों का बयावान / डा. सुरेन्द्र वर्मा

बयान देने के लिए सिर्फ ज़बान की आवश्यकता होती है. जो भी ज़बान पर आया दे मारा. बयान हो गया. चाहें तो इसे लिखकर दे दें या ज़बानी कह दें. ज़बानी कहने में ज्यादह सुविधा रहती है. ज़रुरत पड़े तो बयान पलटा जा सकता है. कहा जा सकता है कि मैंने यह कहा ही नहीं था. मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है. राजनीति में यह खेल धड़ल्ले से खेला जाता है.

वैसे बयान कई तरह के होते हैं. अदालती बयान तथ्यों का वह विवरण है जो वादी या प्रतिवादी द्वारा लिखकर या ज़बानी प्रस्तुत किया जाता है.यह बेशक तथ्यों का विवरण कहा तो जाता है लेकिन खुदा ही जानता है कि यह कितना तथ्यों का विवरण है और कितना झूठ का पुलंदा है. एक बयान तहरीरी होता है. यह वह लिखा हुआ बयान है जो अदालत में किसी बयान के जवाब में दाखिल किया जाता है. इसी तरह एक ताईदी बयान भी होता है जो दूसरे के बयान की पुष्टि करने वाला कथन है | अब यह अदालत का काम होता है कि बयान, बयान तहरीरी या बयान ताईदी की जांच पड़ताल करे |

अरबी और फारसी में बयान साहित्यशास्त्र की एक शाखा भी है | हिन्दी में साहित्य की ऐसी कोई शाखा नहीं है | यहाँ साहित्य में अधिकतर बयानबाज़ी होती भी नहीं | यहाँ बयानों के बड़े बड़े पुलंदे हैं जिन्हें “वाद’ कहते हैं.| छायावाद, प्रगतिवाद, रहस्यवाद, प्रयोगवाद इत्यादि वास्तव में बयानों के पुलंदे ही हैं |

राजनीतिक बयान अलग ही किस्म के होते हैं. इन्हें पुलंदों में बांधा नहीं जा सकता | ये फ्री- फ्लोटिंग हैं. जैसी लहर होती है वैसे ही, उसी दिशा में, बयान तैरते रहते हैं | और क्योंकि राजनीति में कई लहरें कई दिशाओं में साथ साथ लहराती रहती हैं इसलिए वहां बयानबाजी भी सुनिश्चित नहीं की जा सकती | अलग अलग राजनैतिक दलों के अलग अलग बयान होते हैं, एक ही राजनैतिक दल में कई एक-दूसरे को काटते-लांघते, बयान हो सकते हैं. यहाँ तक कि एक ही व्यक्ति का बयान एक सा नहीं रहता | सुविधानुसार वह उसे तोड़ता मरोड़ता रहता है | राजनीति की यही खूबसूरती है | यही उसके आकर्षण का केंद्र है | आप न तो किसी बयान को पकड़ सकते हैं न पकडे बैठे रह सकते है | राजनीति का एक बड़ा मूल्य स्वतंत्रता है, बयानों की स्वतंत्रता |

राजनीति में बयानों का कोई व्याकरण नहीं बनाया जा सकता | यहाँ संज्ञाएँ क्रियाओं में और क्रियाएं संज्ञाओं में तब्दील हो जाती है. बयान कभी भी हाथापाई पर उतर सकते हैं, ओर हाथापाई कभी भी बयान बन जाती है | लोकसभा और विधान सभाओं मे यह तबदीलियाँ आप आसानी से देख सकते हैं | कब बयान देते देते वहां के माननीय कुरसी, मेजों और माइक आदि, को बयानों का क्रिया रूप बना लें कुछ कहा नहीं जा सकता | और कब ये क्रियाएं शांत होकर संज्ञाएँ बनकर बयानों की शक्ल ले लें कुछ कहा नहीं जा सकता | बयानों की भाषा के सन्दर्भ में भी कोई नियम सुनिश्चित नहीं किया जा सकता. एक समय था जब बयानों के सन्दर्भ में संसदीय और असंसदीय भाषा में अंतर किया जाता था, आज जिस तरह राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र को परिभाषित करते समय कहा जाता है कि अर्थशास्त्र या राजनीतिशास्त्र वह है जो अर्थशास्त्री या राजनीतिशास्त्री करते हैं, उसी तरह अब यह भी कहा जाने लगा है कि जो भाषा सांसद या विधायक बोलते हैं वही संसदीय भाषा है. मुझे इसमें कोई तार्किक दोष नज़र नहीं आता.

जंगल में जिस तरह पेड़ बिना किसी पूर्व योजना के उग आते हैं और पूरा एक जंगल खडा कर देते हैं उसी तरह राजनैतिक बयान होते हैं. कौन सा बयान कब, कहाँ, कैसे, कौन उगा दे- किसी को कुछ पता नहीं है. सामान्य आदमी स्वयं को बयानों के बयावान में खडा पाता है.

- सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

ब्लॉग(हाइकु)- surendraverma389.blogspot.in

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