शुक्रवार, 13 मई 2016

मुक्तक / शशांक मिश्र भारती

 
मुक्तक :-
01
शिक्षक ही बालक के जीवन की पहली सीढ़ी है
जिसके आदर्शों पर चल बढ़ी सदैव यह पीढी है,
अप्प दीपो,भले न,किन्तु परहित जलना होगा-
व्यथित समाज, कहीं भटक गयी यह पीढ़ी है।।

02
पशुता से मानवता में बदल सके जो शिक्षा,
दुराचारी को सदाचारी बनाये है वो शिक्षा।
नेतृत्व देश को सही दिलाये तो शिक्षा-
छू सकें श्रेष्ठता के शिखर वही आदर्श शिक्षा।।

03
शिक्षक बदली धारा में जब वृत्तिक सेवक सा होता है
कोई समाज और देश तभी तो भारत सा करुणा में रोता है,
जब बालपन में पिया गरल संसद का चीर भिगोता है
नेतृत्व क्षीण होता है तब और राष्ट्र गौरव खोता है।।

04
शिक्षक ही निर्मित करता है बालक का व्यक्तित्व,
वही उसे सफल बनाता उपजाता जग में अस्तित्व।
उसके ही आदर्श कृष्ण, कबीर, विवेकानन्द बनाते-
युग प्रवर्तक बनकर के हैं अपना इतिहास रचाते।।

05:-
दुनिया बनाने वाला उस दिन आश्चर्य चकित हो गया
जब उसका बना हुआ हिन्दू-मुस्लिम,सिक्ख,ईसाई हो गया,
उसने बनाये थे केवल इस धरती पर इंसान ही इंसान -
पर इंसानी स्वार्थ से अनु,जन,सामान्य,पिछड़ा हो गया।।

 

06-
राजनीति के इस खेल में ,क्या-क्या पाले आपने,
अपनी चमके-अपनी दमके किये घोटाले आपने।
कोई गिरे, मिटे या संभले यह न सोचते आप हैं-
जमीर से गिरकर भी उठने को पाले इरादे आपने।।

07 -
इतिहास गा रहा है भूगोल बिगाड़ने को
गणित सिसक रही है शून्य जोड़ने को ,
कैसी है दौड़-भाग, छद्म राजनीति में
हमारा- तुम्हारी कह,कह रही तोड़ जो।।
08 -   
व्याप्त है इस समय आरोप-प्रत्यारोप का दौर,
संसद,गांव, शिक्षालय- न कोई भी बचा ठौर।
मेघ सम गरजते, देश का सोंचे समय नहीं -
जब तक चलता यहां है अपने स्वार्थ का दौर।।



शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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