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व्यंग्य राग (३) सेल्फी की सियासत / सुरेन्द्र वर्मा

सेल्फी की सियासत हर जगह अपनी धाक जमाए है | मनुष्य एक आत्म केन्द्रित प्राणी है. उसके कान को सबसे ज्यादह प्यारा उसका अपना नाम है, उसके हाथ को सबसे ज्यादह प्यारा उसका काम है, इसी तरह उसकी आँख को सबसे ज्यादह प्यारा उसका अपना चित्र है | यह मैं नहीं बड़े-बड़े मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक कहते हैं. भारतीय दर्शन तो आत्मानुभूति को ही सर्वाधिक मूल्यवान उपलब्धि मानता है. मनोवैज्ञानिकों का भी स्पष्ट मत है कि मनुष्य अपने में ही रमा रहता है. ‘मैं’ और ‘मेरा’ उसे सर्वाधिक आकर्षित करते हैं.

‘सेल्फी’, भले ही एक नया शब्द हो लेकिन इसका व्यापार सनातन है. युगों-युगों से फैला हुआ है. इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं है जब सेल्फी ने अपना जलवा न दिखाया हो. मनुष्य इतना आत्ममुग्ध है की वह अपने सिवा और किसी को देखना तक नहीं चाहता. यह मैं हूँ और यह मेरा परिवार है. बेटा है, बेटी है, पत्नी है. मेज़ है ,बिस्तर है, कुरसी है. रचना है, कविता है, कहानी है. धन-दौलत है, मकान है, ज़मीन है. – यह सब मेरा है. मैं हूँ और मेरा चित्र है. देखो, यह है मेरा चित्र – देखो ! मनुष्य नारसीसिज्म से पीड़ित है. उसे बस अपनी ही परछाईं देखना मंजूर है.

मैं शायद थोड़ा बहक गया | सेल्फी को कुछ ज्यादह ही विस्तार दे दिया | वस्तुत: सेल्फी आपका अपना एक चित्र मात्र है जिसे आप अपने मोबाइल में लगे उन्नत कमरे की तकनीक से खुद ही खींच सकते हैं | जिस तरह प्रजातंत्र लोगों का, लोगों के लिए, लोगों द्वारा स्थापित तंत्र है. ठीक इसी प्रकार ‘सेल्फी’ की परिभाषा भी हो सकती है. सेल्फी के सम्बन्ध में भी कहा जा सकता है कि यह ‘मेरा, मेरे द्वारा, मेरे लिए खींचा गया चित्र है’| पहले शायद यह संभव नहीं था | पहले आदमी को जब स्वयं अपना चित्र खींचना / खिंचवाना होता था तो उसे या तो किसी दूसरे का सहारा लेना होता था या फिर कैमरा कुछ इस तरह सेट करना पड़ता था, की उसके अपने आप क्लिक होने से पहले आदमी दौड़ कर निश्चित स्थान पर खड़ा हो जाए | कैमरा क्लिक होता था और तस्वीर खिंच जाती थी. बड़े झंझट का काम था और फिर भी मनचाहा परिणाम शायद ही कभी मिल पाता हो. अब सब बड़ा आसान हो गया है. मोबाइल पकड़िए उसमें अपनी तस्वीर देखिए और बस, क्लिक कर दीजिए ! हो गया. विज्ञान बड़ा दाता है | बस उसी की यह देन है |

धूम मचा दी है सेल्फी ने इन दिनों | जिसे देखो सेल्फी के लिए उतावला है | हाथ में मोबाइल लिए घूम रहा है | जगह की तलाश है | कहाँ से सेल्फी लेना ठीक रहेगा ? कोई बिलकुल अलग सी जगह होना चाहिए | पेड़ की ऊंची से ऊंची शाख पर से, नदी की तेज़ धार में खड़े होकर, रेल के पहियों के साथ दौड़ते हुए... ऐसी ही कोई खतरनाक जगह हो जहां हिम्मत की दाद मिल सके | लोग हश-हश कर सकें कि वाह ! देखो तो कहाँ से सेल्फी खींच ली है ! अपनी इस कारगुजारी में जान भी चली जाए तो क्या फर्क पड़ता है | सेल्फी को देखकर लोग याद तो करेंगें |

यों तो सेल्फी अपने लिए ही अपनी तस्वीर है लेकिन कभी कभी अपने साथ किसी और को भी निकट खड़ा करके आप अपने साथ उसकी भी तस्वीर ले सकते हैं. फिर उसे फेसबुक पर डाल कर अपने तथा-कथित मित्र को बता सकते हैं कि देखो, हमारे बीच कितनी आत्मीयता है ! बस यहीं से सेल्फी की सियासत शुरू हो जाती है. जो मित्र नहीं भी हो, मित्र बन जाता है; कम से कम मित्र-वत तो हो ही जाता है.

लोगों को अपना मित्र या मित्र-वत बताने के लिए राजनीति भला क्या-क्या हथकंडे नहीं अपनाती ! अभी ईद-मिलन और होली-मिलन जैसे ‘मिलन’ होते हैं तो कभी भोज (राजाभोज नहीं) की राजनीति अपनाई जाती है. कभी कैदियों का आदान-प्रदान होता है, तो कभी ‘गोल-मेज़’ पर वार्ता का चक्राकार दौर चलता है. बहरहाल, अब राजनीतिज्ञों को राजनीति करने का एक औ साधन मिल गया है – सेल्फी.

सेल्फी का राजनीति में उपयोग सबसे पहले हमारे मोबाइल-सेवी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किया जो सारे भारत समेत सारे विश्व को डिजिटल बनाने का सपना अपने दिल में संजोए हैं. उन्होंने राजनीति की खातिर सेल्फी का प्रयोग, वे जिन जिन देशों में गए, वहां किया. अबू धाबी में मोदी ने मस्जिद दौरे के दौरान अरब के मंत्री के साथ सेल्फी ली. चीन यात्रा के दौरान हमारे प्रधान-मंत्री ने चीन के प्रधान-मंत्री, ली के कियांग, के साथ सेल्फी ली; आस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान पीएम टोनी एबट के साथ भी उन्होंने सेल्फी पोस्ट की थी. आजकल प्रधान मंत्री जी ईरान में हैं | वहां के प्रेसिडेंट आस लगाए बैदे हैं की कब मोदी जी उनके साथ सेल्फी लें और उन्हें धन्य कर दें |

सेल्फी सियासत को सलाम !

-सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सेकुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो, ९६२१२२२७७८

ब्लॉग – surendraverma389.blogspot.in

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भई वाह, मेरा, मेरे द्वारा,मेरे लिए खींचा गया चित्र-सेल्फ़ी।बहुत अच्छी रचना।

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